Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 544 of 1063

Read in context
Page 544

व्यात्ते परमेष्ठिनो ब्रह्मणापीपदाम तम्.. (४२)
हम जिसे खोज रहे हैं, उसे वध के साधन अर्थात् आयुधों के द्वारा नष्ट करें. हम मंत्र बल
से उसे परमेष्ठी अर्थात् ब्रह्म की दाढ़ के नीचे डाल दें. (४२)
वैश्वानरस्य दंष्ट्राभ्यां हेतिस्तं समधादभि.
इयं तं प्सात्वाहूतिः समिद् देवी सहीयसी.. (४३)
वैश्वानर अर्थात् अग्नि की जो दाढ़ आयुध के समान है, हम शत्रु को उस में धारण करते
हैं अर्थात् रखते हैं. उस शत्रु का नाश कर के अग्नि में जो समिधा डाली जाती है, वह दिव्य
समिधा शत्रु को दूर भगाने में समर्थ है. (४३)
राज्ञो वरुणस्य बन्धो ऽ सि. सो ३ मुमामुष्यायणममुष्याः
पुत्रमन्ने प्राणे बधान.. (४४)
तू राजा वरुण के बंधन में पड़ा है. वे इस गोत्र वाले एवं अमुक माता के पुत्र को अन्न
और प्राण के बंधन में बांधते हैं. (४४)
यत् ते अन्नं भुवस्पत आक्षियति पृथिवीमनु.
तस्य नस्त्वं भुवस्पते संप्रयच्छ प्रजापते.. (४५)
हे पृथ्वी के स्वामी! तुम्हारा जो अन्न पृथ्वी पर बिखरा हुआ है, वह पृथ्वी के स्वामी
प्रजापति हमें प्रदान करें. (४५)
अपो दिव्या अचायिषं रसेन समपृक्ष्महि.
पयस्वानग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा.. (४६)
हे दिव्य जलो! मैं तुम से याचना करता हूं. तुम मुझे अपने रस से संयुक्त करो. हे अग्नि
देव! मैं अन्न ले कर आ रहा हूं. तुम मुझे तेज से युक्त बनाओ. (४६)
सं मा ऽ ग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा.
विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात् सह ऋषिभिः.. (४७)
हे अग्नि देव! तुम मुझे तेज से युक्त करो एवं संतान प्रदान करो. समस्त देव मेरे इस
भाव को जानें. ऋषियों के साथ-साथ इंद्र भी मेरे इस भाव को जानें. (४७)
यदग्ने अद्य मिथुना शपातो यद्वाचस्तृष्टं जनयन्त रेभाः.
मन्योर्मनसः शरव्या ३ जायते या तया विध्य हृदये यातुधानान्.. (४८)
हे अग्नि देव! जो लोग एकत्र हो कर हमें गालियां दे रहे हैं तथा जो बोलने वाले दोष पूर्ण
वाणी का उच्चारण कर रहे हैं, जो शत्रु अपने क्रोधपूर्ण हृदयों के कारण तुम्हारे बाणों के लक्ष्य
ebook converter DEMO Watermarks*