अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपोषक है।” (४)
परि विश्वा भुवनान्यामृतस्य तन्तुं विततं दृशे कम्.
यत्र देवा अमृतमानशानाः समाने योनावध्यैरयन्त.. (५)
ज्ञानोत्पत्ति से पूर्व मैं ने पृथ्वी आदि लोकों को प्राप्त किया. इस का प्रयोजन ब्रह्म को
देखना है जो इस विश्व का कारण है. उस ब्रह्म में इंद्र आदि देव अमृत का स्वाद लेते हुए
अपनेआप को तन्मय कर देते हैं. (५)
सूक्त-२ देवता—गंधर्व अप्सराएं
दिव्यो गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यो विश्वीड्यः.
तं त्वा यौमि ब्रह्मणा दिव्य देव नमस्ते अस्तु दिवि ते सधस्थम्.. (१)
दिव्य सूर्य पृथ्वी आदि लोकों का पालनकर्ता है. समस्त प्रजाओं के द्वारा वही अकेला
नमस्कार करने एवं स्तुति के योग्य है. हे दिव्य सूर्य देव! मैं ब्रह्म के रूप में आप की आराधना
करता हूं. आप को मेरा नमस्कार है. आप का आवास स्वर्ग में है. (१)
दिवि स्पृष्टो यजतः सूर्यत्वगवयाता हरसो दैव्यस्य.
मृडाद् गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यः सुशेवाः.. (२)
आकाश में स्थित, यज्ञ करने योग्य, सूर्य के समान वर्ण वाले एवं देव संबंधी क्रोध को
नष्ट करने वाले गंधर्व हमें सुखी बनाएं. वे पृथ्वी आदि लोकों के स्वामी, एकमात्र नमस्कार
करने योग्य एवं शोभन सुख देने वाले हैं. (२)
अनवद्याभिः समु जग्म आभिरप्सरास्वपि गन्धर्व आसीत्.
समुद्र आसां सदनं म आहुर्यतः सद्य आ च परा च यन्ति.. (३)
सूर्यरूपी गंधर्व निंदा के अयोग्य किरणों रूपी अप्सराओं से मिल गया था. समुद्र इन
अप्सराओं का निवास स्थान कहा गया है, जहां से ये सूर्योदय के साथ ही यहां आती हैं और
सूर्यास्त के साथ चली जाती हैं. (३)
अभ्रिये विद्युन्नक्षत्रिये या विश्वावसुं गन्धर्वं सचध्वे.
ताभ्यो वो देवीर्नम इत् कृणोमि.. (४)
हे आकाश में जन्म लेने वाली, प्रकाशयुक्त एवं नक्षत्र रूपिणी किरणो! तुम में से जो
विश्वावसु गंधर्व अर्थात् चंद्रमा के साथ संयुक्त होती हैं, हे दिव्य किरणो! मैं तुम्हारे लिए
नमस्कार करता हूं. (४)
याः क्लन्दास्तमिषीचयो ऽ क्षकामा मनोमुहः.
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