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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र ३३—३५ ] अध्याय ३ २५१
बोध करानेके लिये साधककी प्रकृतिके अनुसार श्रुतिमे भेद यां अभेद उपासनाका
वर्णन सर्वथा उचित ही है।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि ब्रह्म और उसकी दोनों
प्रकृतियोंमें भेद नहीं है तो ब्रह्मकी परा प्रकृतिरूप जो जीव-समुदाय हैं, उनमें
भी परस्पर भेद सिद्ध नहीं होगा। ऐसा सिद्ध होनेसे श्रुतियोंमें जो उसके नानात्व-
का वर्णन है, उसकी संगति कैसे होगी? इसपर कहते हैं—
स्थानविशेषात् प्रकाशादिवत् ॥ ३ । २ । ३४ ॥
प्रकाशादिवत् = प्रकाश आदिकी भाँति; स्थानविशेषात् = शरीररूप स्थानकी
विशेषताके कारण ( उनमें नानात्व आदि भेदका होना विरुद्ध नहीं है )।
व्याख्या—जिस प्रकार सभी प्रकाशमान पदार्थ प्रकाश-जातिकी दृष्टिसे एक
हैं, किन्तु दीपक, ग्रह, नक्षत्र, तारा, अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदिमे स्थान और
शक्तिका भेद होनेके कारण इन सबमे परस्पर भेद एवं नानात्व है ही; उसी
प्रकार चैतन्य-धर्मको लेकर सब जीव-समुदाय अभिन्न हैं, तथापि जीवोंके अनादि
कर्म-संस्कारोंका जो समूह है, उसके अनुसार फलरूपमे प्राप्त हुए शरीर, बुद्धि
एवं शक्ति आदिके तारतम्यसे उनमें परस्पर भेद होना असङ्गत नहीं है।
सम्बन्ध—उसी बातको दृढ करनेके लिये कहते हैं—
उपपत्तेश्च ॥ ३ । २ । ३५ ॥
उपपत्तेः=श्रुतिकी संगतिसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है )।
व्याख्या—श्रुतिमें जगत्की उत्पत्तिसे पहले एकमात्र अद्वितीय परमात्माकी ही
सत्ता बतायी गयी है। फिर उसीसे सबकी उत्पत्तिका वर्णन करके उसे सबका
अभिन्ननिमित्तोपादान कारण सिद्ध किया गया है। उसके बाद 'तत्त्वमसि' (वह
ब्रह्म तू है ) इत्यादि वचनोंद्वारा उस परमात्माको अपनेसे अभिन्न मानकर उसकी
उपासना करनेके लिये उपदेश दिया गया है। फिर उसीको भोक्ता, भोग्य आदिसे
युक्त इस विचित्र जड-चेतनात्मक जगत्का स्रष्टा, सञ्चालक तथा जीवोंके कर्मफल-
भोग एवं बन्ध-मोक्षकी व्यवस्था करनेवाला कहा गया है। जीवसमुदाय तथा
उनके कर्मसंस्कारोंको अनादि बताकर उनकी उत्पत्तिका निषेध किया गया हैं।
इन सब प्रसङ्गोंपर विचार करनेसे यही सिद्ध होता है कि जीव-समुदाय चैतन्य-
जातिके कारण तो परस्पर एक या अभिन्न हैं; परन्तु विभिन्न कर्म-संस्कारजनित