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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

सूक्त-१ देवता—ब्रह्म, आत्मा

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दूसरा कांड
सूक्त-१ देवता—ब्रह्म, आत्मा
वेनस्तत् पश्यत् परमं गुहा यद् यत्र विश्वं भवत्येकरूपम्.
इदं पृश्निरदुहज्जायमानाः स्वर्विदो अभ्यनूषत व्राः.. (१)
दीप्तिशाली आदित्य ने समस्त प्राणियों के हृदय में सत्य, ज्ञान आदि लक्षणों से युक्त
ब्रह्म का साक्षात्कार किया, जिस में समस्त विश्व एकाकार हो जाता है. स्वर्ग और आदित्य ने
इस विश्व को व्यक्त किया. उत्पन्न होती हुई तथा अपने उत्पन्न कर्ता को जानती हुई प्रजाएं उस
की स्तुति करती हैं. (१)
प्र तद् वोचेदमृतस्य विद्वान् गन्धर्वो धाम परमं गुहा यत्.
त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुष्पितासत्.. (२)
अविनाशी ब्रह्म को जानते हुए आदित्य ब्रह्म के विषय के प्रवचन करें कि वह उत्कृष्ट
स्थान एवं हृदय में स्थित है. उस के तीन भाग हृदय में छिपे हुए हैं. जो उन्हें जानता है, वह
अपने पिता का भी पिता होता है. (२)
स नः पिता जनिता स उत बन्धुर्धामानि वेद भुवनानि विश्वा.
यो देवानां नामध एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्ति सर्वा.. (३)
वह सूर्यात्मक परमात्मा हमारा पालनकर्ता, जन्मदाता एवं बंधु है. वह स्वर्ग आदि
स्थानों एवं वहां प्राप्त होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है. एकमात्र वही इंद्र आदि देवों
का नाम रखने वाला है अथवा वह स्वयं ही इंद्र आदि नाम धारण करता है. इस प्रकार के
परमात्मा को सभी प्राणी यह पूछते हुए प्राप्त होते हैं कि वह परमात्मा किस प्रकार का है?
(३)
परि द्यावापृथिवी सद्य आयमुपातिष्ठे प्रथमजामृतस्य.
वाचमिव वक्तारि भुवनेष्ठा धास्युरेष नन्वे ३ षो अग्निः.. (४)
ज्ञान होने के पश्चात तत्त्व ज्ञानी कहता है, “मैं ने तत्त्व ज्ञान होते ही द्यावा और पृथ्वी को
सभी ओर से प्राप्त कर लिया है तथा मैं ही ब्रह्म से प्रथम उत्पन्न प्राणी एवं भौतिक पदार्थ हूं.
जिस प्रकार वक्ता के समीपवर्ती जन वाणी को तत्काल सुन और समझ लेते हैं, उसी प्रकार
यह परमात्मा संसार में स्थित, सब के पोषण का इच्छुक एवं वैश्वानर के रूप में सब का
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पोषक है।” (४)
परि विश्वा भुवनान्यामृतस्य तन्तुं विततं दृशे कम्.
यत्र देवा अमृतमानशानाः समाने योनावध्यैरयन्त.. (५)
ज्ञानोत्पत्ति से पूर्व मैं ने पृथ्वी आदि लोकों को प्राप्त किया. इस का प्रयोजन ब्रह्म को
देखना है जो इस विश्व का कारण है. उस ब्रह्म में इंद्र आदि देव अमृत का स्वाद लेते हुए
अपनेआप को तन्मय कर देते हैं. (५)
सूक्त-२ देवता—गंधर्व अप्सराएं
दिव्यो गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यो विश्वीड्यः.
तं त्वा यौमि ब्रह्मणा दिव्य देव नमस्ते अस्तु दिवि ते सधस्थम्.. (१)
दिव्य सूर्य पृथ्वी आदि लोकों का पालनकर्ता है. समस्त प्रजाओं के द्वारा वही अकेला
नमस्कार करने एवं स्तुति के योग्य है. हे दिव्य सूर्य देव! मैं ब्रह्म के रूप में आप की आराधना
करता हूं. आप को मेरा नमस्कार है. आप का आवास स्वर्ग में है. (१)
दिवि स्पृष्टो यजतः सूर्यत्वगवयाता हरसो दैव्यस्य.
मृडाद् गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यः सुशेवाः.. (२)
आकाश में स्थित, यज्ञ करने योग्य, सूर्य के समान वर्ण वाले एवं देव संबंधी क्रोध को
नष्ट करने वाले गंधर्व हमें सुखी बनाएं. वे पृथ्वी आदि लोकों के स्वामी, एकमात्र नमस्कार
करने योग्य एवं शोभन सुख देने वाले हैं. (२)
अनवद्याभिः समु जग्म आभिरप्सरास्वपि गन्धर्व आसीत्.
समुद्र आसां सदनं म आहुर्यतः सद्य आ च परा च यन्ति.. (३)
सूर्यरूपी गंधर्व निंदा के अयोग्य किरणों रूपी अप्सराओं से मिल गया था. समुद्र इन
अप्सराओं का निवास स्थान कहा गया है, जहां से ये सूर्योदय के साथ ही यहां आती हैं और
सूर्यास्त के साथ चली जाती हैं. (३)
अभ्रिये विद्युन्नक्षत्रिये या विश्वावसुं गन्धर्वं सचध्वे.
ताभ्यो वो देवीर्नम इत् कृणोमि.. (४)
हे आकाश में जन्म लेने वाली, प्रकाशयुक्त एवं नक्षत्र रूपिणी किरणो! तुम में से जो
विश्वावसु गंधर्व अर्थात् चंद्रमा के साथ संयुक्त होती हैं, हे दिव्य किरणो! मैं तुम्हारे लिए
नमस्कार करता हूं. (४)
याः क्लन्दास्तमिषीचयो ऽ क्षकामा मनोमुहः.
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अदो यदवधावत्यवत्कमधि पर्वतात्.

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ताभ्यो गन्धर्वपत्नीभ्यो ऽ प्सराभ्यो ऽ करं नमः.. (५)
जो किरणें मनुष्य को रुलाने वाली, शक्ति संपन्न, इंद्रियों को निष्क्रिय करने की इच्छुक
एवं मन को मोहने वाली हैं, उन गंधर्व पत्नी अप्सराओं को मैं नमस्कार करता हूं. (५)
सूक्त-३ देवता—स्राव-विरोधी ओषधि
अदो यदवधावत्यवत्कमधि पर्वतात्.
तत् ते कृणोमि भेषजं सुभेषजं यथाससि.. (१)
मुंजवान पर्वत से उतर कर जो मूंज धरती पर वर्तमान है, हे मूंज! तेरे उस अग्रभाग से मैं
ओषधि बनाता हूं, क्योंकि तू उत्तम जड़ीबूटी है. (१)
आदङ्गा कुविदङ्गा शतं या भेषजानि ते.
तेषामसि त्वमुत्तममनास्रावमरोगणम्.. (२)
हे ओषधि! प्रयोग के तुरंत बाद रोग समाप्त करो एवं बहुत से रोगों का विनाश करो.
तुम से संबंधित अनगिनत जड़ीबूटियां हैं, उन में तुम उत्तम हो. तुम अतिसार आदि रोग दूर
करने वाली एवं इन के मूल कारणों का विनाश करने वाली हो. (२)
नीचैः खनन्त्यसुरा अरुस्राणमिदं महत्.
तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्.. (३)
प्राणों का अपहरण करने वाले राक्षस एवं शरीर को निर्बल बनाने वाले रोग विशाल घाव
के पकने के स्थान को नीचे से विदीर्ण करते हैं, यह महती ओषधि उस का समूल विनाश
करती है तथा अतिसार आदि रोगों को जड़ से मिटा देती है. (३)
उपजीका उद्भरन्ति समुद्रादधि भेषजम्.
तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमशीशमत्.. (४)
बांमी बनाने वाली दीमक पृथ्वी के नीचे स्थित जलराशि से रोग निवारक जड़ीबूटी को
उखाड़ती है. वह अतिसार आदि रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करने वाली है. (४)
अरुस्राणमिदं महत् पृथिव्या अध्युद्भृतम्.
तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्.. (५)
घाव को पकाने वाली यह जड़ीबूटी अर्थात् मिट्टी खेत से खोद कर लाई गई है. यह
अतिसार रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करती है. (५)
शं नो भवन्त्वप ओषधयः शिवाः.
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सूक्त-४ देवता—जंगिड़ मणि

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इन्द्रस्य वज्रो अप हन्तु रक्षस आराद् विसृष्टा इषवः पतन्तु रक्षसाम्.. (६)
ओषधियों के रूप में प्रयोग किए जाते हुए जल एवं ओषधियां हमारे रोगों को शांत
करने वाले हैं. इंद्र का वज्र रोग उत्पन्न करने वाले राक्षसों का विनाश करे. मनुष्यों को पीड़ा
पहुंचाने के निमित्त प्रयुक्त राक्षसों के रोग रूपी बाण हम से दूर गिरें अर्थात् रोग हम से दूर रहें.
(६)
सूक्त-४ देवता—जंगिड़ मणि
दीर्घायुत्वाय बृहते रणायारिष्यन्तो दक्षमाणाः सदैव.
मणिं विष्कन्धदूषणं जङ्गिडं बिभृमो वयम्.. (१)
हम दीर्घ जीवन के लिए तथा महान् रमणीय कर्म के लिए राक्षस, पिशाच आदि को
भगाने वाली इस मणि को धारण करते हैं, जो वाराणसी में प्रसिद्ध जंगिड़ वृक्ष से बनती है.
इस के कारण हम हिंसित न होते हुए अपना पालन करते हैं. (१)
जङ्गिडो जम्भाद् विशराद् विष्कन्धाद् द अभिशोचनात्.
मणिः सहस्रवीर्यः परि णः पातु विश्वतः.. (२)
असीमित सामर्थ्य वाली जंगिड़ मणि राक्षस के दांतों द्वारा खाए जाने से, शरीर के
खंडखंड हो कर बिखरने से, रोग आदि रूप विघ्नों से, उचित अनुचित कार्य के सोचविचार से
एवं जम्हाई आदि सब से हमें बचाएं. (२)
अयं विष्कन्धं सहते ऽ यं बाधते अत्रिणः.
अयं नो विश्वभेषजो जङ्गिडः पात्वंहसः.. (३)
जंगिड़ वृक्ष से निर्मित यह मणि दूसरों को पराजित करती है, कृत्या आदि भक्षकों को
नष्ट करती है तथा समस्त रोगों की ओषधि है. यह जंगिड़ मणि हमें पाप से बचाए. (३)
देवैर्दत्तेन मणिना जङ्गिडेन मयोभुवा.
विष्कन्धं सर्वा रक्षांसि व्यायामे सहामहे.. (४)
अग्नि आदि देवों के द्वारा दी हुई एवं सुख देने वाली जंगिड़ मणि से हम विघ्न करने
वाले सभी राक्षसों को अपने घूमनेफिरने के प्रदेश में पराजित करते हैं. (४)
शणश्च मा जङ्गिडश्च विष्कन्धादभि रक्षताम्.
अरण्यादन्य आभृतः कृष्या अन्यो रसेभ्यः.. (५)
मणि को बांधने वाले सूत्र का कारण सन एवं यह जंगिड़ मणि मुझ को विघ्नों से बचाएं.
इन में से एक अर्थात् जंगिड़ मणि वन से लाई गई है और अन्य अर्थात् कृषि से संबंधित सन
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सूक्त-५ देवता—इंद्र

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रस से लाया गया है. (५)
कृत्यादूषिरयं मणिरथो अरातिदूषिः.
अथो सहस्वान् जङ्गिडः प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (६)
यह मणि दूसरों के द्वारा किए गए जादूटोने से उत्पन्न पीड़ा की निवारक एवं शत्रुओं को
नष्ट करने वाली है. शक्ति संपन्न यह जंगिड़ मणि हमारी आयु को बढ़ाए. (६)
सूक्त-५ देवता—इंद्र
इन्द्र जुषस्व प्र वहा याहि शूर हरिभ्याम्.
पिबा सुतस्य मतेरिह मधोश्चकानश्चारुर्मदाय.. (१)
हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र! तुम हम पर प्रसन्न हो जाओ एवं हमें मनचाहा फल प्रदान करो.
हे शूर इंद्र! अपने घोड़ों की सहायता से तुम मेरे यज्ञ में आओ तथा इस यज्ञ में निचोड़े गए
सोमरस को पियो. यह सोमरस प्रशंसनीय एवं मधुर है. पीने पर यह सोमरस तृप्ति और उत्तम
मादकता का कारण बनता है. (१)
इन्द्र जठरं नव्यो न पृणस्व मधोर्दिवो न.
अस्य सुतस्य स्व १ र्णोप त्वा मदाः सुवाचो अगुः.. (२)
हे इंद्र! तुम नवीन के समान सोमरस से अपना पेट उसी प्रकार भर लो जिस प्रकार स्वर्ग
के अमृत से पूर्ण करते हो. इस निचोड़े गए सोमरस के मद से संबंधित उत्तम स्तुति तथा स्वर्ग
के समान आनंद तुम्हें यहां भी प्राप्त हो. (२)
इन्द्रस्तुराषाण्मित्रो वृत्रं यो जघान यतीन्र्.
बिभेद वलं भृगुर्न ससहे शत्रून् मदे सोमस्य.. (३)
शत्रु विनाशक एवं समस्त प्राणियों के मित्र इंद्र ने वृत्र राक्षस को आसुरी प्रजाओं के
समान मार डाला. जिस प्रकार यज्ञ करते हुए अंगिरा गोत्रीय भृगुओं के यज्ञ का आधार गौ का
हरण करने वाले बल नामक असुर को मार डाला था, उसी प्रकार इंद्र ने वृत्र का हनन किया.
इंद्र ने सोमरस के मद में शत्रुओं को पराजित किया. (३)
आ त्वा विशन्तु सुतास इन्द्र पृणस्व कुक्षी विद्धि शक्र धियेह्या नः.
श्रुधी हवं गिरो मे जुषस्वेन्द्र स्युग्भिर्मत्स्वेह महे रणाय.. (४)
हे इंद्र! निचोड़ा गया सोमरस तुम्हारे उदर में प्रवेश करे. तुम इस से अपनी दोनों कोखों
को भर लो. तुम हमारा आह्वान सुन कर यहां आओ तथा हमारी स्तुतियां सुनो एवं उन्हें
स्वीकार करो. हे इंद्र! तुम इस यज्ञ में अपने मित्र मरुत् आदि देवों के साथ सोमरस पी कर
तृप्त बनो तथा हमारे यज्ञकर्म को संपन्न बनाओ. (४)
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अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत् पर्वतानाम्.. (५)

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इन्द्रस्य नु प्रा वोचं वीर्याणि यानि चकार प्रथमानि वज्री.
अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत् पर्वतानाम्.. (५)
मैं वज्रधारी इंद्र के उन वीरता पूर्ण कार्यों का वर्णन करता हूं जो उन्होंने पूर्व काल में
किए हैं. उन्होंने वृत्रासुर का हनन किया तथा उस के बाद उस के द्वारा रोके गए जल को
निकाल दिया एवं पर्वतों से निकलने वाली नदियों को बहाया. (५)
अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वर्यं ततक्ष.
वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः.. (६)
पर्वत पर सोते हुए इस वृत्रासुर का इंद्र ने वध किया. वृत्र के पिता त्वष्टा ने इंद्र के लिए
सुगमता से चलाया जाने वाला तथा तेज धारों वाला वज्र बनाया. इस के बाद जल सागर की
ओर इस प्रकार बहने लगा, जिस प्रकार रंभाती हुई गाएं दौड़ती हैं. (६)
वृषायमाणो अवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत् सुतस्य.
आ सायकं मघवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथमजामहीनाम्.. (७)
बैल के समान आचरण करते हुए इंद्र ने प्रजापति के पास से सोम रूपी अन्न प्राप्त
किया. उस ने तीन सोम यागों में निचोड़े गए सोमरस का पान किया. इस के पश्चात इंद्र ने
अपना शत्रुघातक वज्र हाथ में लिया एवं असुरों में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए वृत्र की हत्या की. (७)
सूक्त-६ देवता—अग्नि
समास्त्वाग्न ऋतवो वर्धयन्तु संवत्सरा ऋषयो यानि सत्या.
सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन विश्वा आ भाहि प्रदिशश्चतस्रः.. (१)
हे अग्नि! संवत्सर, ऋषिगण एवं पृथ्वी आदि तत्त्व तुम्हारी वृद्धि करें. इन सब के द्वारा
बढ़े हुए तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो तथा पूर्व आदि चार दिशाओं को और आग्नेय
आदि चार विदिशाओं अर्थात् दिशा कोणों को प्रकाशित करो. (१)
सं चेध्यस्वाग्ने प्र च वर्धयेममुच्च तिष्ठ महते सौभाग्य.
मा ते रिषन्नुपसत्तारो अग्ने ब्रह्माणस्ते यशसः सन्तु मान्ये.. (२)
हे अग्नि! तुम स्वयं दीप्त बनो एवं इस यजमान की इच्छाएं पूर्ण करते हुए इसे समृद्ध
बनाओ एवं उस के सौभाग्य के हेतु उत्साहित बनो. तुम्हारे सेवक ऋत्विज् आदि नष्ट न हों. हे
अग्नि! तुम्हारे ऋत्विज् ब्राह्मण ही यशस्वी हैं, अन्य नहीं. (२)
त्वामग्ने वृणते ब्राह्मणा इमे शिवो अग्ने संवरणे भवा नः.
सपत्नहाग्ने अभिमातिजिद् भव स्वे गये जागृह्यप्रयुच्छन्.. (३)
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हे अग्नि! हम ब्राह्मण तुम्हारी आराधना करते हैं. तुम हमारे प्रमादों को शांत करते हुए
अथवा छिपाते हुए वर्तमान रहो. हे अग्नि! शत्रुओं को पराजित एवं पापों का विनाश करो.
तुम प्रमाद न करते हुए अपने घर में जागृत रहो. (३)
क्षत्रेणाग्ने स्वेन सं रभस्व मित्रेणाग्ने मित्रधा यतस्व.
सजातानां मध्यमेष्ठा राज्ञामग्ने विहव्यो दीदिहीह.. (४)
हे अग्नि देव! तुम अपने बल से संयुक्त बनो. हे मित्र का पोषण करने वाले अग्नि! तुम
मित्र भाव से उपकार करने वाले बनो. तुम अपने समान उत्पन्न ब्राह्मणों में मध्यस्थ एवं
क्षत्रियों में यज्ञ हो. हे अग्नि! इस प्रकार के तुम, इस यज्ञ में प्रकाशित हो जाओ. (४)
अति निहो अति सृधो ऽ त्यचित्तीरति द्विषः.
विश्वा ह्यग्ने दुरिता तर त्वमथास्मभ्यं सहवीरं रयिं दाः.. (५)
हे अग्नि! तुम इंद्रियों के विषयों से उत्पन्न दोषों को, पाप बुद्धि वाले मनुष्यों को, देह का
शोषण करने वाले रोगों को एवं हमारे शत्रुओं को समाप्त करो. तुम हमें समस्त पापों से पार
करो तथा हमारे लिए पुत्र, पौत्र आदि से युक्त धन प्रदान करो. (५)
सूक्त-७ देवता—वनस्पति
अघद्विष्टा देवजाता वीरुच्छपथयोपनी.
आपो मलमिव प्राणैक्षीत् सर्वान् मच्छपथाँ अधि.. (१)
पाप का विनाश करने वाली, देवों के द्वारा बनाई गई एवं पाप का निवारण करने वाली
दूर्वा मुझ से सभी पापों को इस प्रकार धो कर दूर कर दे, जिस प्रकार पानी मैल को धो
डालता है. (१)
यश्च सापत्नः शपथो जाम्याः शपथश्च यः.
ब्रह्मा यन्मन्युतः शपात् सर्वं तन्नो अधस्पद्म्.. (२)
द्वेष करने वाले शत्रु से संबंधित एवं बहन से संबंधित जो आक्रोश है तथा ब्राह्मण ने
क्रोधित हो कर जो शाप दिया है—ये तीनों प्रकार के शाप मेरे पैर के नीचे रहें. (२)
दिवो मूलमवततं पृथिव्या अध्युत्ततम्.
तेन सहस्रकाण्डेन परि णः पाहि विश्वतः.. (३)
हे मणि! हमें स्वर्ग की जड़ के समान विस्तृत एवं पृथ्वी के ऊपर विस्तृत असीमित पाप
से बचाओ और सभी प्रकार से हमारी रक्षा करो. (३)
परि मां परि मे प्रजां परि णः पाहि यद् धनम्.
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अरातिर्नो मा तारीन्मा नस्तारिषुरभिमातयः.. (४)
हे मणि! मेरी, मेरी संतान की एवं मेरे धन की रक्षा करो. शत्रु हमारा अतिक्रमण न करे
अर्थात् हमें पराजित न करे. हमारी हत्या करने के इच्छुक पिशाच आदि हमारी हिंसा न करें.
(४)
शप्तारमेतु शपथो यः सुहार्त्तेन नः सह.
चक्षुर्मन्त्रस्य दुर्हर्दः पृष्टीरपि शृणीमसि.. (५)
मुझे दिया हुआ शाप उसी के पास लौट जाए, जिस ने मुझे शाप दिया है. जो पुरुष
शोभन हृदय वाला है, उस मित्र के साथ हम सुखी रहें. हम चुगली करने वाले दुष्ट हृदय वाले
की आंखों एवं पसली की हड्डी को नष्ट करते हैं. (५)
सूक्त-८ देवता—यक्ष्मा, कुष्ठ आदि
उदगातां भगवती विचृतौ नाम तारके.
वि क्षेत्रियस्य मुञ्चतामधमं पाशमुत्तमम्.. (१)
तेजस्वी एवं बंधन से छुड़ाने वाले तारे उदित हों. वे तारे पुत्र, पौत्र आदि के शरीर में होने
वाले यक्ष्मा, कुष्ठ आदि रोगों एवं उन के फंदों से हमें छुड़ाएं जो हमारे शरीर के नीचे एवं ऊपर
के भागों में हैं. (१)
अपेयं रात्र्युच्छत्वपोच्छन्त्वभिकृत्वरीः.
वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु.. (२)
यह प्रातःकाल के समीप वाली रात उसी प्रकार हमारे शरीर से व्याधियों को समाप्त
करे, जिस प्रकार प्रकाश के कारण अंधकार का विनाश होता है. रोग की शांति करते हुए
आदित्य देव आएं. निश्चित ओषधि भी रोग का विनाश करे. (२)
बभ्रोरर्जुनकाण्डस्य यवस्य ते पलाल्या तिलस्य तिलपिञ्ज्या.
वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु.. (३)
मटमैले वर्ण के अर्जुन वृक्ष के काठ से, जौ की भूसी से एवं तिल की मंजरी से निर्मित
मणि तेरा रोग दूर करे. क्षेत्रिय व्याधियों, अतिसार, यक्ष्मा आदि का विनाश करने वाली
ओषधि समस्त रोगों को दूर करे. (३)
नमस्ते लाङ्गलेभ्यो नम ईषायुगेभ्यः.
वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु.. (४)
हे रोगी! तेरे रोग को शांत करने के लिए मैं बैल जुते हुए हलों को एवं हरण तथा जुए

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को नमस्कार करता हूं. क्षेत्रीय व्याधियों अर्थात् अतिसार, यक्ष्मा आदि रोगों का विनाश करने
वाली ओषधि समस्त रोग दूर करे. (४)
नमः सनिस्रसाक्षेभ्यो नमः संदेश्येभ्यः
नमः क्षेत्रस्य पतये वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमूच्छतु.. (५)
ऐसे सूने घरों को नमस्कार है, जिन के द्वार एवं खिड़की रूपी नेत्र खुले हुए हैं. ऐसे
गड्ढों के लिए नमस्कार है, जिन की मिट्टी निकाल दी गई है. सूने घर आदि रूप क्षेत्र के पति
को नमस्कार है. क्षेत्रीय व्याधियों अर्थात् अतिसार, यक्ष्मा आदि रोगों का विनाश करने वाली
ओषधि सभी रोग दूर करे. (५)
सूक्त-९ देवता—वनस्पति
दशवृक्ष मुञ्चेमं रक्षसो ग्राह्या अधि यैनं जग्राह पर्वसु.
अथो एनं वनस्पते जीवानां लोकमुन्नय.. (१)
हे ढाक, गूलर आदि दस वृक्षों से बनी हुई मणि! ब्रह्म राक्षस और राक्षसी से पकड़े हुए
इस पुरुष को छुड़ाओ. उस ब्रह्म राक्षसी ने इसे शरीर के जोड़ों में पकड़ा हुआ है. हे वनस्पति
से निर्मित मणि! तू इसे जीवित प्राणियों के लोक में पहुंचा अर्थात् इसे पुनः जीवित कर. (१)
आगादुदगादयं जीवानां व्रातमप्यगात्.
अभूदु पुत्राणां पिता नृणां च भगवत्तमः.. (२)
हे मणि! तेरे प्रभाव से यह पुरुष गृह से युक्त हो कर इस लोक में आ गया है. इस ने
जीवित मनुष्यों के समूह को प्राप्त कर लिया है. यह पुत्रों का पिता बन गया है तथा इस ने
मनुष्यों के मध्य अतिशय भाग्य पा लिया है. (२)
अधीतीरध्यगादयमधि जीवपुरा अगन्.
शतं ह्यस्य भिषजः सहस्रमुत वीरुधः.. (३)
ब्रह्म ग्रह से छूटा हुआ यह पुरुष पूर्व में अध्ययन किए गए वेद आदि शास्त्रों को स्मरण
करे तथा जीवों के आवास स्थानों को जाने, क्योंकि ग्रह से गृहीत इस पुरुष की चिकित्सा
करने वाले सौ वैद्य हैं और हजार जड़ीबूटियां हैं. (३)
देवास्ते चीतिमविदन् ब्रह्माण उत वीरुधः.
चीतिं ते विश्वे देवा अविदन् भूम्यामधि.. (४)
हे मणि! ग्रह विकार से रोगी को छुड़ाने से तेरे प्रभाव को इंद्र आदि देव जानते हैं.
ब्राह्मण एवं वृक्ष भी तेरे इस प्रभाव को जानते हैं. हे रोगी! तुझ मूर्च्छित को चेतना प्राप्त होने
की बात धरती पर सभी देव जानते हैं. (४)
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सूक्त-१० देवता—द्यावा

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यश्चकार स निष्करत् स एव सुभिषक्तमः.
स एव तुभ्यं भेषजानि कृणवद् भिषजा शुचिः.. (५)
विधान को जानने वाले जिस महर्षि ने इस मणि का बंधन किया है, वह ग्रह विकार को
शांत करे. वही वैद्यों में सर्वोत्तम है. निर्मल ज्ञान वाले वे ही वैद्य तेरे लिए ओषधियों का निर्माण
करें. (५)
सूक्त-१० देवता—द्यावा
क्षेत्रियात् त्वा निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (१)
हे व्याधि पीड़ित पुरुष! मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि रोगों से, रोग के कारण बने हुए पाप
देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण के पाप
से छुड़ाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हैं. (१)
शं ते अग्निः सहाद्भिरस्तु शं सोमः सहौषधीभिः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (२)
हे रोगी पुरुष! जलों के सहित अग्नि तेरे लिए सुखकर हो. सभी जड़ीबूटियों के साथ
सोमलता तेरे लिए सुखकारी हो. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने
हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण
देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों
तेरे लिए कल्याणकारी बनें. (२)
शं ते वातो अन्तरिक्षे वयो धाच्छं ते भवन्तु प्रदिशश्चतस्रः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (३)
हे रोगी पुरुष! धरती और आकाश के मध्य तेरे लिए पक्षियों को धारण करने वाली वायु
सुखकारी हो. पूर्व, पश्चिम आदि चारों उत्तम दिशाएं तेरे लिए सुखकारी हों. इसी प्रकार मैं तुझे
क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से, उत्पन्न पाप
से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप
रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों. (३)
इमा या देवीः प्रदिशश्चतस्रो वातपत्नीरभि सूर्यो विचष्टे.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (४)
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हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता
सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए
पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव
के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथिवी दोनों
तेरे लिए कल्याणकारी हों. (४)
तासु त्वान्तर्जरस्या दधामि प्र यक्ष्म एतु निर्ऋतिः पराचैः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (५)
हे रोगी पुरुष! मैं तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन
बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले
जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों
के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं.
मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.
(५)
अमुक्था यक्ष्माद् दुरितादवद्याद् द्रुहः पाशाद् ग्राह्याश्चोदमुक्थाः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (६)
हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से,
द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के
कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से
तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और
पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों. (६)
अहा अरातिमविदः स्योनमप्यभूद्भद्रे सुकृतस्य लोके.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (७)
हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख
प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में
तू स्थित है. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से,
बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से
छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए
कल्याणकारी हों. (७)
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सूर्यमृतं तमसो ग्राह्या अधि देवा मुञ्चन्तो असृजन्निरैनसः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (८)
हे रोगी पुरुष! सत्य बने हुए सूर्य अंधकार रूपी ग्रह से तुझे छुड़ाते हैं. इंद्र आदि देव तुझे
पाप से मुक्त करते हैं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप
देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से, वरुण देव के पाप
से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए
कल्याणकारी हों. (८)
सूक्त-११ देवता—मंत्रों में बताए गए
दूष्या दूषिरसि हेत्या हेतिरसि मेन्या मेनिरसि.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (१)
हे तिलक वृक्ष से निर्मित मणि! विनाश करने वाली कृत्या का तू निवारण करती है. तू
युद्धों को नष्ट एवं वज्र को असफल करने वाली है. तू हम से अधिक शक्तिशाली शत्रु को
मारने के लिए पकड़ तथा हमारे समान शक्तिशाली शत्रु को छोड़ कर चली जा. (१)
सक्त्यो ऽ सि प्रतिसरो ऽ सि प्रत्यभिचरणो ऽ सि.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम... (२)
हे मणि! तू तिलक वृक्ष से निर्मित है. तू कृत्या आदि को भगाने वाला रक्षा सूत्र है. तू
दूसरों के द्वारा किए गए जादूटोनों का निवारण करने वाली है. तू मुझ से अधिक शक्तिशाली
शत्रु को मारने के लिए पकड़ तथा मेरे समान शक्तिशाली शत्रु को छोड़ कर आगे बढ़ जा. (२)
प्रति तमभि चर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (३)
जो शत्रु हम से और हमारे पुत्रों, बांधवों तथा पशुओं से द्वेष करता है एवं हम जिस के
विनाश की इच्छा करते हैं, हे मणि! तुम इन दोनों प्रकार के शत्रुओं का विनाश करो. तुम मुझ
से अधिक शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए पकड़ो तथा मेरे समान शक्ति वाले शत्रु को छोड़
कर आगे बढ़ जाओ. (३)
सूरिरसि वर्चोधा असि तनूपानो ऽ सि.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (४)
हे मणि! तू हमारे शत्रुओं द्वारा किए गए जादू टोनों को जानने वाली, तेजस्विनी एवं
हमारे शरीरों की रक्षा करने वाली है. तू हम से अधिक शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए
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पकड़ एवं हमारे समान शक्ति वाले शत्रु को छोड़ कर आगे चली जा. (४)
शुक्रो ऽ सि भ्राजो ऽ सि स्वरसि ज्योतिरसि.
आप्नुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (५)
हे मणि! तू शत्रुओं को शोक में डुबाने वाली, तेजस्विनी, संताप देने वाली एवं ज्योति के
समान न छूने योग्य है. तू मुझ से अधिक शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए पकड़ ले और मेरे
समान शक्ति वाले शत्रु को छोड़ कर आगे बढ़ जा. (५)
सूक्त-१२ देवता—द्यावा, पृथ्वी, अंतरिक्ष
द्यावापृथिवी उर्व १ न्तरिक्षं क्षेत्रस्य पत्न्युरुगायो ऽ द्भुत:.
उतान्तरिक्षमुरु वातगोपं त इह तप्यन्तां मयि तप्यमाने.. (१)
द्यावा और पृथ्वी के मध्य विस्तृत अंतरिक्ष विद्यमान है. इन तीनों लोकों के अधिपति देव
क्रमशः अग्नि, वायु और सूर्य हैं. ये अद्भुत एवं महापुरुषों द्वारा प्रशंसित विष्णु, ब्रह्मांड में
व्याप्त, आकाश, लोक एवं लोकाधिपति हैं. मुझ अभिचारकर्ता के दीक्षा नियमों के कारण
संतप्त होने पर संतप्त हों. तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार मैं अपने शत्रु के विनाश हेतु तत्पर
हूं, उसी प्रकार ये देव भी उस के हिंसक बनें. (१)
इदं देवाः शृणुत ये यज्ञिया स्थ भरद्वाजो मह्यमुक्थानि शंसति.
पाशे स बद्धो दुरिते नि युज्यतां यो अस्माकं मन इदं हिनस्ति.. (२)
हे देवो! मेरा यह वचन सुनो, तुम सब यज्ञ के योग्य हो. भरद्वाज मुनि मेरी अभिलाषा
पूर्ति के लिए शास्त्रपाठ कर रहे हैं. जो शत्रु मेरे सन्मार्गगामी मन को कष्ट पहुंचाता है, वह मेरे
द्वारा किए गए जादूटोने के पाप में बंध कर मृत्यु रूपी दुर्गति को प्राप्त हो. (२)
इदमिन्द्र शृणुहि सोमप यत् त्वा हृदा शोचता जोहवीमि.
वृश्चामि तं कुलिशेनेव वृक्षं यो अस्माकं मन इदं हिनस्ति.. (३)
हे सोमरस के पीने से संतुष्ट मन वाले इंद्र, मेरे द्वारा कहे गए वाक्य को सुनो. मैं शत्रुओं
के द्वारा किए गए अपकारों से दुःखी मन के द्वारा तुम्हें बारबार बुला रहा हूं. जो मेरे मन को
इस प्रकार दुःखी कर रहे हैं, मैं उन शत्रुओं को उसी प्रकार काटता हूं, जिस प्रकार कुल्हाड़ी
वृक्ष को काटती है. (३)
अशीतिभिस्तिसृभिः सामगेभिरादित्येभिर्वसुभिरङ्गिारोभिः.
इष्टापूर्तमवतु नः पितॄणामामूं ददे हरसा दैव्येन.. (४)
तीन और अस्सी अर्थात् तिरासी सभा गायन कर्ताओं के, बारह आदमियों के, आठ
वसुओं के एवं दीर्घ सत्र का अनुष्ठान करने वाले अंगिरा गोत्रीय ऋषियों के सहयोग से हमारे
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पूर्वजों ने जो यज्ञ, कुआं एवं बाग से संबंधित उत्तम कर्म किए हैं, वे शत्रुओं से हमारी रक्षा
करें. हम अपकार करने वाले शत्रु को जादू टोने रूपी देवता के क्रोध के द्वारा अपने वश में
करते हैं. (४)
द्यावापृथिवी अनु मा दीधीथां विश्वे देवासो अनु मा रभध्वम्.
अङ्गिरसः पितरः सोम्यासः पापमार्थत्वपकामस्य कर्ता (५)
हे द्यावा पृथ्वी! तुम शत्रु को जीतने में मेरे अनुकूल बनो. हे समस्त देवो! तुम मेरे शत्रु
को पकड़ने के लिए तैयार हो जाओ. हे सोमरस के पात्र अंगिरा गोत्रीय ऋषियो एवं पितरो!
तुम ऐसा प्रयत्न करो कि मुझ से द्रोह करने वाले शत्रु मृत्यु को प्राप्त हों. (५)
अतीव यो मरुतो मन्यते नो ब्रह्म वा यो निन्दिषत् क्रियमाणम्.
तपूंषि तस्मै वृजिनानि सन्तु ब्रह्मद्विषं द्यौरभिसंतपाति.. (६)
हे मरुतो! जो शत्रु अपनेआप को हम से अधिक शक्तिशाली मानता है अथवा जो हमारे
द्वारा किए जाने वाले मंत्र संबंधी कर्म की निंदा करता है, उस के लिए संतापकारी आयुध
बाधक हों. मेरे कर्म से द्वेष करने वाले को द्यौ संताप दे. (६)
सप्त प्राणानष्टौ मन्यस्तांस्ते वृश्चामि ब्रह्मणा.
अया यमस्य सादनमग्निदूतो अरङ्कृतः.. (७)
हे शत्रु! तेरे सात प्राणों अर्थात् आंख, नाक, कान और मुंह के सात छिद्रों को तथा तेरे
कंठ की आठ धमनियों को मैं अपने मंत्र संबंधी अभिचार कर्म के द्वारा काटता हूं. छिन्न अंगों
वाला तू यमराज के घर जा. तेरे जलाने के लिए अग्नि दूत के समान आ गई है. इस के बाद
तेरे शव को सजाया जाएगा. (७)
आ दधामि ते पदं समिद्धे जातवेदसि.
अग्निः शरीरं वेवेष्ट्वसुं वागपि गच्छतु.. (८)
हे शत्रु! मैं जलती हुई अग्नि में तेरे कटे हुए चरणों के साथ तेरे पैरों की धूल फेंकता हूं.
अग्नि तेरे शरीर में प्रवेश कर के तेरे सारे अंगों में फैल जाए. तेरी वाणी और प्राण भी समाप्त
हो जाएं. (८)
सूक्त-१३ देवता—अग्नि, बृहस्पति, विश्वे
देव
आयुर्दा अग्ने जरसं वृणानो घृतप्रतीको घृतपृष्ठो अग्ने.
घृतं पीत्वा मधु चारु गव्यं पितेव पुत्रानभि रक्षतादिमम्.. (१)
हे अग्नि! तू इस ब्रह्मचारी को वृद्धावस्था तक आयु प्रदान कर. हे घृत के कारण
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प्रज्वलित एवं घृतरूपी रीढ़ वाले अग्नि देव! मधुर एवं निर्मल गोघृत से संतुष्ट हो कर तुम इस
ब्रह्मचारी की रक्षा उसी प्रकार करो, जिस प्रकार पिता पुत्र की रक्षा करता है. (१)
परि धत्त धत्त नो वर्चसेमं जरामृत्युं कृणुत दीर्घमायुः.
बृहस्पतिः प्रायच्छद् वास एतत् सोमाय राज्ञे परिधातवा उ.. (२)
हे देवो! इस ब्रह्मचारी को वस्त्र पहनाओ एवं हमारे तेज से इस का पोषण करो. इसे
ऐसा बनाओ कि वृद्धावस्था ही इस की मृत्यु बने. इस प्रकार इस की आयु को दीर्घ बनाओ.
बृहस्पति देव ने यह वस्त्र ब्राह्मणों के राजा सोम को पहनने के लिए दिया था. (२)
परीदं वासो अधिथाः स्वस्तये ऽ भूर्गृष्टीनामभिशस्तिपा उ.
शतं च जीव शरदः पुरूची रायश्च पोषमुपसंव्ययस्व.. (३)
हे विद्यार्थी! तुम ने यह वस्त्र क्षेम प्राप्त करने के हेतु धारण किया है. इसे धारण कर के
तुम हिंसा के भय से प्रजाओं की रक्षा करो. तुम अधिक समय तक पुत्र, पौत्र आदि को व्याप्त
करने वाले सौ वर्षों तक जीवित रहो एवं धन की पुष्टि धारण करो. (३)
एह्यश्मानमा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनूः.
कृण्वन्तु विश्वे देवा आयुष्टे शरदः शतम्.. (४)
हे ब्रह्मचारी! तू आ और अपने दाहिने पैर से पत्थर पर आक्रमण कर. तेरा शरीर पत्थर
के समान दृढ़ हो. समस्त देव तेरी आयु सौ वर्ष की बनाएं. (४)
यस्य ते वासः प्रथमवास्यं १ हरामस्तं त्वा विश्वे ऽ वन्तु देवाः.
तं त्वा भ्रातरः सुवृधा वर्धमानमनु जायन्तां बहवः सुजातम्.. (५)
हे ब्रह्मचारी! तुम ने नवीन वस्त्र धारण किया है. हम तुम से पहले पहना हुआ वस्त्र ले
रहे हैं. सभी देव तुम्हारी रक्षा करें. शोभन वृद्धि से बढ़ते हुए बहुत से भाई तुम्हारे बाद जन्म
लें. (५)
सूक्त-१४ देवता—अग्नि, भूतपति, इंद्र
निःसालां धृष्णुं धिषणमेकवाद्यां जिघत्स्वम्.
सर्वाश्चण्डस्य नप्त्यो नाशयामः सदान्वाः.. (१)
मैं शाल वृक्ष से भी ऊंची निःसाला नामक राक्षसी को नष्ट करता हूं. वह भय उत्पन्न
करने वाली, पराजित करने वाली, कठोर वचन बोलने वाली एवं मुझे खाने की इच्छुक है.
चंड नामक पापग्रह की सभी नातिनों को मैं नष्ट करता हूं, जो मुझ पर क्रोध करने वाली हैं.
(१)
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निर्वो गोष्ठादजामसि निरक्षान्निरुपानसात्.
निर्वो मगुन्द्या दुहितरो गृहेभ्यश्चातयामहे.. (२)
हे मगुंदी नाम की राक्षसी की पुत्रियो! मैं तुम्हें अपनी गोशाला से, जुए खेलने के स्थान
से तथा धान्य रखने के घर से दूर भगाता हूं. मैं तुम्हें अपने घरों से निकाल कर विशेष प्रकार
से नष्ट करता हूं. (२)
असौ यो अधराद् गृहस्तत्र सन्तवराय्यः.
तत्र सेदिर्न्युच्यतु सर्वांश्च यातुधान्यः.. (३)
यह जो अत्यधिक प्रसिद्ध पाताललोक है, कल्याण में विघ्न करने वाली राक्षसियां वहां
चली जाएं. पाप देवता निर्मित वहीं पाताल में नीचे चली जाएं. सभी राक्षसियां भी वहीं रहें.
(३)
भूतपतिर्निरजत्विन्द्रश्चैतः सदान्वाः.
गृहस्य बुध्न आसीनास्ता इन्द्रो वज्रेणाधि तिष्ठतु.. (४)
भूतों के स्वामी रुद्र और इंद्र क्रोध करने वाली राक्षसियों को मेरे घर से निकालें. इंद्र मेरे
घर के नीचे के भाग में निवास करने वाली पिशाचियों को वज्र से दबा कर रखें. (४)
यदि स्थ क्षेत्रियाणां यदि वा पुरुषेषिताः.
यदि स्थ दस्युभ्यो जाता नश्यतेतः सदान्वाः.. (५)
हे पिशाचियो! यदि तुम मातापिता के शरीर से आए हुए कोढ़, पागलपन, संग्रहणी
आदि का कारण बनी हुई हो अथवा तुम्हें मेरे शत्रुओं ने यहां भेजा है, यदि तुम चोर आदि के
समीप से प्रकाश में आई हो, तो तुम सब यहां से भाग जाओ. (५)
परि धामान्यासामाशुर्गाष्ठामिवासनम्.
अजैषं सर्वान् आजीन् वो नश्यतेतः सदान्वाः.. (६)
इन पिशाचियों के निवास स्थान पर मैं ने चारों ओर से इस प्रकार आक्रमण किया है,
जिस प्रकार तेज दौड़ने वाला घोड़ा अपनी घुड़साल की ओर जाता है. हे पिशाचियो! मैं ने
तुम सब को संग्राम में जीत लिया हैं. इस कारण तुम सब निराश्रित हो कर भाग जाओ. (६)
सूक्त-१५ देवता—प्राण
यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (१)
जिस प्रकार द्यौ और पृथ्वी न किसी से भयभीत और आशंकित होते हैं और न नष्ट होते
हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी शत्रु, ग्रह, रोग आदि से मत डरो. (१)
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यथाऽहश्च रात्री च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (२)
जिस प्रकार दिन और रात न किसी से भयभीत और आशंकित होते हैं तथा न नष्ट होते
हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी शत्रु, ग्रह, रोग आदि से मत डरो. (२)
यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (३)
जिस प्रकार सूर्य और चंद्र न किसी से भयभीत होते हैं, न आशंकित होते हैं और न नष्ट
होते हैं, हे मेरे प्राणो! इसी प्रकार तुम भी शत्रु, ग्रह, रोग आदि से डरो मत. (३)
यथा ब्रह्म च क्षत्रं च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (४)
जिस प्रकार ब्राह्मण और क्षत्रिय न किसी से भयभीत होते हैं, न आशंकित होते हैं और
न नष्ट होते हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी किसी से मत डरो. (४)
यथा सत्यं चानृतं च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (५)
जिस प्रकार सत्य और असत्य न किसी से भयभीत होते हैं, न आशंकित होते हैं और न
कभी नष्ट होते हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी मत डरो. (५)
यथा भूतं च भव्यं च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (६)
जिस प्रकार वर्तमान का वस्तु समूह और भविष्य में उत्पन्न होने वाली वस्तुएं न किसी
से भयभीत होती हैं, न आशंकित होती हैं और न कभी नष्ट होती हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार
तुम भी किसी से मत डरो. (६)
सूक्त-१६ देवता—प्राण, अपान आदि
प्राणापानौ मृत्योर्मा पातं स्वाहा.. (१)
हे प्राण और अपान वायु के अभिमानी देवो! मृत्यु से मेरी रक्षा करो. यह हवि भलीभांति
हवन किया हुआ हो. (१)
द्यावापृथिवी उपश्रुत्या मा पातं स्वाहा.. (२)
हे द्यावा और पृथ्वी! मुझे सुनने की शक्ति दे कर मेरी रक्षा करो. यह हवि भलीभांति
हवन किया हुआ हो. (२)
सूर्य चक्षुषा मा पाहि स्वाहा.. (३)
सूर्य रूप देखने वाली इंद्रिय आंख के द्वारा मेरी रक्षा करे. यह हवि भलीभांति हवन
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किया हुआ हो. (३)
अग्ने वैश्वानर विश्वैर्मा देवैः पाहि स्वाहा.. (४)
हे वैश्वानर अग्नि! सभी देवों के साथ मेरी इंद्रियों को शक्ति प्रदान करके मेरी रक्षा करो.
यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (४)
विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि स्वाहा.. (५)
हे विश्वंभर! अपनी समस्त पोषण शक्ति के द्वारा मेरी रक्षा करो. यह हवि भलीभांति
हवन किया हुआ हो. (५)
सूक्त-१७ देवता—ओज आदि
ओजो ऽ स्योजो मे दाः स्वाहा.. (१)
हे अग्नि! तुम ओज हो. इसीलिए मुझ में ओज धारण करो. यह हवि भलीभांति हवन
किया हुआ हो. (१)
सहो ऽ सि सहो मे दाः स्वाहा.. (२)
हे अग्नि! तुम शत्रुओं को पराजित करने में समर्थ तेज हो, इसीलिए तुम मुझे तेज प्रदान
करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (२)
बलमसि बलं मे दाः स्वाहा.. (३)
हे अग्नि! तुम बल हो, इसीलिए मुझे बल प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया
हुआ हो. (३)
आयुरस्यायुर्मे दाः स्वाहा.. (४)
हे अग्नि देव! तुम आयु हो, इसीलिए मुझे आयु प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन
किया हुआ हो. (४)
श्रोत्रमसि श्रोत्रं मे दाः स्वाहा.. (५)
हे अग्नि देव! तुम श्रोत्र हो, इसीलिए मुझे श्रोत्र अर्थात् सुनने की शक्ति प्रदान करो. यह
हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (५)
चक्षुरसि चक्षुर्मे दाः स्वाहा.. (६)
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सूक्त-१८ देवता—अग्नि

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हे अग्नि देव! तुम चक्षु हो, इसीलिए मुझे चक्षु अर्थात् देखने की शक्ति प्रदान करो. यह
हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (६)
परिपाणमसि परिपाणं मे दाः स्वाहा.. (७)
हे अग्नि देव! तुम सभी प्रकार से पालन करने वाले हो, इसीलिए मेरा पालन करो. यह
हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (७)
सूक्त-१८ देवता—अग्नि
भ्रातृव्यक्षयणमसि भ्रातृव्यचातनं मे दाः स्वाहा.. (१)
हे अग्नि देव! तुम शत्रु का विनाश करने वाले हो, इसीलिए मुझे शत्रु नाश की शक्ति
प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (१)
सपत्नक्षयणमसि सपत्नचातनं मे दाः स्वाहा.. (२)
हे अग्नि देव! तुम विरोधियों का नाश करने वाले हो, इसीलिए तुम मुझे विरोधियों का
विनाश करने की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (२)
अरायक्षयणमस्यरायचातनं मे दाः स्वाहा.. (३)
हे अग्नि देव! तुम दान न करने वालों का विनाश करने वाले हो, इसीलिए मुझे भी दान
न करने वालों का विनाश करने की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ
हो. (३)
पिशाचक्षयणमसि पिशाचचातनं मे दाः स्वाहा.. (४)
हे अग्नि देव! तुम मांस भक्षण करने वाले पिशाचों का नाश करने वाले हो, इसीलिए
मुझे भी पिशाचों का विनाश करने की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया
हुआ हो. (४)
सदान्वाक्षयणमसि सदान्वाचातनं मे दाः स्वाहा.. (५)
हे अग्नि देव! तुम आक्रोश करने वाली पिशाचियों का विनाश करने वाले हो, इसीलिए
मुझे भी पिशाचियों के विनाश की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो.
(५)
सूक्त-१९ देवता—अग्नि
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अग्ने यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो तपाने की शक्ति है, उस से उस को संतप्त करो जो हम से द्वेष
करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं. (१)
अग्ने यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो संहार की शक्ति है, उस के द्वारा उस का संहार करो जो हम से
द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं. (२)
अग्ने यत् ते ते ऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो दीप्ति है, उस के द्वारा उन्हें जलाने के लिए दीप्त बनो जो हम
से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (३)
अग्ने यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (४)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो दूसरों को शोकमग्न करने की शक्ति है, उस के द्वारा तुम उन्हें
शोक मग्न करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (४)
अग्ने यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः..
(५)
हे अग्नि देव! तुम्हारा जो तेज है, उस से उन लोगों को तेजहीन बनाओ जो हम से द्वेष
करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं (५)
सूक्त-२० देवता—वायु
वायो यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे वायु देव! तुम्हारी जो संताप पहुंचाने की शक्ति है, उस से उन्हें संताप पहुंचाओ जो
हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (१)
वायो यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे वायु देव! तुम्हारी जो छीनने की शक्ति है, उस का प्रयोग उन लोगों के प्रति करो जो
हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (२)
वायो यत् ते ऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
हे वायु देव! तुम्हारा जो वेग है, उस का प्रयोग उन के प्रति करो जो हम से द्वेष रखते हैं