अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या.
तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः.. (३१)
देवों की नगरी आठ चक्रों और नौ द्वारों वाली है. कोई युद्ध कर के उसे जीत नहीं
सकता. उस में हिरण्यमय कोष और प्रकाश से ढका हुआ स्वर्ण है. (३१)
तस्मिन् हिरण्यये कोशे त्र्यरे त्रिप्रतिष्ठिते.
तस्मिन् यद् यक्षमात्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः.. (३२)
उस नौ द्वारों वाले हिरण्यमय कोष में जो आत्मा स्थित है, वहां जो यज्ञ का विस्तार
करते हैं, वे ही ब्रह्मज्ञानी माने जाते हैं. (३२)
प्रभ्राजमानां हरिणीं यशसा संपरीवृताम्.
पुरं हिरण्ययीं ब्रह्मा विवेशापराजिताम्.. (३३)
उस प्रकाशमान, पाप का विनाश करने वाली, यश से ढकी हुई एवं हिरण्यमय पुरी में
ब्रह्म प्रवेश करता है. (३३)
सूक्त-३ देवता—वरणमणि, वनस्पति
अयं मे वरणो मणिः सपत्नक्षयणो वृषा.
तेना रभस्व त्वं शत्रून् प्र मृणीहि दुरस्यतः.. (१)
यह मेरी वरण वृक्ष की मणि शत्रुओं का नाश करने वाली और अभिलाषा पूरक है. इसे
धारण कर के तू उद्योग कर और दुष्टता करने वाले शत्रुओं का विनाश कर. (१)
प्रैणान्छृणीहि प्र मृणा रभस्व मणिस्ते अस्तु पुरएता पुरस्तात्.
अवारयन्त वरणेन देवा अभ्याचारमसुराणां श्वः श्वः.. (२)
तू इन शत्रुओं का विनाश कर, इन्हें मसल दे और प्रसन्न बन. यह मणि तेरे आगेआगे
चले. वरण वृक्ष से निर्मित इस मणि की सहायता से देवों ने असुरों द्वारा किए गए जादूटोनों
का दूसरे दिन ही निवारण कर दिया था. (२)
अयं मणिवरणो विश्वभेषजः सहस्राक्षो हरितो हिरण्ययः.
स ते शत्रूनधरान् पादयाति पूर्वस्तान् दभ्नुहि ये त्वा द्विषन्ति.. (३)
वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि समस्त रोगों की ओषधि है. यह मणि हजार आंखों वाले
इंद्र के समान शक्तिशालीनी, हरे रंग की और हिरण्यमय है. यह मणि तेरे शत्रुओं को मार
डाले, उस से पहले ही तू उन का विनाश कर दे. (३)
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