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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

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अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या.
तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः.. (३१)
देवों की नगरी आठ चक्रों और नौ द्वारों वाली है. कोई युद्ध कर के उसे जीत नहीं
सकता. उस में हिरण्यमय कोष और प्रकाश से ढका हुआ स्वर्ण है. (३१)
तस्मिन् हिरण्यये कोशे त्र्यरे त्रिप्रतिष्ठिते.
तस्मिन् यद् यक्षमात्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः.. (३२)
उस नौ द्वारों वाले हिरण्यमय कोष में जो आत्मा स्थित है, वहां जो यज्ञ का विस्तार
करते हैं, वे ही ब्रह्मज्ञानी माने जाते हैं. (३२)
प्रभ्राजमानां हरिणीं यशसा संपरीवृताम्.
पुरं हिरण्ययीं ब्रह्मा विवेशापराजिताम्.. (३३)
उस प्रकाशमान, पाप का विनाश करने वाली, यश से ढकी हुई एवं हिरण्यमय पुरी में
ब्रह्म प्रवेश करता है. (३३)
सूक्त-३ देवता—वरणमणि, वनस्पति
अयं मे वरणो मणिः सपत्नक्षयणो वृषा.
तेना रभस्व त्वं शत्रून् प्र मृणीहि दुरस्यतः.. (१)
यह मेरी वरण वृक्ष की मणि शत्रुओं का नाश करने वाली और अभिलाषा पूरक है. इसे
धारण कर के तू उद्योग कर और दुष्टता करने वाले शत्रुओं का विनाश कर. (१)
प्रैणान्छृणीहि प्र मृणा रभस्व मणिस्ते अस्तु पुरएता पुरस्तात्.
अवारयन्त वरणेन देवा अभ्याचारमसुराणां श्वः श्वः.. (२)
तू इन शत्रुओं का विनाश कर, इन्हें मसल दे और प्रसन्न बन. यह मणि तेरे आगेआगे
चले. वरण वृक्ष से निर्मित इस मणि की सहायता से देवों ने असुरों द्वारा किए गए जादूटोनों
का दूसरे दिन ही निवारण कर दिया था. (२)
अयं मणिवरणो विश्वभेषजः सहस्राक्षो हरितो हिरण्ययः.
स ते शत्रूनधरान् पादयाति पूर्वस्तान् दभ्नुहि ये त्वा द्विषन्ति.. (३)
वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि समस्त रोगों की ओषधि है. यह मणि हजार आंखों वाले
इंद्र के समान शक्तिशालीनी, हरे रंग की और हिरण्यमय है. यह मणि तेरे शत्रुओं को मार
डाले, उस से पहले ही तू उन का विनाश कर दे. (३)
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अयं ते कृत्यां विततां पौरुषेयादयं भयात्.
अयं त्वा सर्वस्मात् पापाद् वरणो वारयिष्यते.. (४)
तेरे निमित्त जो कृत्या बनाई गई है, यह वरण वृक्ष से निर्मित मणि उस को प्रभावहीन
बना देगी एवं तुझे भयरहित कर देगी. दिव्य वनस्पति से निर्मित यह मणि तेरे सभी पापों का
विनाश कर देगी. (४)
वरणो वारयाता अयं देवो वनस्पतिः.
यक्ष्मो यो अस्मिन्नाविष्टस्तमु देवा अवीवरन्.. (५)
दिव्य गुणों से संपन्न यह वरण वृक्ष से निर्मित मणि हमारे शरीर में प्रविष्ट यक्ष्मा रोग के
साथ हमारे शत्रुओं को भी समाप्त कर देगी. (५)
स्वप्नं सुप्त्वा यदि पश्यासि पापं मृगः सृतिं यदि धावादजुष्टाम्.
परिक्षवाच्छकुनेः पापवादादयं मणिवरणो वारयिष्यते.. (६)
हे पुरुष! वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि पापपूर्ण स्वप्न के भय से, अनिच्छित दिशा की
ओर दौड़ने वाले मृग से, छींक से तथा कौआ आदि पक्षी से संबंधित अपशकुनों से तुझे
बचाएगी. (६)
अरात्यास्त्वा निर्ऋत्या अभिचारादथो भयात्.
मृत्योरोजीयसो वधाद् वरणो वारयिष्यते.. (७)
हे पुरुष! यह मणि शत्रु से, निर्ऋति नामक पाप देवता से, जादूटोने के भय से तथा मृत्यु
से तुम्हारी रक्षा करे. (७)
यन्मे माता यन्मे पिता भ्रातरो यच्च मे स्वा यदेनश्चकृमा वयम्.
ततो नो वारयिष्यते ऽ यं देवो वनस्पतिः.. (८)
यह वनस्पति से निर्मित दिव्य गुण वाली मणि मेरी माता, मेरे पिता, मेरे भ्राता और मुझे
किए गए समस्त पापों से बचाएगी. (८)
वरणेन प्रव्यथिता भ्रातृव्या मे सबन्धवः.
असूर्तं रजो अप्यगुस्ते यन्त्वधमं तमः.. (९)
मेरे जो बांधव एवं भतीजे मुझ से शत्रुता रखते हैं, वे वरण वृक्ष से निर्मित इस मणि के
प्रभाव से व्यथित हों. वे कष्टदायिनी धूल को प्राप्त हों तथा घने अंधकार में प्रवेश करें. (९)
अरिष्टो ऽ हमरिष्टगुरायुष्मान्त्सर्वपूरुषः.
तं मा ऽ यं वरणो मणिः परि पातु दिशोदिशः.. (१०)
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हिंसा रहित मैं शांति प्राप्त कर रहा हूं. मेरी संतान, परिवारीजन एवं सेवक अधिक
अवस्था प्राप्त करें. वरण वृक्ष से निर्मित यह शक्तिशालिनी मणि उन की सभी प्रकार रक्षा
करे. (१०)
अयं मे वरण उरसि राजा देवो वनस्पतिः.
स मे शत्रून् वि बाधतामिन्द्रो दस्यूनिवासुरान्.. (११)
वरण वृक्ष से निर्मित यह दिव्य मणि मेरे सीने पर स्थित है. इंद्र ने जिस प्रकार असुरों का
विनाश किया, उसी प्रकार यह मेरे शत्रुओं का विनाश करे. (११)
इमं बिभर्मि वरणमायुष्माञ्छतशारदः.
स मे राष्ट्रं च क्षत्रं च पशूनोजश्व मे दधत्.. (१२)
सौ की आयु प्राप्त करने का इच्छुक मैं इस मणि को धारण करता हूं. यह मणि मेरे राष्ट्र,
बल, पशुओं एवं घोड़े की रक्षा करे. (१२)
यथा वातो वनस्पतीन् वृक्षान् भनक्त्योजसा.
एवा सपत्नान् मे भङ्ग्धि पूर्वान्जाताँ उतापरान् वरणस्त्वा ऽ भि रक्षतु..
(१३)
वायु जिस प्रकार अपनी शक्ति से वृक्षों एवं वनस्पतियों को तोड़ देती है, उसी प्रकार यह
मणि मेरे पूर्ववर्ती और बाद में होने वाले शत्रुओं का विनाश कर के मेरी रक्षा करे. (१३)
यथा वातश्चाग्निश्च वृक्षान् प्सातो वनस्पतीन्.
एवा सपत्नान् मे प्साहि पूर्वान्जाताँ उतापरान् वरणस्त्वा ऽ भि रक्षतु..
(१४)
हे वरण वृक्ष से निर्मित मणि! वायु एवं अग्नि जिस प्रकार वृक्षों के पास जा कर उन्हें
जला डालते हैं, उसी प्रकार तुम मेरे पूर्ववर्ती और बाद में होने वाले शत्रुओं का विनाश करो.
(१४)
यथा वातेन प्रक्षीणा वृक्षाः शेरे न्यर्पिताः.
एवा सपत्नांस्त्वं मम
प्र क्षिणीहि न्यर्पय पूर्वान्जातां उतापरान् वरणस्त्वा ऽ भि रक्षतु.. (१५)
सूखे हुए वृक्ष जिस प्रकार वायु के कारण गिर जाते हैं, उसी प्रकार हे मणि! तुम मेरे
पूर्ववर्ती एवं बाद में होने वाले शत्रुओं का विनाश कर के मेरी रक्षा करो. (१५)
तांस्त्वं प्र च्छिन्द्धि वरण पुरा दिष्टात् पुरायुषः.
य एनं पशुषु दिप्सन्ति ये चास्य राष्ट्रदिप्सवः.. (१६)
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हे वरण वृक्ष से निर्मित मणि! जो इस यजमान के पशुओं एवं राष्ट्र का अपहरण करना
चाहते हैं, तू उन के भाग्य और आयु को उन से छीन कर उन्हें नष्ट कर दे. (१६)
यथा सूर्यो अतिभाति यथा ऽ स्मिन् तेज आहितम्.
एवा मे वरणो मणि: कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा
समनक्तु मा.. (१७)
जिस प्रकार यह सूर्य अत्यधिक प्रकाशित होता है और जिस प्रकार इस में तेज व्याप्त
है, उसी प्रकार वरण वृक्ष से निर्मित मणि मुझे कीर्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करे. यह मणि मुझे
तेजस्वी और यशस्वी बनाए. (१७)
यथा यशश्चन्द्रमस्यादित्ये च नृचक्षसि.
एवा मे वरणो मणि:
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (१८)
सभी मनुष्यों के साक्षी चंद्रमा में और सूर्य में जैसा यश व्याप्त है, यह वरण वृक्ष से
निर्मित मणि उसी प्रकार मुझे यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (१८)
यथा यश: पृथिव्यां यथा ऽ स्मिन्जातवेदसि.
एवा मे वरणो मणि:
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (१९)
पृथ्वी और अग्नि में जिस प्रकार यश प्रतिष्ठित है, वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि मुझे
उसी प्रकार यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (१९)
यथा यश: कन्यायां यथास्मिन्सम्भूते रथे.
एवा मे वरणो मणि:
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२०)
कन्या में और भरे हुए रथ में जिस प्रकार यश व्याप्त है, वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि
मुझे उसी प्रकार यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (२०)
यथा यश: सोमपीथे मधुपर्के यथा यश:.
एवा मे वरणो मणि:
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२१)
जिस प्रकार सोमपीथ और मधुपर्क नामक यज्ञ क्रियाओं के करने से यश प्राप्त होता है,
उसी प्रकार वरण वृक्ष से निर्मित मणि मुझे यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (२१)
यथा यशोऽग्निहोत्रे वषट्कारे यथा यश:.

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एवा मे वरणो मणिः
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२२)
अग्निहोत्र एवं वषट् करने से जिस प्रकार यज्ञ प्राप्त होता है, उसी प्रकार वरण वृक्ष से
निर्मित यह मणि मुझे कीर्ति और ऐश्वर्य प्रदान करे. (२२)
यथा यशो यजमाने यथा ऽस्मिन् यज्ञ आहितम्.
एवा मे वरणो मणिः
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२३)
इस यजमान में एवं इस यज्ञ में जिस प्रकार यश स्थित है, वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि
उसी प्रकार मुझे कीर्ति और ऐश्वर्य प्रदान करे. (२३)
यथा यशः प्रजापतौ यथा ऽस्मिन् परमेष्ठिनि. एवा मे वरणो मणिः
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२४)
जिस प्रकार प्रजापति में और परमेष्ठी में यश व्याप्त है, उसी प्रकार वरण वृक्ष से निर्मित
यह मणि मुझ में कीर्ति और ऐश्वर्य स्थापित करे तथा मुझे तेज और यश से सुशोभित करे.
(२४)
यथा देवेष्वमृतं यथैषु सत्यमाहितम्. एवा मे वरणो मणिः
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२५)
जिस प्रकार देवों में अमृत एवं सत्य प्रतिष्ठित है, उसी प्रकार वरण वृक्ष से निर्मित यह
मणि मुझे कीर्ति और ऐश्वर्य प्रदान करे तथा मुझे तेज और यश से सुशोभित करे. (२५)
सूक्त-४ देवता—सर्प, विषापहरण
इन्द्रस्य प्रथमो रथो देवानाम्परो रथो वरुणस्य तृतीय इत्.
अहीनामपमा रथः स्थाणुमारदथार्षत्.. (१)
इंद्र का रथ पहला, देवों का दूसरा और वरुण का तीसरा है. सर्पों का रथ अपमा अर्थात्
निम्न गतिशील नामक है, जो स्थाणु अर्थात् सूखे वृक्षों से अधिक रमणीय है एवं तेज चलता
है. (१)
दर्भः शोचिस्तरूणकमश्वस्य वारः परुषस्य वारः. रथस्य बन्धुरम्.. (२)
दर्भ सर्पों को शोक देने वाला है, यह तरुणक एवं अश्व नामक सर्पों के विष का निरोधक
है. परुष नामक सर्प के विष का निवारण करने वाला दर्भ रथ का बाधक है. (२)
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अव श्वेत पदा जहि पूर्वेण चापरेण च.
उदप्लुतमिव दार्वहीनामरसं विषं वारुग्रम्... (३)
हे श्वेतपद! तू अपने अगले एवं पिछले पैरों के द्वारा सर्पों का विनाश कर. गिरता हुआ
काष्ठ जिस प्रकार शक्ति से हीन हो जाता है, उसी प्रकार सर्प विष प्रभावहीन हो जाता है. हे
दर्भ! तू इस भयानक सर्प विष का निवारण कर. (३)
अरंघुषो निमज्योन्मज्य पुनरब्रवीत्.
उदप्लुतमिव दार्वहीनामरसं विषं वारुग्रम्.. (४)
अरंघुष नाम की ओषधि ने पानी में डुबकी लगाई और ऊपर आ कर कहा कि जिस
प्रकार गिरता हुआ काष्ठ शक्तिहीन होता है, उसी प्रकार सर्पों का विष भी प्रभावहीन हो जाए.
हे कुश! तू इस भयानक सर्प विष का निवारण कर. (४)
पैद्वो हन्ति कसार्णीलं पैद्वः श्वित्रमुतासितम्.
पैद्वो रथर्व्याः शिरः सं बिभेद पृदाक्वाः.. (५)
पैद्व नामक ओषधि कसार्णील नामक सर्प को, श्वेत सर्प को और काले सर्प को नष्ट
करती है. पैद्व ने रथर्व्या और पृदाकू नामक नागों का सिर तोड़ दिया था. (५)
पैद्व प्रेहि प्रथमो ऽ नु त्वा वयमेमसि.
अहीन् व्यस्यतात् पथो येन स्मा वयमेमसि.. (६)
हे पैद्व! तुम सर्वश्रेष्ठ हो. हम तुम्हारी प्रार्थना करते हैं. तुम यहां आओ. हम जिस मार्ग से
आतेजाते हैं, तुम उस मार्ग से सर्पों को दूर भगा दो. (६)
इदं पैद्वो अजायतेदमस्य परायणम्.
इमान्यर्वतः पदा ऽ हिघ्न्यो वाजिनीवतः.. (७)
यह पैद्व उत्पन्न हुआ है. यह इस के आश्रय में है. वह इन शीघ्र चलने वाले सर्पों का
निवर्तन करने वाला है. (७)
संयतं न वि ष्वरद् व्यात्तं न सं यमत्.
अस्मिन् क्षेत्रे द्वावही सी च पुमांश्च तावुभावरसा.. (८)
सर्प का बंद मुख हमें डसने के लिए न खुले. इस क्षेत्र में निवास करने वाले नर और
मादा सर्प अर्थात् सांप और सांपिन मंत्र की शक्ति से शक्तिहीन हो जाएं. (८)
अरसास इहाहयो ये अन्ति ये च दूरके.
घनेन हन्मि वृश्चिकमहिं दण्डेनागतम्.. (९)
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जो सर्प यहां से समीप रहते हैं और जो दूर रहते हैं, वे विषहीन हो जाएं. मैं बिच्छू को
हथौड़ा से मारता हूं और सांप को डंडे से मारता हूं. (९)
अघाश्वस्येदं भेषजमुभयोः स्वजस्य च.
इन्द्रो मे ऽ हिमघायन्तमहिं पैद्वो अरन्धयत्.. (१०)
मेरे पास जो जड़ीबूटियां हैं, वे अघाश्व और स्वज दोनों प्रकार के सर्पों का विष दूर करने
वाली हैं. हिंसा रूपी पाप करने वाले सांप को रोकने के हेतु इंद्र ने पैद्व को मेरे वश में किया
है. (१०)
पैद्वस्य मन्महे वयं स्थिरस्य स्थिरधाम्नः.
इमे पश्चा पृदाकवः प्रदीध्यत आसते.. (११)
स्थिर एवं स्थायी तेज वाले पैद्व को हम मानते हैं. ये पश्च और पृदाकू नामक सर्पों को
शोकमग्न करते हैं. (११)
नष्टासवो नष्टविषा हता इन्द्रेण वज्रिणा. जघानेन्द्रो जघ्निमा वयम्.. (१२)
वज्रधारी इंद्र ने उन सर्पों के प्राण एवं विष को समाप्त कर दिया था, जिन्हें इंद्र ने मारा
था. हम उन का विनाश करते हैं. (१२)
हतास्तिरश्चिराजयो निपिष्टासः पृदाकवः.
दर्विं करिक्रतं श्वित्रं दर्भेष्वसितं जहि.. (१३)
तिरश्चिराजी सांप मार दिए गए हैं और पृदाकू नामक सांप पीस डाले गए हैं. हे दर्वी! तू
दर्भों पर पड़े हुए सफेद और काले करिकृत सांपों का विनाश कर दे. (१३)
कैरातिका कुमारिका सका खनति भेषजम्.
हिरण्ययीभिरभ्रिभिर्गिरीणामुप सानुषु.. (१४)
किरात जाति की कुमारी कुदाल से सर्पों की ओषधि खोजती है. वह पर्वतों की चोटियों
पर सोने के फावड़ों से ओषधि खोदती है. (१४)
आयमगन् युवा भिषक् पृश्निहापराजितः.
स वै स्वजस्य जम्भन उभयोर्वृश्चिकस्य च.. (१५)
कभी पराजित न होने वाला युवा वैद्य मंत्र शक्ति से संपन्न है. यह स्वज नामक सर्प और
बिच्छू का विनाश कर सकता है. (१५)
इन्द्रो मे ऽ हिमरन्धयन्मित्रश्च वरुणश्च. वातापर्जन्यो ३ भा.. (१६)
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इंद्र, मित्र, वरुण, वायु और पर्जन्य अर्थात् बादल ने सर्प को मेरे वश में कर दिया है.
(१६)
इन्द्रो मे ऽ हिमरन्धयत् पृदाकुं च पृदाक्वम्.
स्वजं तिरश्चिराजिं कसर्णीलं दशोनसिम्.. (१७)
इंद्र ने मेरे कल्याण के हेतु पृदाकू, पृदाक्व, स्वज तिरश्चिराजी, कसर्णील एवं दशोनसि
नामक सर्पों को मेरे वश में कर दिया है. (१७)
इन्द्रो जघान प्रथमं जनितारमहे तव.
तेषामु तृह्यमाणानां कः स्वित् तेषामसद् रसः.. (१८)
हे सर्प! इंद्र ने सब से पहले तेरे जन्म देने वालों को मारा था. उन सर्पों के विनाश के
समय किस सर्प में विष शेष रहा? (१८)
सं हि शीर्षाण्यग्रभं पौञ्जिष्ठ इव कर्वराम्.
सिन्धोर्मध्यं परेत्य व्यनिजमहेर्विषम्.. (१९)
केवट जिस प्रकार पतवार को ग्रहण करता है, उसी प्रकार मैं ने सर्प शीश पकड़ लिए
हैं. मैं ने सिंधु के मध्य भाग से लौट कर सर्प के विष को प्रभावहीन बना दिया है. (१९)
अहीनां सर्वेषां विषं परा वहन्तु सिन्धवः.
हतास्तिरश्चिराजयो निपिष्टासः पृदाकवः.. (२०)
सभी नदियां सर्पों के विष को अपने जल के साथ बहा ले जाएं. तिरश्चिराजी नामक सर्प
नष्ट हो गए और पृदाकू नामक सर्प पीस डाले गए. (२०)
ओषधीनामहं वृण उर्वरीरिव साधुया.
नयाम्यर्वतीरिवाहे निरैतु ते विषम्.. (२१)
मैं अपनी उत्तम बुद्धि के द्वारा उपजाऊ भूमि पर उगी हुई जड़ीबूटियों को स्वीकार कर
के उन्हें इस प्रकार प्रेरित करता हूं, जिस प्रकार वेग वाली नदियां बहती हैं. हे सर्प! उन
जड़ीबूटियों से विष समाप्त हो जाए. (२१)
यदग्नौ सूर्ये विषं पृथिव्यामोषधीषु यत्.
कान्दाविषं कनन्ककं निरैत्वैतु ते विषम्.. (२२)
अग्नि में, सूर्य में, पृथ्वी में तथा जड़ीबूटियों में जो विष है, वह तथा कंदों का विष
पूर्णतया नष्ट हो जाए. (२२)
ये अग्निजा ओषधिजा अहीनां ये अप्सुजा विद्युत आबभूवूः.
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येषां जातानि बहुधा महान्ति तेभ्यः सर्पेभ्यो नमसा विधेम.. (२३)
अग्नि, जड़ीबूटियों, जल एवं सर्पों में जो विष है तथा जिन के द्वारा भयानक कर्म हुए
हैं, हम उन सभी सर्पों को हव्य द्वारा तृप्त करते हैं. (२३)
तौदी नामासि कन्या घृताची नाम वा असि.
अधस्पदेन ते पदमा ददे विषदूषणम्.. (२४)
हे जड़ीबूटी! तू तौदी और घृताची नाम वाली हो. नीचे की ओर किए गए अपने पैर के
द्वारा मैं विष समाप्त करता हूं और सभी को वश में करता हूं. (२४)
अङ्गादङ्गात् प्र च्यावय हृदयं परि वर्जय.
अधा विषस्य यत् तेजो ऽ वाचीनं तदेतु ते.. (२५)
हे रोगी! तू अपने प्रत्येक अंग से विष को टपकाता हुआ अपने हृदय की रक्षा कर. विष
का जो तेज है, वह अधोगति को प्राप्त हो कर नष्ट हो जाए. (२५)
आरे अभूद् विषमरीद् विषे विषमप्रागपि.
अग्निर्विषमहेर्निंरधात् सोमो निरणयीत्.
दंष्टारमन्वगाद् विषमहिरमृत्.. (२६)
नवीन विष भी प्राचीन विष में मिल कर रुक गया है. इस प्रकार विष नष्ट हो चुका है.
अग्नि ने सांप के विष को नष्ट कर दिया है. सोम सर्प के विष को दूर ले गया है. काटने वाले
सांप को ही उस का विष प्राप्त हुआ, जिस से उस की मृत्यु हो गई. (२६)
सूक्त-५ देवता—जल
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगाय ब्रह्मयोगैर्वो युनज्मि.. (१)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो
तथा तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं तुम्हें ब्रह्म योगों से युक्त कर के विजय दिलाने वाले योग की
क्षमता वाला बनाता हूं. (१)
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगाय क्षत्रयोगैर्वो युनज्मि.. (२)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो
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तथा तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं तुम्हें क्षत्रिय संबंधी योगों से युक्त कर के विजय दिलाने वाले
योग की क्षमता वाला बनाता हूं. (२)
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगायेन्द्रयोगैर्वो युनज्मि.. (३)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति
एवं तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं तुम्हें इंद्र संबंधी योगों से युक्त कर के विजय दिलाने वाले योग
की क्षमता वाला बनाता हूं. (३)
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगाय सोमयोगैर्वो युनज्मि.. (४)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, वीर्य एवं बल हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति
एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हो. मैं तुम्हें जल संबंधी योग से युक्त करता हूं, जिस से मैं विजय
प्राप्त कर सकूं. (४)
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगायाप्सुयोगैर्वो युनज्मि.. (५)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो
एवं तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं विजय प्राप्त करने वाले योग के हेतु तुम्हें अपने समीप रखना
चाहता हूं. समस्त प्राणी मेरे समीप रहें. (५)
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगाय विश्वानि मा भूतान्युप तिष्ठन्तु युक्ता म आप स्थ.. (६)
हे जलो! तुम अग्नि के भाग हो. जलों से मुक्त भाग को एवं दिव्य तेज को हम में धारण
करो. अग्नि का भाग इस लोक के प्रजापति के तेज से युक्त हो. (६)
अग्नेर्भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽ स्मै लोकाय सादये.. (७)
हे जलो! तुम इंद्र के भाग को, जलों के वीर्य एवं दिव्य तेज को हम में स्थित करो. लोक
का कल्याण करने के लिए प्रजापति का तेज हम में धारण करो. (७)
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इन्द्रस्य भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (८)
हे दिव्य प्रवाह वाले जलो! तुम इंद्र के अंश हो. तेज जल का वीर्य है. तुम हम में तेज
स्थापित करो. तुम प्रजापति के निवास स्थान से पधारे हो. हम तुम्हें इस लोक में निश्चित
स्थान प्रदान करते हैं. (८)
सोमस्य भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (९)
हे जलो! तुम सोम के भाग हो, तुम जलों का वीर्य एवं दिव्य तेज हम में धारण करो.
लोक के कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित हो. (९)
वरुणस्य भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१०)
हे जलो! तुम वरुण के भाग हो. तुम जलों का वीर्य एवं दिव्य तेज हम में धारण करो.
तुम लोक के कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित हो. (१०)
मित्रावरुणयोर्भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (११)
हे जलो! तुम मित्र और वरुण के भाग हो. तुम जलों का वीर्य और दिव्य तेज हमें में
धारण करो. तुम लोक के कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित करो. (११)
यमस्य भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१२)
हे जलो! तुम यम के भाग हो. तुम जलों का वीर्य और दिव्य तेज हम में धारण करो. तुम
लोक कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित करो. (१२)
पितॄणां भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१३)
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हे जलो! तुम पितरों के भाग हो. तुम जलों का वीर्य और दिव्य तेज हम में धारण करो.
लोक के कल्याण के लिए तुम हम में प्रजापति का तेज स्थित करो. (१३)
देवस्य सवितुर्भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१४)
हे जलो! तुम सविता देव के भाग हो. तुम जलों का वीर्य एवं दिव्य तेज हम में धारण
करो. लोक कल्याण के निमित्त तुम हम में प्रजापति का तेज स्थित करो. (१४)
यो व आपो ऽ पां भागो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजन:.
इदं तमति सृजामि तं माध्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्म:.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१५)
हे जलो! तुम्हारा जो जलीय भाग यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य एवं देवों से
संयुक्त है, उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. वह जलीय भाग मुझे पुष्ट करे. मैं इस मंत्र
से होने वाले जादूटोने के द्वारा और जलरूप वस्त्र से आच्छादित कर के उन्हें नष्ट करता हूं.
(१५)
यो व आपो ऽ पामूर्मिरप्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजन:.
इदं तमति सृजामि तं माध्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्म:.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१६)
हे जलो! तुम्हारी जो लहरें यजुर्वेद के मंत्रों से सेवा करने योग्य एवं देवों से संयुक्त हैं, मैं
उन्हें अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. वे लहरें मुझे पुष्ट करें. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले
जादूटोने से और जल की लहरों रूपी शस्त्र से आच्छादित कर के उन्हें नष्ट करता हूं. (१६)
यो व आपो ऽ पां वत्सो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजन:.
इदं तमति सृजामि तं माध्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्म:.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१७)
हे जलो! तुम में जो जलों का वत्स है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है एवं
देवों से संयुक्त है. मैं उसे अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जलों के वे वत्स मुझे पुष्ट करें. मैं
इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के वत्स रूपी शस्त्र से आच्छादित कर के
उन्हें नष्ट करता हूं. (१७)
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यो व आपो ऽ पां वृषभो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजनः.
इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१८)
हे जलो! तुम में जो वृषभ अर्थात् बैल है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है
एवं देवों से संयुक्त है. उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जल का वृषभ मुझे पुष्ट करे.
मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के वृषभ रूपी शस्त्र से उन्हें नष्ट करता हूं.
(१८)
यो व आपो ऽ पां हिरण्यगर्भो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजनः.
इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१९)
हे जलो! तुम्हारे मध्य जो हिरण्यगर्भ है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है
एवं देवों से संयुक्त है. उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जल का हिरण्यगर्भ अंश मुझे
पुष्ट करे. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के हिरण्यगर्भ रूपी शस्त्र से
उन्हें नष्ट करता हूं. (१९)
यो व आपो ऽ पामश्मा पृश्रिर्दिव्यो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजनः.
इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (२०)
हे जलो! तुम में जो दिव्य पृश्रि अश्मा है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है
एवं देवों से संयुक्त है; उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जल का दिव्य पृश्रि अश्मा
अंश मुझे पुष्ट करे. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के दिव्य पृश्रि अश्मा
रूपी शस्त्र से उन्हें नष्ट करता हूं. (२०)
यो व आपो ऽ पामग्नयो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्या देवयजनाः.
इदं तानति सृजामि तान् माभ्यवनिक्षि.
तैस्तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (२१)
हे जलो! तुम में जो अग्नियां हैं, वे यजुर्वेद के मंत्रों के द्वारा सेवा करने योग्य एवं देवों
की संगति करने वाली हैं. उन्हें मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जलों की अग्नियां मुझे
पुष्ट करें. इस मंत्र की शक्ति से होने वाले जादूटोने के द्वारा और जल रूपी अस्त्र के द्वारा मैं
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अपने शत्रुओं को नष्ट करता हूं. (२१)
यदवाचीनं त्रैहायणादनृतं किं चोदिम.
आपो मा तस्मात् सर्वस्माद् दुरितात् पान्त्वंहसः.. (२२)
हम ने तीन वर्षों में जो झूठ बोला है, वह नवीन दुर्गति लाने वाला है. जल मुझे इस
समस्त पाप से बचाएं. (२२)
समुद्रं वः प्र हिणोमि स्वां योनिमपीतन.
अरिष्टाः सर्वहायसो मा च नः किं चनाममत्.. (२३)
हे जलो! मैं तुम्हें सागर की ओर जाने की प्रेरणा देता हूं. सागर तुम्हारा उत्पत्ति स्थान है.
तुम उस में मिल जाओ. सभी ओर गति वाले तुम हिंसा समाप्त करने वाले हो. हमें कोई नष्ट
न करे. (२३)
अरिप्रा आपो अप रिप्रमस्मत्.
प्रास्मदेनो दुरितं सुप्रतीकाः प्र दुष्वप्न्यं प्र मलं वहन्तु.. (२४)
हे शत्रुओं का विनाश करने वाले जलो! हमारे शत्रुओं का विनाश करो. तुम हमारे पाप
का विनाश करो एवं बुरे स्वप्न रूपी मैल को हम से दूर कर दो. (२४)
विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा पृथिवीसंशितो ऽ ग्नितेजाः.
पृथिवीमनु वि क्रमे ऽ हं पृथिव्यास्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२५)
तू विश्व का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू पृथ्वी पर आश्रित एवं
अग्नि का तेज है. मैं पृथ्वी पर विक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा पृथ्वी से उसे हटाता हूं. जो
हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उसे त्याग दें.
(२५)
विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा ऽ न्तरिक्षसंशितो वायुतेजाः.
अन्तरिक्षमनु वि क्रमे ऽ हमन्तरिक्षात् तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं
वयं द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२६)
तू विश्व का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू अंतरिक्ष पर आश्रित एवं
विश्व का तेज है. मैं अंतरिक्ष में पराक्रम दिखाता हूं एवं उसे अंतरिक्ष से दूर भगाता हूं. जो हम
से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उस का त्याग कर
दें. (२६)
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विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा द्यौसंशितः सूर्यतेजाः.
दिवमनु वि क्रमे ऽ हं दिवस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२७)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू द्युलोक में आश्रित एवं
सूर्य का तेज है. मैं द्युलोक में पराक्रम प्रदर्शित करता और उसे द्युलोक से बाहर निकालता हूं.
जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उसका
त्याग कर दें. (२७)
विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा दिक्संशितो मनस्तेजाः.
दिशो ऽ नु वि क्रमे ऽ हं दिग्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२८)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू दिशाओं में स्थित है एवं
मन का तेज है. मैं दिशाओं में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा दिशाओं से उसे हटाता हूं.
जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिससे द्वेष करते हैं, उसका विनाश हो. प्राण उसका
त्याग कर दें. (२८)
विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहाशासंशितो वाततेजाः.
आशा अनु वि क्रमे ऽहमाशाभ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२९)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू आकाश में स्थित है एवं
वायु का तेज है. मैं आकाश में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं और आकाश से उसे हटाता हूं.
जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं, उन का विनाश हो. प्राण उन का
त्याग कर दें. (२९)
विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नह ऋक्संशितः सामतेजाः.
ऋचो ऽनु वि क्रमे ऽहमृग्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३०)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रु का विनाश करने वाला है. तू ऋचाओं में स्थित है. सोम
तेरा तेज है. मैं आकाश के मध्य ऋचाओं में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं और ऋचाओं से
उसे हटाता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, उस का विनाश हो.
प्राण उस का त्याग कर दें. (३०)
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विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा यज्ञसंशितो ब्रह्मतेजाः.
यज्ञमनु वि क्रमे ऽ हं यज्ञात् तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३१)
तू विष्णु का तेज एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू यज्ञ में स्थित है एवं ब्रह्म का
तेज है. मैं ब्रह्म में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा ब्रह्म से उसे हटाता हूं. हम जिस से द्वेष
करते हैं अथवा जो हम से द्वेष करता है, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग कर दें. (३१)
विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहौषधीशितः सोमतेजाः.
ओषधीरनु वि क्रमे ऽ हमोषधीभ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३२)
तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाले हो. तुम ओषधि में आश्रित हो
एवं सोम के तेज हो. मैं ओषधियों में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा ओषधियों से
उसे हटाता हूं. मैं जिस से द्वेष करता हूं अथवा जो हम से द्वेष करता है. उस का विनाश हो.
प्राण उस का त्याग करें. (३२)
विष्णो क्रमो ऽ सि सपत्नहाप्सुसंशितो वरुणतेजाः.
अपो ऽ नु वि क्रमे ऽ हमद्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३३)
तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाले हो. तुम जलों में स्थित एवं
वरुण का तेज हो. मैं जलों में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा जलों से उसे हटाता हूं.
मैं जिस से द्वेष करता हूं अथवा जो मुझ से द्वेष करता है, उस का विनाश हो. प्राण उस का
त्याग करें. (३३)
विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा कृषिसंशितो ऽ न्नतेजाः.
कृषिमनु वि क्रमे ऽ ह कृष्यास्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३४)
तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रु विनाशकर्ता हो. तुम कृषि में स्थित एवं अन्न के तेज हो.
मैं कृषि में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा कृषि से उसे हटाता हूं. हम जिस से द्वेष
करते हैं अथवा जो हम से द्वेष करता है, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग करें. (३४)
विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा प्राणसंशितः पुरुषतेजाः.
प्राणमनु वि क्रमे ऽ हं प्राणात् तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
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स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३५)
तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रुविनाशकर्ता हो. तुम प्राणों में स्थित हो एवं पुरुष तुम्हारा
तेज है. हम प्राणों में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हैं और उसे प्राण से दूर करते हैं. जो हम
से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग कर
दें. (३५)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमभ्यष्ठां विश्वाः पृतना अरातीः.
इदमहमामुष्यायणस्यामुष्याः पुत्रस्य वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि
वेष्टयामीदमेनमधराज्चं पादयामि.. (३६)
जीते हुए पदार्थ हमारे हैं और लाए हुए सभी पदार्थ भी हमारे हैं. शत्रुओं की सभी सेनाएं
और शत्रु पराजित हो गए हैं. अमुक गोत्र में उत्पन्न एवं अमुक माता का पुत्र यह मेरा शत्रु है.
मैं इस के वर्च, तेज, प्राण एवं आयु को घेरता हूं तथा इस शत्रु को पराजित करता हूं. (३६)
सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते दक्षिणामन्वावृतम्.
सा मे द्रविणं यच्छतु सा मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (३७)
जो मार्ग दक्षिण में फैला हुआ है और जिसे सूर्य ने आवृत किया हुआ है, मैं उस मार्ग का
अनुगमन करता हूं. यह दक्षिण दिशा मुझे धन एवं ब्रह्म तेज प्रदान करे. (३७)
दिशो ज्योतिष्मतीरभ्यावर्ते. ता मे द्रविणं यच्छन्तु ता मे ब्राह्मणवर्चसम्..
(३८)
मैं प्रकाश से पूर्व दिशाओं का अनुवर्तन करता हूं. वे दिशाएं मुझे धन प्रदान करें एवं ब्रह्म
तेज दें. (३८)
सप्तऋषीनभ्यावर्ते. ते मे द्रविणं यच्छन्तु ते मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (३९)
मैं सप्त ऋषियों का अनुवर्तन करता हूं. वे मुझे धन प्रदान करें एवं ब्रह्म तेज दें. (३९)
ब्रह्माभ्यावर्ते. तन्मे द्रविणं यच्छतु तन्मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (४०)
मैं ब्रह्म का अनुवर्तन करता हूं. वह मुझे धन प्रदान करे और ब्रह्म तेज दे. (४०)
ब्राह्मणाँ अभ्यावर्ते. ते मे द्रविणं यच्छन्तु ते मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (४१)
मैं ब्राह्मणों के अनुकूल आचरण करता हूं. वे ब्राह्मण मुझे धन एवं ब्रह्म तेज प्रदान करे.
(४१)
यं वयं मृगयामहे तं वधै स्तृणवामहै.
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व्यात्ते परमेष्ठिनो ब्रह्मणापीपदाम तम्.. (४२)
हम जिसे खोज रहे हैं, उसे वध के साधन अर्थात् आयुधों के द्वारा नष्ट करें. हम मंत्र बल
से उसे परमेष्ठी अर्थात् ब्रह्म की दाढ़ के नीचे डाल दें. (४२)
वैश्वानरस्य दंष्ट्राभ्यां हेतिस्तं समधादभि.
इयं तं प्सात्वाहूतिः समिद् देवी सहीयसी.. (४३)
वैश्वानर अर्थात् अग्नि की जो दाढ़ आयुध के समान है, हम शत्रु को उस में धारण करते
हैं अर्थात् रखते हैं. उस शत्रु का नाश कर के अग्नि में जो समिधा डाली जाती है, वह दिव्य
समिधा शत्रु को दूर भगाने में समर्थ है. (४३)
राज्ञो वरुणस्य बन्धो ऽ सि. सो ३ मुमामुष्यायणममुष्याः
पुत्रमन्ने प्राणे बधान.. (४४)
तू राजा वरुण के बंधन में पड़ा है. वे इस गोत्र वाले एवं अमुक माता के पुत्र को अन्न
और प्राण के बंधन में बांधते हैं. (४४)
यत् ते अन्नं भुवस्पत आक्षियति पृथिवीमनु.
तस्य नस्त्वं भुवस्पते संप्रयच्छ प्रजापते.. (४५)
हे पृथ्वी के स्वामी! तुम्हारा जो अन्न पृथ्वी पर बिखरा हुआ है, वह पृथ्वी के स्वामी
प्रजापति हमें प्रदान करें. (४५)
अपो दिव्या अचायिषं रसेन समपृक्ष्महि.
पयस्वानग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा.. (४६)
हे दिव्य जलो! मैं तुम से याचना करता हूं. तुम मुझे अपने रस से संयुक्त करो. हे अग्नि
देव! मैं अन्न ले कर आ रहा हूं. तुम मुझे तेज से युक्त बनाओ. (४६)
सं मा ऽ ग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा.
विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात् सह ऋषिभिः.. (४७)
हे अग्नि देव! तुम मुझे तेज से युक्त करो एवं संतान प्रदान करो. समस्त देव मेरे इस
भाव को जानें. ऋषियों के साथ-साथ इंद्र भी मेरे इस भाव को जानें. (४७)
यदग्ने अद्य मिथुना शपातो यद्वाचस्तृष्टं जनयन्त रेभाः.
मन्योर्मनसः शरव्या ३ जायते या तया विध्य हृदये यातुधानान्.. (४८)
हे अग्नि देव! जो लोग एकत्र हो कर हमें गालियां दे रहे हैं तथा जो बोलने वाले दोष पूर्ण
वाणी का उच्चारण कर रहे हैं, जो शत्रु अपने क्रोधपूर्ण हृदयों के कारण तुम्हारे बाणों के लक्ष्य
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बन रहे हैं, अपने ज्वाला रूप बाणों से उन के हृदयों को भेद दो. (४८)
परा शृणीहि तपसा यातुधानान् परा ऽग्ने रक्षो हरसा शृणीहि.
परा ऽर्चिषा मूरेदेवांछृणीहि परासु तृपः शोशुचतः शृणीहि.. (४९)
हे अग्नि देव! अपनी ज्वालाओं से इन राक्षसों को दूर भगा दो एवं इन्हें नष्ट कर दो. तुम
अपनी लपटों से मूर्खों को दूर भगा दो. जो दूसरों के प्राणों को नष्ट कर के संतुष्ट होते हैं, तुम
उन का संहार करो. (४९)
अपामस्मै वज्रं प्र हरामि चतुर्भृष्टिं शीर्षभिद्याय विद्वान्.
सो अस्याङ्गानि प्र शृणातु सर्वा तन्मे देवा अनु जानन्तु विश्वे.. (५०)
इन मंत्रों को जानने वाला मैं इस शत्रु का सिर तोड़ने के लिए उस वज्र का प्रहार करता
हूं, जो जलों के चारों ओर विनाश करने वाला है. वह वज्र इस शत्रु के सभी अंगों को काट दे.
मेरा यह कर्म समस्त देव अनुकूलता से जानें अर्थात् उचित समझें. (५०)
सूक्त-६ देवता—वनस्पतिफला मणि
अरातीयोर्भ्रातृव्यस्य दुर्हृदो द्विषतः शिरः. अपि वृश्चाम्योजसा.. (१)
बंधुओं में जो मेरा शत्रु, दुष्ट हृदय वाला और द्वेष करने वाला है, उस का शीश भी मैं वेग
से तोड़ता हूं. (१)
वर्म मह्यमयं मणिः फालाज्जातः करिष्यति.
पूर्णो मन्थेन माग मद् रसेन सह वर्चसा.. (२)
फाल से उत्पन्न यह मणि मेरे लिए कवच बन कर रक्षा करेगी. मंथन की सामर्थ्य एवं रस
बल से युक्त होने के कारण समर्थ यह मणि मेरे पास आई है. (२)
यत् त्वा शिक्कः परा ऽ वधीत् तक्षा हस्तेन वास्या.
आपस्त्वा तस्माज्जीवलाः पुनन्तु शुचयः शुचिम्.. (३)
कुशल बढ़ई जो तुझे औजार सहित हाथ से मारता है अर्थात् छील कर तेरा निर्माण
करता है, इसी कारण जीवन देने वाले एवं पवित्र जल तुझे शुद्ध करें और पवित्र बनाएं. (३)
हिरण्यस्रगयं मणिः श्रद्धां यज्ञं महो दधत्. गृहे वसतु नो ऽ तिथिः.. (४)
सुवर्ण की माला से युक्त यह मणि श्रद्धा, यज्ञ एवं तेज को धारण करती हुई हमारे घर में
अतिथि बन कर निवास करे. (४)
तस्मै घृतं सुरां मध्वन्नमन्नं क्षदामहे.
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स नः पितेव पुत्रेभ्यः श्रेयः श्रेयश्चिकित्सतु भूयोभूयः श्वः श्वोः देवेभ्यो
मणिरेत्य.. (५)
हम इस अतिथि के लिए घृत, मदिरा, शहद और अन्न देते हैं. जिस प्रकार पिता पुत्र को
परम कल्याण देता है, उसी प्रकार यह मणि मुझे कल्याण दे. यह मणि देवों के समीप से मेरे
पास आ कर बारबार और प्रतिदिन मुझे सुख प्रदान करे. (५)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे.
तमग्निः प्रत्यमुञ्चत सो अस्मै दुह आज्यं भूयोभूयः श्वः श्वस्तेन त्वं द्विषतो
जहि.. (६)
यह मणि फाल से उत्पन्न, घृत टपकाने वाली, बल युक्त एवं खदिर अर्थात् खैर वृक्ष की
लकड़ी से बनी है. बृहस्पति ने बल प्राप्ति के लिए इसे बांधा था. अग्नि ने यह मणि मुझे दी है.
हे यजमान! यह मणि तुझे बारबार और प्रतिदिन बल प्रदान करे, जिस से तू प्रतिदिन एवं
बारबार शत्रुओं का विनाश कर सके. (६)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे.
तमिन्द्रः प्रत्यमुञ्चत्तौजसे वीर्याय कम्.
सो अस्मै बलमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (७)
यह मणि फाल से उत्पन्न, घृत टपकाने वाली, बल युक्त एवं खदिर अर्थात् खैर वृक्ष की
लकड़ी से बनी है. बृहस्पति ने बल प्राप्ति के लिए इसे बांधा था. इंद्र ने बल, वीर्य और सुख
प्रदान करने हेतु इस मणि को मुझे दिया है. हे यजमान! यह मणि बारबार और प्रतिदिन तुझे
बल प्रदान करे. उस बल की सहायता से तू शत्रुओं का विनाश करे. (७)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे.
तं सोमः प्रत्यमुञ्चत महे श्रोत्राय चक्षसे.
सो अस्मै वर्च इद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (८)
बृहस्पति ने जिस फाल से उत्पन्न, घी टपकाने वाली, शक्तिशालिनी एवं खैर वृक्ष की
लकड़ी से बनी मणि को बल प्राप्त करने के लिए बांधा था, उसे सोम ने महत्त्व, सुनने की
शक्ति और उत्तम दृष्टि पाने के लिए मुझे प्रदान किया है. हे यजमान! यह मणि तुझे बारबार
एवं प्रतिदिन तेज प्रदान करे, जिस की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर सके. (८)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे.
तं सूर्यः प्रत्यमुञ्चत तेनेमा अजयद् दिशः.
सो अस्मै भूतिमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (९)
बृहस्पति ने फाल से उत्पन्न, घी टपकाने वाली, शक्तिशालिनी एवं खैर वृक्ष की लकड़ी
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