अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइन्द्रस्य वज्रो अप हन्तु रक्षस आराद् विसृष्टा इषवः पतन्तु रक्षसाम्.. (६)
ओषधियों के रूप में प्रयोग किए जाते हुए जल एवं ओषधियां हमारे रोगों को शांत
करने वाले हैं. इंद्र का वज्र रोग उत्पन्न करने वाले राक्षसों का विनाश करे. मनुष्यों को पीड़ा
पहुंचाने के निमित्त प्रयुक्त राक्षसों के रोग रूपी बाण हम से दूर गिरें अर्थात् रोग हम से दूर रहें.
(६)
सूक्त-४ देवता—जंगिड़ मणि
दीर्घायुत्वाय बृहते रणायारिष्यन्तो दक्षमाणाः सदैव.
मणिं विष्कन्धदूषणं जङ्गिडं बिभृमो वयम्.. (१)
हम दीर्घ जीवन के लिए तथा महान् रमणीय कर्म के लिए राक्षस, पिशाच आदि को
भगाने वाली इस मणि को धारण करते हैं, जो वाराणसी में प्रसिद्ध जंगिड़ वृक्ष से बनती है.
इस के कारण हम हिंसित न होते हुए अपना पालन करते हैं. (१)
जङ्गिडो जम्भाद् विशराद् विष्कन्धाद् द अभिशोचनात्.
मणिः सहस्रवीर्यः परि णः पातु विश्वतः.. (२)
असीमित सामर्थ्य वाली जंगिड़ मणि राक्षस के दांतों द्वारा खाए जाने से, शरीर के
खंडखंड हो कर बिखरने से, रोग आदि रूप विघ्नों से, उचित अनुचित कार्य के सोचविचार से
एवं जम्हाई आदि सब से हमें बचाएं. (२)
अयं विष्कन्धं सहते ऽ यं बाधते अत्रिणः.
अयं नो विश्वभेषजो जङ्गिडः पात्वंहसः.. (३)
जंगिड़ वृक्ष से निर्मित यह मणि दूसरों को पराजित करती है, कृत्या आदि भक्षकों को
नष्ट करती है तथा समस्त रोगों की ओषधि है. यह जंगिड़ मणि हमें पाप से बचाए. (३)
देवैर्दत्तेन मणिना जङ्गिडेन मयोभुवा.
विष्कन्धं सर्वा रक्षांसि व्यायामे सहामहे.. (४)
अग्नि आदि देवों के द्वारा दी हुई एवं सुख देने वाली जंगिड़ मणि से हम विघ्न करने
वाले सभी राक्षसों को अपने घूमनेफिरने के प्रदेश में पराजित करते हैं. (४)
शणश्च मा जङ्गिडश्च विष्कन्धादभि रक्षताम्.
अरण्यादन्य आभृतः कृष्या अन्यो रसेभ्यः.. (५)
मणि को बांधने वाले सूत्र का कारण सन एवं यह जंगिड़ मणि मुझ को विघ्नों से बचाएं.
इन में से एक अर्थात् जंगिड़ मणि वन से लाई गई है और अन्य अर्थात् कृषि से संबंधित सन
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