अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 532 of 1063
Read in contextअव श्वेत पदा जहि पूर्वेण चापरेण च.
उदप्लुतमिव दार्वहीनामरसं विषं वारुग्रम्... (३)
हे श्वेतपद! तू अपने अगले एवं पिछले पैरों के द्वारा सर्पों का विनाश कर. गिरता हुआ
काष्ठ जिस प्रकार शक्ति से हीन हो जाता है, उसी प्रकार सर्प विष प्रभावहीन हो जाता है. हे
दर्भ! तू इस भयानक सर्प विष का निवारण कर. (३)
अरंघुषो निमज्योन्मज्य पुनरब्रवीत्.
उदप्लुतमिव दार्वहीनामरसं विषं वारुग्रम्.. (४)
अरंघुष नाम की ओषधि ने पानी में डुबकी लगाई और ऊपर आ कर कहा कि जिस
प्रकार गिरता हुआ काष्ठ शक्तिहीन होता है, उसी प्रकार सर्पों का विष भी प्रभावहीन हो जाए.
हे कुश! तू इस भयानक सर्प विष का निवारण कर. (४)
पैद्वो हन्ति कसार्णीलं पैद्वः श्वित्रमुतासितम्.
पैद्वो रथर्व्याः शिरः सं बिभेद पृदाक्वाः.. (५)
पैद्व नामक ओषधि कसार्णील नामक सर्प को, श्वेत सर्प को और काले सर्प को नष्ट
करती है. पैद्व ने रथर्व्या और पृदाकू नामक नागों का सिर तोड़ दिया था. (५)
पैद्व प्रेहि प्रथमो ऽ नु त्वा वयमेमसि.
अहीन् व्यस्यतात् पथो येन स्मा वयमेमसि.. (६)
हे पैद्व! तुम सर्वश्रेष्ठ हो. हम तुम्हारी प्रार्थना करते हैं. तुम यहां आओ. हम जिस मार्ग से
आतेजाते हैं, तुम उस मार्ग से सर्पों को दूर भगा दो. (६)
इदं पैद्वो अजायतेदमस्य परायणम्.
इमान्यर्वतः पदा ऽ हिघ्न्यो वाजिनीवतः.. (७)
यह पैद्व उत्पन्न हुआ है. यह इस के आश्रय में है. वह इन शीघ्र चलने वाले सर्पों का
निवर्तन करने वाला है. (७)
संयतं न वि ष्वरद् व्यात्तं न सं यमत्.
अस्मिन् क्षेत्रे द्वावही सी च पुमांश्च तावुभावरसा.. (८)
सर्प का बंद मुख हमें डसने के लिए न खुले. इस क्षेत्र में निवास करने वाले नर और
मादा सर्प अर्थात् सांप और सांपिन मंत्र की शक्ति से शक्तिहीन हो जाएं. (८)
अरसास इहाहयो ये अन्ति ये च दूरके.
घनेन हन्मि वृश्चिकमहिं दण्डेनागतम्.. (९)
ebook converter DEMO Watermarks*