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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र ११—१२ ] अध्याय ३ २३५
समझाया नहीं जा सकता; क्योकि वह मन, वाणीका विषय नहीं है। अतः वेदने
उसको दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त बताकर उसकी अपार महिमाको लक्ष्य कराया है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण करते हुए
पूर्वोक्त बातको दृढ़ करते हैं—
न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ॥ ३ । २ । १२ ॥
चेत्=यदि कहो कि; भेदात्=सगुण (अपरब्रह्म या कार्यब्रह्म) और निर्गुण
(परब्रह्म) ये ब्रह्मके पृथक्-पृथक् दो स्वरूप माने गये हैं, इसलिये; (वह एक ही
परमात्मा दोनो लक्षणोंवाला) न=नहीं हो सकता; इति न=तो ऐसी बात नहीं
है; प्रत्येकम् अतद्वचनात्=क्योंकि प्रत्येक श्रुतिमे इसके विपरीत एक परब्रह्म
परमेश्वरको ही दोनो प्रकारके लक्षणोवाला बताया गया है।
व्याख्या—यदि कहा जाय कि 'जहाँ परमात्माको सब श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न
बताया गया है, वहाँ मायाविशिष्ट कार्यब्रह्म या अपरब्रह्मका वर्णन है तथा जहाँ
उसके निर्विशेष स्वरूपका प्रतिपादन हुआ है, वही परब्रह्मका वर्णन है, इस
प्रकार दोनोका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण दोनो एक नहीं है तथा उस
परब्रह्म परमात्माको उभयलिङ्गवाला मानना ठीक नहीं है।' तो ऐसी बात नहीं है;
क्योकि अन्तर्यामि-ब्राह्मणमे पृथिवीसे लेकर जीवात्मापर्यन्त सबका अन्तर्यामी और
अमृत एक ही परब्रह्म परमात्माको बताया गया है (बृह० उ० ३। ७। ३ से २२ तक)
तथा माण्डूक्योपनिषद्में भी एक ही परब्रह्म परमात्माका वर्णन करते हुए उसे
समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न (मा० उ० ६) और सर्वथा निर्विशेष (मा० उ०
७) कहा गया है।* श्वेताश्वतरोपनिषद् (३। १, २) में उस एक ही
ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसे सूर्यके समान स्वयंप्रकाश और
मायासे सर्वथा अतीत बताया गया है, फिर 'उससे श्रेष्ठ, महान् तथा सूक्ष्म
दूसरा कोई नहीं है' ऐसा कहकर उसे सर्वत्र परिपूर्ण बताया है (श्वे० उ० ३।
८, ९)। आगे चलकर उसीको आकार और दोषोंसे रहित कहा है (श्वे० उ०
३। १०)। फिर उसके सभी जगह मुख, सिर आदि अङ्ग बताये गये है
(श्वे० उ० ३। ११) तथा उसे सबपर शासन करनेवाला, महान्, सबका प्रेरक,
ज्ञानस्वरूप और निर्मल बताया है (श्वे० उ० ३। १२)। तदनन्तर उस परमेश्वर-
को जगत्स्वरूप, सब जगह हाथ, पैर आदि अङ्गोवाला, सब इन्द्रियोसे युक्त

  • ये दोनो मन्त्र पृष्ठ २ और ३ की टिप्पणीमे आ गये हैं।