अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextबन रहे हैं, अपने ज्वाला रूप बाणों से उन के हृदयों को भेद दो. (४८)
परा शृणीहि तपसा यातुधानान् परा ऽग्ने रक्षो हरसा शृणीहि.
परा ऽर्चिषा मूरेदेवांछृणीहि परासु तृपः शोशुचतः शृणीहि.. (४९)
हे अग्नि देव! अपनी ज्वालाओं से इन राक्षसों को दूर भगा दो एवं इन्हें नष्ट कर दो. तुम
अपनी लपटों से मूर्खों को दूर भगा दो. जो दूसरों के प्राणों को नष्ट कर के संतुष्ट होते हैं, तुम
उन का संहार करो. (४९)
अपामस्मै वज्रं प्र हरामि चतुर्भृष्टिं शीर्षभिद्याय विद्वान्.
सो अस्याङ्गानि प्र शृणातु सर्वा तन्मे देवा अनु जानन्तु विश्वे.. (५०)
इन मंत्रों को जानने वाला मैं इस शत्रु का सिर तोड़ने के लिए उस वज्र का प्रहार करता
हूं, जो जलों के चारों ओर विनाश करने वाला है. वह वज्र इस शत्रु के सभी अंगों को काट दे.
मेरा यह कर्म समस्त देव अनुकूलता से जानें अर्थात् उचित समझें. (५०)
सूक्त-६ देवता—वनस्पतिफला मणि
अरातीयोर्भ्रातृव्यस्य दुर्हृदो द्विषतः शिरः. अपि वृश्चाम्योजसा.. (१)
बंधुओं में जो मेरा शत्रु, दुष्ट हृदय वाला और द्वेष करने वाला है, उस का शीश भी मैं वेग
से तोड़ता हूं. (१)
वर्म मह्यमयं मणिः फालाज्जातः करिष्यति.
पूर्णो मन्थेन माग मद् रसेन सह वर्चसा.. (२)
फाल से उत्पन्न यह मणि मेरे लिए कवच बन कर रक्षा करेगी. मंथन की सामर्थ्य एवं रस
बल से युक्त होने के कारण समर्थ यह मणि मेरे पास आई है. (२)
यत् त्वा शिक्कः परा ऽ वधीत् तक्षा हस्तेन वास्या.
आपस्त्वा तस्माज्जीवलाः पुनन्तु शुचयः शुचिम्.. (३)
कुशल बढ़ई जो तुझे औजार सहित हाथ से मारता है अर्थात् छील कर तेरा निर्माण
करता है, इसी कारण जीवन देने वाले एवं पवित्र जल तुझे शुद्ध करें और पवित्र बनाएं. (३)
हिरण्यस्रगयं मणिः श्रद्धां यज्ञं महो दधत्. गृहे वसतु नो ऽ तिथिः.. (४)
सुवर्ण की माला से युक्त यह मणि श्रद्धा, यज्ञ एवं तेज को धारण करती हुई हमारे घर में
अतिथि बन कर निवास करे. (४)
तस्मै घृतं सुरां मध्वन्नमन्नं क्षदामहे.
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