Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 78 of 1063

Read in context
Page 78

हे अग्नि! हम ब्राह्मण तुम्हारी आराधना करते हैं. तुम हमारे प्रमादों को शांत करते हुए
अथवा छिपाते हुए वर्तमान रहो. हे अग्नि! शत्रुओं को पराजित एवं पापों का विनाश करो.
तुम प्रमाद न करते हुए अपने घर में जागृत रहो. (३)
क्षत्रेणाग्ने स्वेन सं रभस्व मित्रेणाग्ने मित्रधा यतस्व.
सजातानां मध्यमेष्ठा राज्ञामग्ने विहव्यो दीदिहीह.. (४)
हे अग्नि देव! तुम अपने बल से संयुक्त बनो. हे मित्र का पोषण करने वाले अग्नि! तुम
मित्र भाव से उपकार करने वाले बनो. तुम अपने समान उत्पन्न ब्राह्मणों में मध्यस्थ एवं
क्षत्रियों में यज्ञ हो. हे अग्नि! इस प्रकार के तुम, इस यज्ञ में प्रकाशित हो जाओ. (४)
अति निहो अति सृधो ऽ त्यचित्तीरति द्विषः.
विश्वा ह्यग्ने दुरिता तर त्वमथास्मभ्यं सहवीरं रयिं दाः.. (५)
हे अग्नि! तुम इंद्रियों के विषयों से उत्पन्न दोषों को, पाप बुद्धि वाले मनुष्यों को, देह का
शोषण करने वाले रोगों को एवं हमारे शत्रुओं को समाप्त करो. तुम हमें समस्त पापों से पार
करो तथा हमारे लिए पुत्र, पौत्र आदि से युक्त धन प्रदान करो. (५)
सूक्त-७ देवता—वनस्पति
अघद्विष्टा देवजाता वीरुच्छपथयोपनी.
आपो मलमिव प्राणैक्षीत् सर्वान् मच्छपथाँ अधि.. (१)
पाप का विनाश करने वाली, देवों के द्वारा बनाई गई एवं पाप का निवारण करने वाली
दूर्वा मुझ से सभी पापों को इस प्रकार धो कर दूर कर दे, जिस प्रकार पानी मैल को धो
डालता है. (१)
यश्च सापत्नः शपथो जाम्याः शपथश्च यः.
ब्रह्मा यन्मन्युतः शपात् सर्वं तन्नो अधस्पद्म्.. (२)
द्वेष करने वाले शत्रु से संबंधित एवं बहन से संबंधित जो आक्रोश है तथा ब्राह्मण ने
क्रोधित हो कर जो शाप दिया है—ये तीनों प्रकार के शाप मेरे पैर के नीचे रहें. (२)
दिवो मूलमवततं पृथिव्या अध्युत्ततम्.
तेन सहस्रकाण्डेन परि णः पाहि विश्वतः.. (३)
हे मणि! हमें स्वर्ग की जड़ के समान विस्तृत एवं पृथ्वी के ऊपर विस्तृत असीमित पाप
से बचाओ और सभी प्रकार से हमारी रक्षा करो. (३)
परि मां परि मे प्रजां परि णः पाहि यद् धनम्.
ebook converter DEMO Watermarks*