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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 77 of 1063

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Page 77

इन्द्रस्य नु प्रा वोचं वीर्याणि यानि चकार प्रथमानि वज्री.
अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत् पर्वतानाम्.. (५)
मैं वज्रधारी इंद्र के उन वीरता पूर्ण कार्यों का वर्णन करता हूं जो उन्होंने पूर्व काल में
किए हैं. उन्होंने वृत्रासुर का हनन किया तथा उस के बाद उस के द्वारा रोके गए जल को
निकाल दिया एवं पर्वतों से निकलने वाली नदियों को बहाया. (५)
अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वर्यं ततक्ष.
वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः.. (६)
पर्वत पर सोते हुए इस वृत्रासुर का इंद्र ने वध किया. वृत्र के पिता त्वष्टा ने इंद्र के लिए
सुगमता से चलाया जाने वाला तथा तेज धारों वाला वज्र बनाया. इस के बाद जल सागर की
ओर इस प्रकार बहने लगा, जिस प्रकार रंभाती हुई गाएं दौड़ती हैं. (६)
वृषायमाणो अवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत् सुतस्य.
आ सायकं मघवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथमजामहीनाम्.. (७)
बैल के समान आचरण करते हुए इंद्र ने प्रजापति के पास से सोम रूपी अन्न प्राप्त
किया. उस ने तीन सोम यागों में निचोड़े गए सोमरस का पान किया. इस के पश्चात इंद्र ने
अपना शत्रुघातक वज्र हाथ में लिया एवं असुरों में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए वृत्र की हत्या की. (७)
सूक्त-६ देवता—अग्नि
समास्त्वाग्न ऋतवो वर्धयन्तु संवत्सरा ऋषयो यानि सत्या.
सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन विश्वा आ भाहि प्रदिशश्चतस्रः.. (१)
हे अग्नि! संवत्सर, ऋषिगण एवं पृथ्वी आदि तत्त्व तुम्हारी वृद्धि करें. इन सब के द्वारा
बढ़े हुए तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो तथा पूर्व आदि चार दिशाओं को और आग्नेय
आदि चार विदिशाओं अर्थात् दिशा कोणों को प्रकाशित करो. (१)
सं चेध्यस्वाग्ने प्र च वर्धयेममुच्च तिष्ठ महते सौभाग्य.
मा ते रिषन्नुपसत्तारो अग्ने ब्रह्माणस्ते यशसः सन्तु मान्ये.. (२)
हे अग्नि! तुम स्वयं दीप्त बनो एवं इस यजमान की इच्छाएं पूर्ण करते हुए इसे समृद्ध
बनाओ एवं उस के सौभाग्य के हेतु उत्साहित बनो. तुम्हारे सेवक ऋत्विज् आदि नष्ट न हों. हे
अग्नि! तुम्हारे ऋत्विज् ब्राह्मण ही यशस्वी हैं, अन्य नहीं. (२)
त्वामग्ने वृणते ब्राह्मणा इमे शिवो अग्ने संवरणे भवा नः.
सपत्नहाग्ने अभिमातिजिद् भव स्वे गये जागृह्यप्रयुच्छन्.. (३)
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