अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयेषां जातानि बहुधा महान्ति तेभ्यः सर्पेभ्यो नमसा विधेम.. (२३)
अग्नि, जड़ीबूटियों, जल एवं सर्पों में जो विष है तथा जिन के द्वारा भयानक कर्म हुए
हैं, हम उन सभी सर्पों को हव्य द्वारा तृप्त करते हैं. (२३)
तौदी नामासि कन्या घृताची नाम वा असि.
अधस्पदेन ते पदमा ददे विषदूषणम्.. (२४)
हे जड़ीबूटी! तू तौदी और घृताची नाम वाली हो. नीचे की ओर किए गए अपने पैर के
द्वारा मैं विष समाप्त करता हूं और सभी को वश में करता हूं. (२४)
अङ्गादङ्गात् प्र च्यावय हृदयं परि वर्जय.
अधा विषस्य यत् तेजो ऽ वाचीनं तदेतु ते.. (२५)
हे रोगी! तू अपने प्रत्येक अंग से विष को टपकाता हुआ अपने हृदय की रक्षा कर. विष
का जो तेज है, वह अधोगति को प्राप्त हो कर नष्ट हो जाए. (२५)
आरे अभूद् विषमरीद् विषे विषमप्रागपि.
अग्निर्विषमहेर्निंरधात् सोमो निरणयीत्.
दंष्टारमन्वगाद् विषमहिरमृत्.. (२६)
नवीन विष भी प्राचीन विष में मिल कर रुक गया है. इस प्रकार विष नष्ट हो चुका है.
अग्नि ने सांप के विष को नष्ट कर दिया है. सोम सर्प के विष को दूर ले गया है. काटने वाले
सांप को ही उस का विष प्राप्त हुआ, जिस से उस की मृत्यु हो गई. (२६)
सूक्त-५ देवता—जल
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगाय ब्रह्मयोगैर्वो युनज्मि.. (१)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो
तथा तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं तुम्हें ब्रह्म योगों से युक्त कर के विजय दिलाने वाले योग की
क्षमता वाला बनाता हूं. (१)
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगाय क्षत्रयोगैर्वो युनज्मि.. (२)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो
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