अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextनिर्वो गोष्ठादजामसि निरक्षान्निरुपानसात्.
निर्वो मगुन्द्या दुहितरो गृहेभ्यश्चातयामहे.. (२)
हे मगुंदी नाम की राक्षसी की पुत्रियो! मैं तुम्हें अपनी गोशाला से, जुए खेलने के स्थान
से तथा धान्य रखने के घर से दूर भगाता हूं. मैं तुम्हें अपने घरों से निकाल कर विशेष प्रकार
से नष्ट करता हूं. (२)
असौ यो अधराद् गृहस्तत्र सन्तवराय्यः.
तत्र सेदिर्न्युच्यतु सर्वांश्च यातुधान्यः.. (३)
यह जो अत्यधिक प्रसिद्ध पाताललोक है, कल्याण में विघ्न करने वाली राक्षसियां वहां
चली जाएं. पाप देवता निर्मित वहीं पाताल में नीचे चली जाएं. सभी राक्षसियां भी वहीं रहें.
(३)
भूतपतिर्निरजत्विन्द्रश्चैतः सदान्वाः.
गृहस्य बुध्न आसीनास्ता इन्द्रो वज्रेणाधि तिष्ठतु.. (४)
भूतों के स्वामी रुद्र और इंद्र क्रोध करने वाली राक्षसियों को मेरे घर से निकालें. इंद्र मेरे
घर के नीचे के भाग में निवास करने वाली पिशाचियों को वज्र से दबा कर रखें. (४)
यदि स्थ क्षेत्रियाणां यदि वा पुरुषेषिताः.
यदि स्थ दस्युभ्यो जाता नश्यतेतः सदान्वाः.. (५)
हे पिशाचियो! यदि तुम मातापिता के शरीर से आए हुए कोढ़, पागलपन, संग्रहणी
आदि का कारण बनी हुई हो अथवा तुम्हें मेरे शत्रुओं ने यहां भेजा है, यदि तुम चोर आदि के
समीप से प्रकाश में आई हो, तो तुम सब यहां से भाग जाओ. (५)
परि धामान्यासामाशुर्गाष्ठामिवासनम्.
अजैषं सर्वान् आजीन् वो नश्यतेतः सदान्वाः.. (६)
इन पिशाचियों के निवास स्थान पर मैं ने चारों ओर से इस प्रकार आक्रमण किया है,
जिस प्रकार तेज दौड़ने वाला घोड़ा अपनी घुड़साल की ओर जाता है. हे पिशाचियो! मैं ने
तुम सब को संग्राम में जीत लिया हैं. इस कारण तुम सब निराश्रित हो कर भाग जाओ. (६)
सूक्त-१५ देवता—प्राण
यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (१)
जिस प्रकार द्यौ और पृथ्वी न किसी से भयभीत और आशंकित होते हैं और न नष्ट होते
हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी शत्रु, ग्रह, रोग आदि से मत डरो. (१)
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