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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 83 of 1063

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Page 83

सूर्यमृतं तमसो ग्राह्या अधि देवा मुञ्चन्तो असृजन्निरैनसः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (८)
हे रोगी पुरुष! सत्य बने हुए सूर्य अंधकार रूपी ग्रह से तुझे छुड़ाते हैं. इंद्र आदि देव तुझे
पाप से मुक्त करते हैं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप
देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से, वरुण देव के पाप
से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए
कल्याणकारी हों. (८)
सूक्त-११ देवता—मंत्रों में बताए गए
दूष्या दूषिरसि हेत्या हेतिरसि मेन्या मेनिरसि.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (१)
हे तिलक वृक्ष से निर्मित मणि! विनाश करने वाली कृत्या का तू निवारण करती है. तू
युद्धों को नष्ट एवं वज्र को असफल करने वाली है. तू हम से अधिक शक्तिशाली शत्रु को
मारने के लिए पकड़ तथा हमारे समान शक्तिशाली शत्रु को छोड़ कर चली जा. (१)
सक्त्यो ऽ सि प्रतिसरो ऽ सि प्रत्यभिचरणो ऽ सि.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम... (२)
हे मणि! तू तिलक वृक्ष से निर्मित है. तू कृत्या आदि को भगाने वाला रक्षा सूत्र है. तू
दूसरों के द्वारा किए गए जादूटोनों का निवारण करने वाली है. तू मुझ से अधिक शक्तिशाली
शत्रु को मारने के लिए पकड़ तथा मेरे समान शक्तिशाली शत्रु को छोड़ कर आगे बढ़ जा. (२)
प्रति तमभि चर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (३)
जो शत्रु हम से और हमारे पुत्रों, बांधवों तथा पशुओं से द्वेष करता है एवं हम जिस के
विनाश की इच्छा करते हैं, हे मणि! तुम इन दोनों प्रकार के शत्रुओं का विनाश करो. तुम मुझ
से अधिक शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए पकड़ो तथा मेरे समान शक्ति वाले शत्रु को छोड़
कर आगे बढ़ जाओ. (३)
सूरिरसि वर्चोधा असि तनूपानो ऽ सि.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (४)
हे मणि! तू हमारे शत्रुओं द्वारा किए गए जादू टोनों को जानने वाली, तेजस्विनी एवं
हमारे शरीरों की रक्षा करने वाली है. तू हम से अधिक शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए
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