अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइंद्र, मित्र, वरुण, वायु और पर्जन्य अर्थात् बादल ने सर्प को मेरे वश में कर दिया है.
(१६)
इन्द्रो मे ऽ हिमरन्धयत् पृदाकुं च पृदाक्वम्.
स्वजं तिरश्चिराजिं कसर्णीलं दशोनसिम्.. (१७)
इंद्र ने मेरे कल्याण के हेतु पृदाकू, पृदाक्व, स्वज तिरश्चिराजी, कसर्णील एवं दशोनसि
नामक सर्पों को मेरे वश में कर दिया है. (१७)
इन्द्रो जघान प्रथमं जनितारमहे तव.
तेषामु तृह्यमाणानां कः स्वित् तेषामसद् रसः.. (१८)
हे सर्प! इंद्र ने सब से पहले तेरे जन्म देने वालों को मारा था. उन सर्पों के विनाश के
समय किस सर्प में विष शेष रहा? (१८)
सं हि शीर्षाण्यग्रभं पौञ्जिष्ठ इव कर्वराम्.
सिन्धोर्मध्यं परेत्य व्यनिजमहेर्विषम्.. (१९)
केवट जिस प्रकार पतवार को ग्रहण करता है, उसी प्रकार मैं ने सर्प शीश पकड़ लिए
हैं. मैं ने सिंधु के मध्य भाग से लौट कर सर्प के विष को प्रभावहीन बना दिया है. (१९)
अहीनां सर्वेषां विषं परा वहन्तु सिन्धवः.
हतास्तिरश्चिराजयो निपिष्टासः पृदाकवः.. (२०)
सभी नदियां सर्पों के विष को अपने जल के साथ बहा ले जाएं. तिरश्चिराजी नामक सर्प
नष्ट हो गए और पृदाकू नामक सर्प पीस डाले गए. (२०)
ओषधीनामहं वृण उर्वरीरिव साधुया.
नयाम्यर्वतीरिवाहे निरैतु ते विषम्.. (२१)
मैं अपनी उत्तम बुद्धि के द्वारा उपजाऊ भूमि पर उगी हुई जड़ीबूटियों को स्वीकार कर
के उन्हें इस प्रकार प्रेरित करता हूं, जिस प्रकार वेग वाली नदियां बहती हैं. हे सर्प! उन
जड़ीबूटियों से विष समाप्त हो जाए. (२१)
यदग्नौ सूर्ये विषं पृथिव्यामोषधीषु यत्.
कान्दाविषं कनन्ककं निरैत्वैतु ते विषम्.. (२२)
अग्नि में, सूर्य में, पृथ्वी में तथा जड़ीबूटियों में जो विष है, वह तथा कंदों का विष
पूर्णतया नष्ट हो जाए. (२२)
ये अग्निजा ओषधिजा अहीनां ये अप्सुजा विद्युत आबभूवूः.
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