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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 543 of 1063

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Page 543

स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३५)
तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रुविनाशकर्ता हो. तुम प्राणों में स्थित हो एवं पुरुष तुम्हारा
तेज है. हम प्राणों में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हैं और उसे प्राण से दूर करते हैं. जो हम
से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग कर
दें. (३५)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमभ्यष्ठां विश्वाः पृतना अरातीः.
इदमहमामुष्यायणस्यामुष्याः पुत्रस्य वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि
वेष्टयामीदमेनमधराज्चं पादयामि.. (३६)
जीते हुए पदार्थ हमारे हैं और लाए हुए सभी पदार्थ भी हमारे हैं. शत्रुओं की सभी सेनाएं
और शत्रु पराजित हो गए हैं. अमुक गोत्र में उत्पन्न एवं अमुक माता का पुत्र यह मेरा शत्रु है.
मैं इस के वर्च, तेज, प्राण एवं आयु को घेरता हूं तथा इस शत्रु को पराजित करता हूं. (३६)
सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते दक्षिणामन्वावृतम्.
सा मे द्रविणं यच्छतु सा मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (३७)
जो मार्ग दक्षिण में फैला हुआ है और जिसे सूर्य ने आवृत किया हुआ है, मैं उस मार्ग का
अनुगमन करता हूं. यह दक्षिण दिशा मुझे धन एवं ब्रह्म तेज प्रदान करे. (३७)
दिशो ज्योतिष्मतीरभ्यावर्ते. ता मे द्रविणं यच्छन्तु ता मे ब्राह्मणवर्चसम्..
(३८)
मैं प्रकाश से पूर्व दिशाओं का अनुवर्तन करता हूं. वे दिशाएं मुझे धन प्रदान करें एवं ब्रह्म
तेज दें. (३८)
सप्तऋषीनभ्यावर्ते. ते मे द्रविणं यच्छन्तु ते मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (३९)
मैं सप्त ऋषियों का अनुवर्तन करता हूं. वे मुझे धन प्रदान करें एवं ब्रह्म तेज दें. (३९)
ब्रह्माभ्यावर्ते. तन्मे द्रविणं यच्छतु तन्मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (४०)
मैं ब्रह्म का अनुवर्तन करता हूं. वह मुझे धन प्रदान करे और ब्रह्म तेज दे. (४०)
ब्राह्मणाँ अभ्यावर्ते. ते मे द्रविणं यच्छन्तु ते मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (४१)
मैं ब्राह्मणों के अनुकूल आचरण करता हूं. वे ब्राह्मण मुझे धन एवं ब्रह्म तेज प्रदान करे.
(४१)
यं वयं मृगयामहे तं वधै स्तृणवामहै.
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