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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 253

२३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
सम्बन्ध—सुषुप्तिकालमें जो परमात्माके साथ हृदयदेशमें जीवात्माकी
स्थिति बतायी गयी है, उसीकी पुष्टि करते हैं—
अतः प्रबोधोऽस्मात् ॥ ३ । २ । ८ ॥
अतः = इसलिये; अस्मात् = यहाँसे; प्रबोधः = जीवात्माका जगना ( श्रुतिमे
कहा गया है ) ।
व्याख्या—जो वस्तु जिसमें विलीन होती है, वह वहींसे प्रकट भी होती
है । इस न्यायसे जीवात्मा सुषुप्तिका अन्त होनेपर जब जगता है, तब यहाँसे
अर्थात् परमात्माके निवास-स्थान हृदयसे ही जाग्रत् होता है, इसलिये उसके लय
होनेका स्थान भी वही है, यह अपने-आप सिद्ध हो जाता है। यह जगना उस
परमात्माकी ही व्यवस्थासे होता है। जितने समयतक उसके प्रारब्धानुसार
सुषुप्तिका सुखभोग होना चाहिये, उतना समय पूरा हो जानेपर उस परमेश्वरकी
व्यवस्थासे जीवात्मा जाग्रत् हो जाता है; यह भाव भी यहाँ समझ लेना चाहिये ।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जो जीवात्मा सुषुप्ति-अवस्थामें
विलीन होता है, वही जगकर वापस आता है या शरीरके किसी अङ्गमें पड़ा
हुआ दूसरा ही कोई जीव जगता है ? इसपर कहते हैं—
स एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॥ ३ । २ । ९ ॥
तु = निस्संदेह; स एव = वही जगता है; कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः =
क्योंकि कर्म, अनुस्मृति, वेदप्रमाण और कर्म करनेकी आज्ञा इन सबकी सिद्धि
तभी होगी, इसलिये यही मानना ठीक है।
व्याख्या—जो जीवात्मा सोता है, वही जागता है। सोता दूसरा है और
जगता दूसरा है, ऐसा माननेमे बहुत दोष आते हैं। अतः वैसा नहीं माना जा
सकता; क्योंकि यह देखा जाता है कि मनुष्य पहले दिन जिस कर्मको आरम्भ
करता है, उसके शेष भागकी पूर्ति दूसरे-तीसरे दिनोंतक करता रहता है। आधा काम
दूसरेने किया हो और शेष आधे कामको अपना ही छोड़ा हुआ समझकर उसकी पूर्ति
दूसरा करे यह सम्भव नहीं है। तथा जगनेके बाद पहलेकी सब बातोंकी स्मृतिके साथ-
साथ यह भी स्मरण अपने-आप होता ही है कि जो अबतक सोता था, वही मैं अब जगा
हूँ। दूसरे जीवात्माकी कल्पना करनेसे किसी प्रकार भी इसकी सङ्गति नहीं हो