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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 79 of 1063

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Page 79

अरातिर्नो मा तारीन्मा नस्तारिषुरभिमातयः.. (४)
हे मणि! मेरी, मेरी संतान की एवं मेरे धन की रक्षा करो. शत्रु हमारा अतिक्रमण न करे
अर्थात् हमें पराजित न करे. हमारी हत्या करने के इच्छुक पिशाच आदि हमारी हिंसा न करें.
(४)
शप्तारमेतु शपथो यः सुहार्त्तेन नः सह.
चक्षुर्मन्त्रस्य दुर्हर्दः पृष्टीरपि शृणीमसि.. (५)
मुझे दिया हुआ शाप उसी के पास लौट जाए, जिस ने मुझे शाप दिया है. जो पुरुष
शोभन हृदय वाला है, उस मित्र के साथ हम सुखी रहें. हम चुगली करने वाले दुष्ट हृदय वाले
की आंखों एवं पसली की हड्डी को नष्ट करते हैं. (५)
सूक्त-८ देवता—यक्ष्मा, कुष्ठ आदि
उदगातां भगवती विचृतौ नाम तारके.
वि क्षेत्रियस्य मुञ्चतामधमं पाशमुत्तमम्.. (१)
तेजस्वी एवं बंधन से छुड़ाने वाले तारे उदित हों. वे तारे पुत्र, पौत्र आदि के शरीर में होने
वाले यक्ष्मा, कुष्ठ आदि रोगों एवं उन के फंदों से हमें छुड़ाएं जो हमारे शरीर के नीचे एवं ऊपर
के भागों में हैं. (१)
अपेयं रात्र्युच्छत्वपोच्छन्त्वभिकृत्वरीः.
वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु.. (२)
यह प्रातःकाल के समीप वाली रात उसी प्रकार हमारे शरीर से व्याधियों को समाप्त
करे, जिस प्रकार प्रकाश के कारण अंधकार का विनाश होता है. रोग की शांति करते हुए
आदित्य देव आएं. निश्चित ओषधि भी रोग का विनाश करे. (२)
बभ्रोरर्जुनकाण्डस्य यवस्य ते पलाल्या तिलस्य तिलपिञ्ज्या.
वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु.. (३)
मटमैले वर्ण के अर्जुन वृक्ष के काठ से, जौ की भूसी से एवं तिल की मंजरी से निर्मित
मणि तेरा रोग दूर करे. क्षेत्रिय व्याधियों, अतिसार, यक्ष्मा आदि का विनाश करने वाली
ओषधि समस्त रोगों को दूर करे. (३)
नमस्ते लाङ्गलेभ्यो नम ईषायुगेभ्यः.
वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु.. (४)
हे रोगी! तेरे रोग को शांत करने के लिए मैं बैल जुते हुए हलों को एवं हरण तथा जुए