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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 267

२४६ वेदान्त-दर्शन । [ पाद २
व्याख्या-जिस प्रकार सर्प कभी सङ्कुचित हो कुण्डलाकार हो जाता है
और कभी अपनी साधारण 'अवस्थामे रहता है; किन्तु दोनों अवस्थाओमे वह
सर्प एक ही है। साधारण अवस्थामें रहना उसका कारणभाव 'है, उस समय
उसकी कुण्डलादिभावमें प्रकट होनेकी शक्ति अप्रकट 'है, तथापि वह उसमें
विद्यमान है और उससे अभिन्न है। एवं कुण्डलादि आकारमें स्थित होना उसका
कार्यभाव है, यही उसकी पूर्वोक्त अप्रकट शक्तिका प्रकट होना है। उसी प्रकार वह
परब्रह्म जब कारण-अवस्थामें रहता है, उस समय उसकी अपरा तथा परा प्रकृति-
रूप दोनो शक्तियाँ सृष्टिके पूर्व उसमे अभिन्नरूपसे विद्यमान रहती हुईं भी अप्रकट
रहती है और वही जब कार्यरूपमें स्थित होता है, तब उसकी उक्त दोनों शक्तियाँ
ही भिन्न-भिन्न नाम-रूपोमे प्रकट हो जाती है। अतः श्रुतिमे जो ब्रह्मको निर्विशेष
बताया गया है, वह उसकी कारणावस्थाको लेकर है और जो उसे अपनी
शक्तियोंसे युक्त एवं सविशेष बताया है, वह उसकी कार्यावस्थाको लेकर है।
इस प्रकार श्रुतिमे उसके कारण और कार्य दोनो स्वरूपोका वर्णन हुआ है,
इसलिये यह सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमात्मामे उसकी शक्ति सदा ही अभिन्न
रूपसे विद्यमान रहती है।
सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध करते हैं—
प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ॥ ३ । २ । २८ ॥
वा=अथवा; प्रकाशाश्रयवत्=प्रकाश और उसके आश्रयकी भाँति उनका
अभेद है; तेजस्त्वात्=क्योंकि तेजकी दृष्टिसे दोनो एक ही हैं।
व्याख्या-जिस प्रकार प्रकाश और उसका आश्रय सूर्य वास्तवमें तेजकी दृष्टिसे
अभिन्न हैं तो भी दोनोंको पृथक्-पृथक् कहा जाता है; उसी प्रकार परमेश्वर और उसकी
शक्ति-विशेष वास्तवमें अभिन्न होनेपर भी उनका अलग-अलग वर्णन किया
जाता है। भाव यह कि प्रकाश और सूर्यकी भाँति परमात्मा और उसकी
प्रकृतिमें परस्पर भेद नहीं है तो भी इनमें भेद माना जा सकता है।
सम्बन्ध-पुनः उसी बातको समझानेके लिये कहते हैं—
पूर्ववद्वा ॥ ३ । २ । २९ ॥
वा=अथवा; पूर्ववत्=जिस प्रकार पहले सिद्ध किया जा चुका है, वैसे ही
(दोनोंका अभेद समझ लेना चाहिये)।