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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages
Page 483Permalink

आज्यं बिभर्ति घृतमस्य रेतः साहस्रः पोषस्तमु यज्ञमाहुः.
इन्द्रस्य रूपमृषभो वसानः सो अस्मान् देवाः शिव ऐतु दत्तः.. (७)
यह बैल आज्य अर्थात् यज्ञ के कारण रूप दूध आदि को धारण करता है. घृत इस का
वीर्य है. यह जिन सहस्रों पुष्टियों को प्रदान करता है, उन्हीं को यज्ञ कहा जाता है. हे देवो! इंद्र
का रूप धारण करता हुआ एवं यजमान के द्वारा दिया हुआ यह बैल हमारे लिए शुभ हो. (७)
इन्द्रस्यौजो वरुणस्य बाहू अश्विनोरंसौ मरुतामियं ककुत्.
बृहस्पतिं संभृतमेतमाहुर्ये धीरासः कवयो ये मनीषिणः.. (८)
जो धीर, मनीषी एवं विद्वान् पुरुष हैं, वे बताते हैं कि इस बैल का ओज अर्थात् बल इंद्र
का भाग है, इस के बाहु अर्थात् पैर वरुण के भाग हैं, इस का कंधा अश्विनीकुमारों का भाग है
और इस की ठाट मरुतों का भाग है. इस का संभृत बृहस्पति का भाग है. (८)
दैवीर्विशः पयस्वाना तनोषि त्वामिन्द्रं त्वां सरस्वन्तमाहुः.
सहस्रं स एकमुखा ददाति यो ब्राह्मण ऋषभमाजुहोति.. (९)
हे बैल! तू अपने दूध आदि से देवों का विस्तार करता है. तुझे इंद्र एवं सारस्वत कहा
गया है. जो ब्राह्मण मंत्रों द्वारा संपन्न होने वाले यज्ञ में बैल का दान करता है, वह एक मुख
वाली हजारों गायों के दान का पुण्य प्राप्त करता है. (९)
बृहस्पतिः सविता ते वयो दधौ त्वष्टुर्वायोः पर्यात्मा त आभृतः.
अन्तरिक्षे मनसा त्वा जुहोमि बर्हिष्टे द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (१०)
बृहस्पति एवं सविता ने तेरी आयु को धारण किया है. त्वष्टा एवं वायु ने तेरे संपूर्ण शरीर
में आत्मा को धारण किया है. मैं मन से अंतरिक्ष में तेरी आहुति देता हूं. धरती तथा आकाश
दोनों तेरे बर्हि अर्थात् कुश हों. (१०)
य इन्द्र इव देवेषु गोष्वेति विवावदत्.
तस्य ऋषभस्याङ्गानि ब्रह्मा सं स्तौतु भद्रया.. (११)
जिस प्रकार इंद्र देवों के मध्य में आते हैं, उसी प्रकार यह बैल गर्जन करता हुआ गायों
के मध्य जाता है. ब्रह्मा अपनी मंत्रमयी कल्याणी वाणी से इस बैल के अंगों की स्तुति करें.
(११)
पार्श्वे आस्तामनुमत्या भगस्यास्तामनूवृजौ.
अष्ठीवन्तावब्रवीन्मित्रो ममैतौ केवलाविति.. (१२)
इस बैल के पार्श्व अर्थात् दोनों ओर के भाग अनुमति के हैं तथा इस के अनुबृज अर्थात्
पीछे चलने वाले भाग अग्नि देव के हैं. मित्र देव ने कहा था कि बैल के केवल टखने मेरे भाग
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हैं. (१२)
भसदासीदादित्यानां श्रोणी आस्तां बृहस्पतेः.
पुच्छं वातस्य देवस्य तेन धूनोत्योषधीः.. (१३)
बैल की कमर आदित्यों की, पीठ बृहस्पति की तथा पूंछ वायु देव की है. उसी से यह
जड़ीबूटियों को कंपित करता है. (१३)
गुदा आसन्त्सिनीवाल्याः सूर्यायास्त्वचमब्रुवन्.
उत्थातुरब्रुवन् पद ऋषभं यदकल्पयन्.. (१४)
बैल की गुदा सिनीवाली अर्थात् अमावस्या का भाग है एवं त्वचा को सूर्य की पत्नी सूर्या
का भाग कहा गया है. इस के पैर उत्थाता का भाग कहे गए हैं. इस प्रकार ऋषियों ने बैल की
कल्पना की. (१४)
क्रोड आसीज्जामिशंसस्य सोमस्य कलशो धृतः.
देवाः संगत्य यत् सर्व ऋषभं व्यकल्पयन्.. (१५)
बैल की गुदा सिनीवाली का भाग थी तथा धारण किया गया कलश सोम का भाग था.
सभी देवों ने एकत्र हो कर इस प्रकार बैल की कल्पना की थी. (१५)
ते कुष्ठिकाः सरमायै कूर्मेभ्यो अदधुः शफान्.
ऊबध्यमस्य कीटेभ्यः श्ववर्तेभ्या अधारयन्.. (१६)
उन बैलों ने सरमा के लिए कुष्ठिकाओं को तथा कर्मों के लिए खुरों को धारण किया.
उन्होंने बैल के ऊपर के भाग को खानों और कीड़ों के लिए धारण किया. (१६)
शृङ्गाभ्यां रक्ष ऋषत्यवर्तिं हन्ति चक्षुषा.
शृणोति भद्रं कर्णाभ्यां गवां यः पतिरघ्न्यः.. (१७)
जो बैल हिंसा न करने योग्य गायों का पति है, वह अपने सींगों से राक्षसों को तथा नेत्रों
से दरिद्रता को दूर भगाता है. वह अपने कानों से कल्याणकारी बातें सुनता है. (१७)
शतयाजं स यजते नैनं दुन्वन्त्यग्नयः.
जिन्वन्ति विश्वे तं देवा यो ब्राह्मण ऋषभमाजुहोति.. (१८)
जो ब्राह्मण बैल का दान करता है, वह शतयाज नामक यज्ञ करने का पुण्य प्राप्त करता
है. उसे अग्नि देव संताप नहीं देते और सभी देव उसे संतुष्ट करते हैं. (१८)
ब्राह्मणेभ्य ऋषभं दत्त्वा वरीयः कृणुते मनः.
पुष्टिं सो अघ्न्यानां स्वे गोष्ठे ऽ व पश्यते.. (१९)
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जो व्यक्ति ब्राह्मणों को बैल का दान कर के अपने मन को उदार बनाता है, वह अपनी
गोशाला में गायों की समृद्धि देखता है. (१९)
गावः सन्तु प्रजाः सन्त्वथो अस्तु तनूबलम्.
तत् सर्वमनु मन्यन्तां देवा ऋषभदायिने.. (२०)
गाएं हों, संतानें हों तथा शरीर में शक्ति हो. बैल का दान करने वाले के लिए देवगण यह
सब प्रदान करें. (२०)
अयं पिपान इन्द्र इद् रयिं दधातु चेतनीम्.
अयं धेनुं सुदुघां नित्यवत्सां वशां दुहां विपश्चितं परो दिवः.. (२१)
हवि प्राप्त करने वाले इंद्र यजमान को ज्ञान रूपी धन के अतिरिक्त सरलता से दुही जाने
वाली एवं सदा बछड़ों को जन्म देने वाली गाय तथा स्वर्ग प्रदान करें. (२१)
पिशङ्गरूपो नभसो वयोधा ऐन्द्रः शुष्मो विश्वरूपो न आगन्.
आयुरस्मभ्यं दधत् प्रजां च रायश्च पोषैरभि नः सचताम्.. (२२)
पीले रंग वाला, आकाश के अन्न को धारण करने वाला एवं अनेक रूपों वाला इंद्र
संबंधी बैल हमें प्राप्त हुआ. वह हमें आयु, संतान एवं धन देता हुआ सभी प्रकार से पुष्ट करे.
(२२)
उपेहोपपर्चनास्मिन् गोष्ठ उप पृञ्च नः. उप ऋषभस्य यद् रेत उपेन्द्र तव
वीर्यम्.
हे उपपृंच! यहां आओ तथा गोशाला में हम से मिलो. हे इंद्र! इस वृषभ का वीर्य ही
तुम्हारा वीर्य है. (२३)
एतं वो युवानं प्रति दध्मो अत्र तेन क्रीडन्तीश्चरत वशाँ अनु.
मा नो हासिष्ट जनुषा सुभागा रायश्च पोषैरभि नः सचध्वम्.. (२४)
हे गायो! यह युवा बैल तुम्हारे लिए है. इस गोशाला में इस के साथ क्रीडा करती हुई तुम
विचरण करो. तुम हमारा त्याग मत करो तथा हमें सुंदर धनों से पुष्ट बनाओ. (२४)
सूक्त-५ देवता—अजन्मा
आ नयैतमा रभस्व सुकृतां लोकमपि गच्छतु प्रजानन्.
तीर्त्वा तमांसि बहुधा महान्त्यजो नाकमा क्रमतां तृतीयम्.. (१)
इस अज को लाओ और यज्ञ कर्म आरंभ करो. जानता हुआ यह पुण्यात्माओं के लोक
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को भी जाए. यह अनेक प्रकार के विशाल अंधकारों को पार कर के तीसरे स्वर्ग में पहुंचे. (१)
इन्द्राय भागं परि त्वा नयाम्यस्मिन् यज्ञे यजमानाय सूरिम्.
ये नो द्विषन्त्यनु तान् रभस्वानागसो यजमानस्य वीराः.. (२)
हे अज! मैं इस यज्ञ में तुझे इंद्र के भाग के लिए यजमान के समीप ले जा रहा हूं. जो
हमारे शत्रु हैं, तू उन पर पैर रख और यजमान के पुत्र आदि को पाप रहित बना. (२)
प्र पदो ऽ व नेनिग्धि दुश्चरितं यच्चचार शुद्धैः शफैरा क्रमतां प्रजानन्.
तीर्त्वा तमांसि बहुधा विपश्यन्नजो नाकमा क्रमतां तृतीयम्.. (३)
हे पाप कर्म करने वाले अज! तू अपने पैरों को पवित्र कर एवं जानता हुआ अपने खुरों
से स्वर्ग में आरोहण कर. यह अज अनेक प्रकार के अंधकारों को पार करता हुआ तृतीय स्वर्ग
में पहुंचे. (३)
अनु च्छ्य श्यामेन त्वचमेतां विशस्तर्यथापर्व १ सिना माभि मंस्थाः.
माभि द्रुहः परुशः कल्पयैनं तृतीये नाके अधि वि श्रयैनम्.. (४)
हे विशस्त! अर्थात् विशेष शासक काले लोहे के शस्त्र के द्वारा इस को शुद्ध करो. इस
के जोड़ों को कष्ट न हो. इस के प्रत्येक जोड़ की कल्पना करते हुए इसे तीसरे स्वर्ग में
पहुंचाओ. (४)
ऋचा कुम्भीमध्यग्नौ श्रयाम्या सिञ्चोदकमव धेह्येनम्.
पर्याधत्ताग्निना शमितारः शृतो गच्छतु सुकृतां यत्र लोकः.. (५)
मैं ऋग्वेद के मंत्रों के द्वारा कुंभी को अग्नि पर रखता हूं. तू जल छिड़क कर इसे अग्नि
पर रख. हे शमिता जनो! यह शुद्ध अर्थात् परिपक्व हो कर पुण्यवानों के लोक को जाए. (५)
उत्क्रामातः परि चेदतप्तस्तप्ताच्चरोरधि नाकं तृतीयम्.
अग्नेरग्निरधि सं बभूविथ ज्योतिष्मन्तमभि लोकं जयैतम्.. (६)
हे अज! तू इस तपे हुए अर्थात् परिपक्व चरु के द्वारा स्वर्ग में जाने के लिए ऊपर चढ़.
तू अग्नि के द्वारा अग्नि रूप हो गया है एवं प्रकाश वाले लोकों को प्राप्त कर. (६)
अजो अग्निरजमु ज्योतिराहुरजं जीवता ब्रह्मणे देयमाहुः.
अजस्तमांस्यप हन्ति दूरमस्मिंल्लोके श्रद्दधानेन दत्तः.. (७)
मनीषियों ने ऐसा कहा है कि अज ही अग्नि है और अज ही ज्योति है. जीवित पुरुष के
द्वारा अज को ब्रह्म के लिए देने योग्य कहा गया है. श्रद्धालु पुरुष द्वारा इस लोक में दान किया
हुआ अज दूरवर्ती लोकों में अंधकार का विनाश करता है. (७)
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पञ्चौदनः पञ्चधा वि क्रमतामाक्रंस्यमानस्त्रीणि ज्योतींषि.
ईजानानां सुकृतां प्रेहि मध्यं तृतीये नाके अधि वि श्रयस्व.. (८)
पञ्चौदन अर्थात् पांच प्रकार के भातों के पांच क्रम दिए जाएं. वह आक्रमण करता हुआ
सूर्य, चंद्र, अग्नि—इन तीनों ज्योतियों में आरूढ़ हो. तू यज्ञ करने वाले पुण्यात्माओं के मध्य
में जा कर तीसरे स्वर्ग को प्राप्त हो. (८)
अजा रोह सुकृतां यत्र लोकः शरभो न चत्तो ऽ ति दुर्गाण्येषः.
पञ्चौदनो ब्रह्मणे दीयमानः स दातारं तृप्त्या तर्पयात.. (९)
हे अज! तू ऐसे पुण्यात्माओं के लोक में आरोहण कर, जहां शरभ अर्थात् हिंसक बाघ
नहीं जा सकता और जहां समस्त दुर्लभ पदार्थ उपलब्ध हैं. ब्रह्मा के निमित्त दिया जाने वाला
पंचौदन दाता को तृप्ति प्रदान करता है. (९)
अजस्त्रिनाके त्रिदिवे त्रिपृष्ठे नाकस्य पृष्ठे ददिवांसं दधाति.
पञ्चौदनो ब्रह्मणे दीयमानो विश्वरूपा धेनुः कामदुघा ऽ स्येका.. (१०)
यह अज देने वाले को तीसरे स्वर्ग में और तीन पृष्ठों वाले स्वर्ग में पहुंचाता है. ब्रह्मा के
निमित्त दिया हुआ पंचौदन यजमान को इच्छानुसार दूध देने वाली एवं अनेक रूप वाली धेनु
बन जाता है. (१०)
एतद् वो ज्योतिः पितरस्तृतीयं पञ्चौदनं ब्रह्मणे ऽ जं ददाति.
अजस्तमांस्यप हन्ति दूरमस्मिंल्लोके श्रद्दधानेन दत्तः.. (११)
हे पितरो! जो ब्रह्मा के निमित्त तृतीय पंचौदन के रूप में अज का दान करता है, श्रद्धालु
के द्वारा इस लोक में दिया हुआ यह अज दूरवर्ती लोक में विस्तृत अंधकार का विनाश करता
है. (११)
ईजानानां सुकृतां लोकमीप्सन् पञ्चौदनं ब्रह्मणे ऽ जं ददाति.
स व्याप्तिमभि लोकं जयैतं शिवो ३ स्मभ्यं प्रतिगृहीतो अस्तु.. (१२)
यज्ञ करने वाले पुण्यात्माओं के लोक में जाने की इच्छा करने वाला जो यजमान ब्रह्मा
के लिए अज का दान करता है, वह मंगलमय स्थान प्राप्त करता है एवं स्वर्ग को जीतता है.
(१२)
अजो ह्य १ ग्नेरजनिष्ट शोकाद् विप्रो विप्रस्य सहसो विपश्चित्.
इष्टं पूर्तमभिपूर्तं वषट्कृतं तद् देवा ऋतुशः कल्पयन्तु.. (१३)
यह ज्ञानी एवं विद्वान् अज ब्राह्मण की अग्नि से प्रकट हुआ है. देवगण इस के कारण
इष्ट, पूर्त एवं वषट् कर्म की ऋतु के अनुसार कल्पना करें. (१३)
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अमोतं वासो दद्याद्धिरण्यमपि दक्षिणाम्.
तथा लोकान्तसमाप्नोति ये दिव्या ये च पार्थिवा:.. (१४)
जो स्वर्ण की दक्षिणा को वस्त्र में लपेट कर देता है, वह पुरुष दिव्य एवं पार्थिव लोकों
को प्राप्त करता है. (१४)
एतास्त्वाजोप यन्तु धारा: सोम्या देवीर्घृतपृष्ठा मधुश्रुतः.
स्तभान पृथिवीमुत द्यां नाकस्य पृष्ठे ऽ धि सप्तरश्मौ.. (१५)
हे अज! ये घृत मिश्रित और मधु टपकाने वाली सोमरस की दिव्य धाराएं तुझे प्राप्त हों.
तू सूर्य के ऊपर स्थित स्वर्ग में विराजमान हो कर पृथ्वी और द्यौ को स्तंभित कर. (१५)
अजो ३ स्यज स्वर्गो ऽ सि त्वया लोकमङ्गिरसः प्राजानन्.
तं लोकं पुण्यं प्र ज्ञेषम्.. (१६)
हे अज! तू स्वर्ग है. तेरे द्वारा ही अंगिरावंशी ऋषियों ने स्वर्ग को जाना है. मैं ने भी तेरे
द्वारा उस पुण्यशाली लोक का ज्ञान प्राप्त किया है. (१६)
येना सहस्रं वहसि येनाग्ने सर्ववेदसम्.
तेनेमं यज्ञं नो वह स्वर्देवेषु गन्तवे.. (१७)
हे अग्नि! अपने जिस बालक के द्वारा तुम हजारों प्रकार के ऐश्वर्य को देवों तक ले जाते
हो, स्वर्ग प्राप्ति के निमित्त हमारे इस यज्ञ को उसी बल के द्वारा देवताओं तक पहुंचाओ.
(१७)
अजः पक्वः स्वर्गे लोके दधाति पञ्चौदनो निर्ऋतिं बाधमानः.
तेन लोकान्सूर्यवतो जयेम.. (१८)
पंचौदन के रूप में पका हुआ अज स्वर्गलोक में स्थापित करता है और पाप की देवी
निर्ऋति को बाधा पहुंचाता है. हम इस अज रूपी धन के द्वारा सूर्यवान लोकों पर विजय
प्राप्त करें. (१८)
यं ब्राह्मणे निदधे यं च विक्षु या विप्रुष ओदनानामजस्य.
सर्वं तदग्ने सुकृतस्य लोके जानीतान्नः संगमने पथीनाम्.. (१९)
अज के ओदन की जिन बूंदों को ब्राह्मणों के मध्य एवं प्रजाओं में स्थापित करते हैं, हे
अग्नि देव! वह सब हमें पुण्यात्माओं के लोक में एवं भागों के संगम में जानें. (१९)
अजो वा इदमग्रे व्यक्रमत तस्योर इयमभवद् द्यौः पृष्ठम्.
अन्तरिक्षं मध्यं दिशः पार्श्वे समुद्रौ कुक्षी.. (२०)
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अज ने सब से पहले व्यतिक्रमण किया तो उस का पेट भूमि, पीठ द्यौ, अंतरिक्ष मध्य
भाग, पसलियां दिशाएं और कोखें सागर हुईं. (२०)
सत्यं चर्तं च चक्षुषी विश्वं सत्यं श्रद्धा प्राणो विराट् शिरः.
एष वा अपरिमितो यज्ञो यदजः पञ्चौदनः.. (२१)
अज के नेत्र सत्य और ऋत हुए, प्राण श्रद्धा हुए एवं शीश विराट् हुआ. इस प्रकार वह
अज वास्तव में विश्व हुआ. यह पंचौदन रूपी अज असीमित यज्ञ है. (२१)
अपरिमितमेव यज्ञमाप्नोत्यपरिमितं लोकमव रुन्द्धे.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२२)
जो यजमान दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में देता है, वह यज्ञ के
असीमित फल को प्राप्त करता है तथा अपरिमित लोकों का उद्घाटन करता है. (२२)
नास्यास्थीनि भिन्द्यान्न मज्ज्ञो निर्धयेत्.
सर्वमेनं समादायैदमिदं प्र वेशयेत्.. (२३)
न तो इस अज की हड्डियों को तोड़े और न इस की मज्जा अर्थात् चरबी को धोए. इसे
पूर्ण रूप से ले कर यह कहे कि मैं इस में प्रवेश करता हूं. (२३)
इदमिदमेवास्य रूपं भवति तेनैनं सं गमयति.
इषं मह ऊर्जमस्मै दुहे यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२४)
उस का रूप यही है. इसी से वह हम को फल प्राप्त कराता है. जो दक्षिणा से प्रकाशित
अज का पंचौदन के रूप में दान करता है, वह अज दानकर्ता को अन्न के साथ बल प्रदान
करता है. (२४)
पञ्च रुक्मा पञ्च नवानि वस्त्रा पञ्चास्मै धेनवः कामदुघा भवन्ति.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२५)
जो दक्षिणा से प्रकाशित होते हुए अज को पंचौदन के रूप में दान करता है, उस को
पांच स्वर्ण मुद्राएं, पांच नवीन वस्त्र और इच्छानुसार दूध देने वाली पांच गाएं प्राप्त होती हैं.
(२५)
पञ्च रुक्मा ज्योतिरस्मै भवन्ति वर्म वासांसि तन्वे भवन्ति.
स्वर्गं लोकमश्नुते यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२६)
जो दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में दान करता है, वह स्वर्गलोक का
भोग करता है. उसे चमकती हुई पांच स्वर्ण मुद्राएं तथा शरीर पर वस्त्र और कवच प्राप्त होते

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हैं. (२६)
या पूर्वं पतिं वित्त्वाथान्यं विन्दते ऽ परम्.
पञ्चौदनं च तावजं ददातो न वि योषतः.. (२७)
जो स्त्री पूर्व पति को वाग्दान के रूप में जान कर भी अन्य पुरुष को प्राप्त कर लेती है,
वे दोनों पंचौदन के रूप में अज का दान करने से कभी अलग नहीं होते. (२७)
समानलोको भवति पुनर्भूव ऽ परः पतिः.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२८)
जो दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में दान करता है, वह पुनर्विवाहिता के
साथ समान लोकों में निवास करता है. (२८)
अनुपूर्ववत्सां धेनुमनड्वाहमुपबर्हणम्.
वासो हिरण्यं दत्त्वा ते यन्ति दिवमुत्तमाम्.. (२९)
जो स्वर्ण के तारों से कढ़े हुए वस्त्रों सहित उपबर्हण अर्थात् गर्भाधान समर्थ बैल और
प्रतिवर्ष बछड़ा देने वाली गाय का दान करते हैं, वे उत्तम स्वर्ग में जाते हैं. (२९)
आत्मानं पितरं पुत्रं पौत्रं पितामहम्.
जायां जनित्रीं मातरं ये प्रियास्तानुप ह्वये.. (३०)
मैं अपनेआप को, पिता को, पुत्र को, पौत्र को, बाबा को, पत्नी तथा जन्म देने वाली
माता को एवं समस्त प्रियजनों को बुलाता हूं. (३०)
यो वै नैदाघं नामर्तुं वेद.
एष वै नैदाघो नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३१)
जो नैदाघ अर्थात् ग्रीष्म नाम की ऋतु को जानता है, वह कहता है—“यह जो पंचौदन
के रूप वाला अज है, वही नैदाघ नामक ऋतु है. जो दक्षिणा से प्रकाश युक्त अज को पंचौदन
के रूप में दान करता है, वह अप्रिय शत्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य को छीन लेता है.” (३१)
यो वै कुर्वन्तं नामर्तुं वेद.
कुर्वतींकुर्वतीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वै कुर्वन्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३२)
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जो कुर्वती नामक ऋतु को निश्चित रूप से जानता है, वह कुर्वती का ज्ञान करता हुआ
भी अप्रिय शत्रुओं तथा बांधवों के ऐश्वर्य को छीन लेता है. यह जो कुर्वती नाम की ऋतु है, वह
पंचौदन रूप अज ही है. यह जानने वाला व्यक्ति अपने अप्रिय शत्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य
को अपनी शक्ति से जला डालता है तथा दक्षिणा से प्रकाशित होते हुए अज को पंचौदन के
रूप में दान करता है. (३२)
यो वै संयन्तं नामर्तुं वेद. संयतींसंयतीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वै संयन्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३३)
जो संयती नामक ऋतु को निश्चित रूप से जानता है, वह समझता है कि यह पंचौदन
रूप अज है, वही संयंती नाम की ऋतु है. जो दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप
में दान करता है, वह अपने अप्रिय वस्तुओं तथा बांधवों के ऐश्वर्य को अपने बल से जला देता
है. (३३)
यो वै पिन्वन्तं नामर्तुं वेद.
पिन्वतींपिन्वतीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वै पिन्वन्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो३जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३४)
जो पिन्वंती नाम की ऋतु को जानता है, वह पिन्वंती को जानता हुआ ही अप्रिय शत्रुओं
एवं बांधवों के ऐश्वर्य को ग्रहण करता है. यह जो पंचौदन रूप अज है, यही पिन्वंती नाम की
ऋतु है. जो पुरुष दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में देता है, वह अपने अप्रिय
शत्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य को अपनी शक्ति से जला देता है. (३४)
यो वा उद्यन्तं नामर्तुं वेद.
उद्यतीमुद्यतीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वा उद्यन्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३५)
जो उद्यंती नाम की ऋतु को जानता है, वह अपने अप्रिय शत्रुओं और बांधवों की
संपत्ति को ग्रहण करता है. वह समझता है कि यह पंचौदन रूप अज ही उद्यंती नाम की ऋतु
है. जो दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में देता है, वह अपने अप्रिय शत्रुओं एवं
बांधवों के ऐश्वर्य को अपने तेज से जला डालता है. (३५)
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यो वा अभिभुवं नामर्तुं वेद.
अभिभवन्तीमभिभवन्तीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वा अभिभूर्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३६)
जो अभिभवंती नाम की ऋतु को जानता है, वह अभिभवंती ऋतु को जानता हुआ ही
अपने अप्रिय शत्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य को छीन लेता है. यह अभिभू नाम की ऋतु ही
पंचौदन रूप अज है. जो दक्षिणा से प्रकाशित पंचौदन रूप अज का दान करता है, वह अपने
अप्रिय शत्रुओं और बांधवों के ऐश्वर्य को अपने तेज से जला देता है. (३६)
अजं च पचत पञ्च चौदनान्.
सर्वा दिशः संमनसः सध्रीचीः सान्तर्देशाः प्रति गृह्णन्तु त एतम्.. (३७)
पंचौदन रूप अज को पकाओ. अंतर्दिशाओं के सहित दिशाएं एकमत हो कर अंतर्देशों
सहित उसे ग्रहण करे. (३७)
तास्ते रक्षन्तु तव तुभ्यमेतं ताभ्य आज्यं हविरिदं जुहोमि.. (३८)
वे सभी दिशाएं मेरे यज्ञ की रक्षा करें. उन के लिए मैं यह हवि देता हूं. (३८)
सूक्त-६ देवता—अतिथि, विद्या
यो विद्याद् ब्रह्म प्रत्यक्षं परूंषि यस्य संभारा ऋचो यस्यानूक्यम्.. (१)
जो ब्रह्म को प्रत्यक्ष रूप में जानता है, उस की गांठें ही संभार हैं तथा ऋचाएं उस का
अनूक्य हैं. (१)
सामानि यस्य लोमानि यजुर्हृदयमुच्यते परिस्तरणमिद्धविः.. (२)
सामवेद के मंत्र जिस के रोम हैं और परिस्तरण जिस का हवि है. (२)
यद् वा अतिथिपतिरतिथीन् प्रतिपश्यति देवयजनं प्रेक्षते.. (३)
अथवा जो अतिथियों का स्वामी और अतिथियों को देखता है, वह देव यज्ञ को ही
देखता है. (३)
यदभिवदति दीक्षामुपैति यदुदकं याचत्यपः प्र णयति.. (४)
अतिथि से जो बोलता है, वही दीक्षा है. जल की याचना ही उस को लाना है. (४)
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या एव यज्ञ आपः प्रणीयन्ते ता एव ताः.. (५)
जिन्हें यज्ञ में लाया जाता है, ये वे ही जल हैं. (५)
यत् तर्पणमाहरन्ति य एवाग्नीषोमीयः पशुर्बध्यते स एव सः.. (६)
जो तर्पण को लाते हैं, वही अग्नि सोमीय तर्पण है. जो यज्ञ में पशु का वध किया जाता
है, वही वह है. (६)
यदावसथान् कल्पयन्ति सदोहविर्धानान्येव तत् कल्पयन्ति.. (७)
जो टखनों की कल्पना करता है, वही मानो हवि धान्य का निर्माण है. (७)
यदुपस्तृणन्ति बर्हिरेव तत्.. (८)
जिन्हें उपस्तरण कहते हैं, वे ही कुश हैं. (८)
यदुपरिशयनमाहरन्ति स्वर्गमेव तेन लोकमव रुन्ध्दे.. (९)
जो उपरिशयन का आहरण करते हैं, उस से स्वर्गलोक का उद्घाटन करते हैं. (९)
यत् कशिपूपबर्हणमाहरन्ति परिधय एव ते.. (१०)
जो कशिपु उपबर्हण को लाते हैं, वे ही यज्ञ की परिधियां हैं. (१०)
यदाञ्जनाभ्यञ्जनमाहरन्त्याज्यमेव तत्.. (११)
जो कशिपु उपबृंहण लाते हैं, वे ही आज्य हैं. (११)
यत् पुरा परिवेशात् खादमाहरन्ति पुरोडाशावेव तौ.. (१२)
जो सामने परोसने के लिए खाद्य पदार्थ लाते हैं, वे ही पुरोडाश हैं. (१२)
यदशनकृतं ह्वयन्ति हविष्कृतमेव तद्ध्वयन्ति.. (१३)
भोजन के हेतु जो आमंत्रित करते हैं, वही हवि स्वीकार करने के लिए आह्वान है. (१३)
ये व्रीहयो यवा निरुप्यन्तें ऽ शव एव ते.. (१४)
जो धान और जौ निरूपित किए जाते हैं, वे ही सोम हैं. (१४)
यान्युलूखलमुसलानि ग्रावाण एव ते.. (१५)
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जो उलूखल अर्थात् ओखली और मूसल हैं, वे ही पत्थर हैं. (१५)
शूर्पं पवित्रं तुषा ऋजीषाभिषवणीरापः.. (१६)
सूप ही पवित्र छन्ना है, भूमि ऋजीषा है और अभिषवणी ही जल है. (१६)
स्रुग् दुर्विर्नेक्षणमायवनं द्रोणकलशाः कुम्भ्यो वायव्यानि
पात्राणीयमेव कृष्णाजिनम्.. (१७)
सुवा ही दर्वी अर्थात् करछुली हैं, शुद्ध करना ही आयवन है, द्रोण कलश ही घड़ा है,
वायव्य पात्र ही कृष्णाजिन अर्थात् काले मृग का चर्म है. (१७)
सूक्त-७ देवता—अतिथि, विद्या
यजमानब्राह्मणं वा एतदतिथिपतिः कुरुते
यदाहार्याणि प्रेक्षत इदं भूया ३ इदा ३ मिति.. (१)
जो यजमान को अथवा ब्राह्मण को अतिथि पति अर्थात् अतिथि का पालन करने वाला
बनता है, वह आहार्य अर्थात् यज्ञ संबंधी द्रव्य को देखता हुआ कहता है कि यह होना चाहिए.
(१)
यदाह भूय उद्धरेति प्राणमेव तेन वर्षीयांसं कुरुते.. (२)
जो अतिथि से बारबार भोजन करने की बात कहता है, वह प्राण शक्ति की वृद्धि करता
है. (२)
उप हरति हवींष्या सादयति.. (३)
जो अतिथि के लिए भोजन लाता है, वह हवि प्राप्त करता है. (३)
तेषामासन्नानामतिथिरात्मन्जुहोति.. (४)
अतिथि उन परोसे हुए भोज्य पदार्थों का आत्मा में ही हवन करता है. (४)
स्रुचा हस्तेन प्राणे यूपे सुक्कारेण वषट्कारेण.. (५)
अतिथि का हाथ सुवा, उस के प्राण स्तूप अर्थात् यज्ञीय पशु को बांधने का खंभा और
खाते समय चटखारे लेना ही वषट् शब्द है. (५)
एते वै प्रियाश्चाप्रियाश्चर्त्विजः स्वर्गं लोकं गमयन्ति यदतिथयः.. (६)
अतिथि ही वे प्रिय अथवा अप्रिय अतिथि हैं, जो यजमान को स्वर्गलोक में भेजते हैं.
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(६)
स य एवं विद्वान् न द्विषन्नश्नीयान्न द्विषतो ऽ न्नमश्नीयान्न
मीमांसितस्य न मीमांसमानस्य.. (७)
जिस के विषय में विचार कर चुका हो, अतिथि उस का अन्न खाए, जिस के विषय में
विचार चल रहा हो, उस का अन्न न खाए. (७)
सर्वो वा एष जग्धपाप्मा यस्यान्नं नाश्नन्ति.. (८)
अतिथि जिस का अन्न खाता है, उस के सभी पापों को भी खाता है. (८)
सर्वो वा एषो ऽ जग्धपाप्मा यस्यान्नं नाश्नन्ति.. (९)
अतिथि जिस का अन्न नहीं खाता है, उस के पापों को भी नहीं खाता है. (९)
सर्वदा वा एष युक्तग्रावार्द्रपवित्रो वितताध्वर आहतयज्ञक्रतुर्य उपहरति..
(१०)
जो यजमान अतिथियों को अन्न देता रहता है, वह ग्रावाओं अर्थात् सोमलता कूटने वाले
पत्थरों से गीले यज्ञ का कर्ता और उस यज्ञ को पूर्ण करने वाला होता है. (१०)
प्राजापत्यो वा एतस्य यज्ञो विततो य उपहरति.. (११)
अतिथि के निमित्त अन्न देना प्राजापत्य यज्ञ है. (११)
प्रजापतेर्वा एष विक्रमाननुविक्रमते य उपहरति.. (१२)
जो अतिथि के निमित्त भोजन लाता है, वह प्रजापति के समान ही पराक्रम करता है.
(१२)
योऽतिथीनां स आहवनीयो यो वेश्मनि स गार्हपत्यो
यस्मिन् पचन्ति स दक्षिणाग्निः.. (१३)
अतिथियों को बुलाना आह्वनीय अग्नि है, अपने घर में उन्हें भोजन कराना गार्हपत्य
अग्नि है और जिस पात्र में अतिथि के लिए भोजन पकाया जाता है, वह दीक्षाग्नि है. (१३)
सूक्त-८ देवता—अतिथि, विद्या
इष्टं च वा एष पूर्तं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (१)
जो अतिथि से पहले भोजन कर लेता है, वह अपने में होने वाले इष्टापूर्त कर्मों का फल
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खा लेता है. संध्या आदि नित्य कर्म इष्ट और किसी प्रयोजन से किए जाने वाले यज्ञ आदि
कर्म आपूर्त कहलाते हैं. (१)
पयश्च वा एष रसं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वोऽतिथेरश्नाति.. (२)
जो अतिथियों से पहले भोजन करता है, वह अपने घरों के दूध और रस को नष्ट करता
है. (२)
ऊर्जां च वा एष स्फातिं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (३)
जो व्यक्ति अतिथि से पहले भोजन कर लेता है, वह अपने घरों के बल और समृद्धि का
नाश करता है. (३)
प्रजां च वा एष पशूंश्च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (४)
जो अतिथि से पहले भोजन करता है, वह अपने घरों की संतान और पशुओं का भक्षण
करता है. (४)
कीर्तिं च वा एष यशश्च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (५)
जो अतिथि से पूर्व भोजन करता है, वह अपने घरों की कीर्ति और यश को समाप्त
करता है. (५)
श्रियं च वा एष संविदं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (६)
जो अतिथि से पूर्व भोजन करता है, वह अपने घरों की श्री और सौमनस्य का विनाश
करता है. (६)
एष वा अतिथिर्यच्छ्रोत्रियस्तस्मात् पूर्वो नाश्नीयात्.. (७)
श्रोत्रिय ब्राह्मण ही वास्तव में अतिथि है. यजमान को चाहिए कि उस से पूर्व भोजन नहीं
करे. (७)
अशितावत्यतिथावश्नीयाद् यज्ञस्य सात्मत्वाय यज्ञस्याविच्छेदाय तद्
व्रतम्.. (८)
अतिथि के भोजन कर लेने पर ही यजमान भोजन करे. यज्ञ के निर्वाह एवं यज्ञ का
विच्छेद न होने के लिए ही यह व्रत है. (८)
एतद् वा उ स्वादीयो यदधिगवं क्षीरं वा मांसं वा तदेव नाश्नीयात्.. (९)
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सूक्त-९ देवता—अतिथि, विद्या

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चाहे जितना स्वादिष्ट हो, पर यजमान को गाय का दूध और मांस नहीं खाना चाहिए.
(९)
सूक्त-९ देवता—अतिथि, विद्या
स य एवं विद्वान् क्षीरमुपसिच्योपहरति.. (१)
जो इस बात को जानता है, वह दूध का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता
है. (१)
यावदग्निष्टोमेनेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (२)
यजमान अग्निष्टोम यज्ञ के द्वारा स्वर्ग में जितना समृद्धिपूर्ण स्थान पा सकता है, उतना
ही अतिथि सेवा के द्वारा प्राप्त कर सकता है. (२)
स य एवं विद्वान्सर्पिरुपसिच्योपहरति.. (३)
इस का ज्ञाता घी का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता है. (३)
यावदतिरात्रेणेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (४)
अतिरात्र यज्ञ के द्वारा यजमान स्वर्ग में जितना समृद्धि पूर्ण पद प्राप्त कर सकता है,
उतना ही अतिथि सेवा के द्वारा प्राप्त करता है. (४)
स य एवं विद्वान् मधूपसिच्योपहरति.. (५)
जो इस बात को जानता है, वह मधुर शहद का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन
लाता है. (५)
यावत् सत्रसद्येनेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (६)
यजमान सत्र यज्ञ कर के स्वर्ग में जो समृद्धि पूर्ण स्थान प्राप्त करता है, उसे अतिथि की
सेवा के द्वारा पाया जा सकता है. (६)
स य एवं विद्वान् मांसमुपसिच्योपहरति.. (७)
जो इस बात को जानता है, वह मांस का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता
है. (७)
यावद् द्वादशाहेनेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (८)
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यजमान बारह दिन तक चलने वाले यज्ञ के द्वारा स्वर्ग में जितना समृद्धि पूर्ण स्थान
पाता है, वही अतिथि की सेवा के द्वारा पा सकता है. (८)
स य एवं विद्वानुदकमुपसिच्योपहरति.. (९)
जो इस बात को जानता है, वह जल का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता
है. (९)
प्रजानां प्रजननाय गच्छति प्रतिष्ठां प्रियः प्रजानां भवति य एवं
विद्वानुदकमुपसिच्योपहरति.. (१०)
जो इस बात को जानता है और जल का उपसेचन कर के अतिथि के हेतु भोजन लाता
है, वह संतान को जन्म देने की क्षमता प्राप्त करता है, प्रतिष्ठा पाता है और प्रजाओं का प्रिय
बनता है. (१०)
सूक्त-१० देवता—अतिथि, विद्या
तस्मा उषा हिङ्कृणोति सविता प्र स्तौति.. (१)
उषा उस के लिए हुंकार करती है और सूर्य उस की स्तुति करता है. (१)
बृहस्पतिरूर्जयोद् गायति त्वष्टा पुष्ट्या प्रति हरति विश्वे देवा निधनम्..
(२)
अन्न के रस से उत्पन्न ऊर्जा से बृहस्पति उदगायन करते हैं, त्वष्टा पुष्टि प्रदान करते हैं
और विश्वे देव पूर्णता प्रदान करते हैं. (२)
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (३)
जो इस बात को जानता है, वह सेवकों, संतानों और पशुओं के पालन की पूर्णता प्राप्त
करता है. (३)
तस्मा उद्यन्सूर्यो हिङ्कृणोति संगवः प्र स्तौति.. (४)
उदय होते हुए सूर्य उस के लिए हुंकार करते हैं और किरणों वाले सूर्य उस की प्रशंसा
करते हैं. (४)
मध्यन्दिन उद्गायत्यपराह्नः प्रति हरत्यस्तंयन् निधनम्.
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (५)
सूर्य माध्यंदिन अर्थात् दोपहर के समय उस की प्रशंसा करते हैं और दोपहर के बाद उस
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की मृत्यु का विनाश करते हैं. जो इस बात को जानता है, वह समृद्धि की प्रजाओं और
पशुओं को प्राप्त करता है. (५)
तस्मा अभ्रो भवन् हिङ्कृणोति स्तनयन् प्र स्तौति.. (६)
उत्पन्न होने वाला बादल उस के लिए हुंकार करता है और गर्जन करता हुआ उस की
प्रशंसा करता है. (६)
विद्योतमानः प्रति हरति वर्षन्नुद्गायत्युद्गृह्णन् निधनम्.
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (७)
बादल दमकता हुआ उस का प्रतिहार करता है, बरसता हुआ उद्गान करता है तथा
उद्ग्रहण करता हुआ उसे पूर्णता प्रदान करता है. जो इस प्रकार जानता है, वह प्रजाओं और
पशुओं की संपन्नता प्राप्त करता है. (७)
अतिथीन् प्रति पश्यति हिङ्कृणोत्यभि वदति प्र स्तौत्युदकं
याचत्युद्गायति.. (८)
वह अतिथियों को देखता है तो उन्हें बुलाता है, अभिवादन करता है, जल प्रस्तुत करता
है और उन की प्रशंसा करता है. (८)
उप हरति प्रति हरत्युच्छिष्टं निधनम्.. (९)
वह अशेष पूर्णता का उपहार और प्रतिहार करता है. (९)
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (१०)
जो इस प्रकार जानता है, वह प्रजा और पशुओं की समृद्धि की अंतिम अवस्था को
प्राप्त करता है. (१०)
सूक्त-११ देवता—अतिथि, विद्या
यत् क्षत्तारं ह्वयत्या श्रावयत्येव तत्.. (१)
जो क्षत्ता अर्थात् इच्छित कार्य करने वाले का आह्वान करता है, वह श्रुति को ही सुनाता
है. (१)
यत् प्रतिशृणोति प्रत्याश्रावयत्येव तत्.. (२)
जो प्रतिज्ञा करता है, वही श्रुति को सुनाने का आग्रह करता है. (२)
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यत् परिवेष्टारः पात्रहस्ताः पूर्वे चापरे च प्रपद्यन्ते चमसाध्वर्यव एव ते..
(३)
हाथों में पात्र लिए जो परोसने वाले आगेपीछे चलते हैं, वे ही यज्ञ के चमस और अध्वर्यु
हैं. (३)
तेषा नं कश्चनाहोता.. (४)
उन अतिथियों में कोई भी ऐसा नहीं है जो होता अर्थात् हवन करने वाला न हो. (४)
यद् वा अतिथिपतिरतिथीन् परिविष्य गृहानुणेदैत्यवभृथमेव तदुपावैति..
(५)
जो अतिथि सत्कार कर्ता अतिथियों को भोजन परोस कर घरों में आता है, वह यज्ञ के
पश्चात होने वाले अवभृथ स्नान का फल प्राप्त करता है. (५)
यत् सभागयति दक्षिणाः सभागयति यदनुतिष्ठत उदवस्यत्येव तत्.. (६)
जो यजमान भोज्य पदार्थों को अलगअलग करता हुआ तथा दक्षिणा देता हुआ
अनुष्ठान करता है, वह उदवास करता है. (६)
स उपहूतः पृथिव्यां भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यत् पृथिव्यां विश्वरूपम्.. (७)
वह बुला कर पृथिवी के समस्त प्राणियों को भोजन कराता है, उस अतिथि सत्कार में
मानो विश्वरूप ही बुलाए जाते हैं. (७)
स उपहूतो ऽ न्तरिक्षे भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यदन्तरिक्षे विश्वरूपम्.. (८)
वह बुलाने पर स्वर्ग में भोजन करता है. अंतरिक्ष में जो विश्वरूप है, वह उस के यहां
बुलाया जाता है. (८)
स उपहूतो दिवि भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यद् दिवि विश्वरूपम्.. (९)
वह बुलाए जाने पर स्वर्ग में भक्षण करता है. स्वर्ग में जो विश्वरूप है, उस में वह बुलाया
जाता है. (९)
स उपहूतो देवेषु भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यद् देवेषु विश्वरूपम्.. (१०)
वह बुलाए जाने पर देवों के मध्य भोजन करता है. देवों में जो विश्वरूप है, उस में वह
बुलाया जाता है. (१०)
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स उपहूतो लोकेषु भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यल्लोकेषु विश्वरूपम्.. (११)
वह बुलाया गया लोकों में भोजन करता है. लोकों में जो विश्वरूप है, उस में वह बुलाया
जाता है. (११)
स उपहूत उपहूत:.. (१२)
वह इस लोक और परलोक दोनों में आदर से बुलाया जाता है. (१२)
आप्नोतीमं लोकमाप्नोत्यमुम्.. (१३)
वह इस लोक को और परलोक को प्राप्त करता है. (१३)
ज्योतिष्मतो लोकान्जयति य एवं वेद.. (१४)
जो इस बात को जानता है, वह ज्योतिर्मय लोकों को जीतता है. (१४)
सूक्त-१२ देवता—गौ
प्रजापतिश्च परमेष्ठी च शृङ्गे इन्द्रः शिरो अग्निर्ललाटं यमः कृकाटम्.. (१)
इस गाय के दोनों सींग प्रजापति और परमेष्ठी हैं. इंद्र ही इस का सिर, अग्नि ललाट और
यम कृकाट अर्थात् गले के नीचे लटकता हुआ भाग है. (१)
सोमो राजा मस्तिष्को द्यौरुत्तरहनुः पृथिव्यधरहनुः.. (२)
सोम राजा गाय का मस्तक है, द्यौ ऊपर की ठोड़ी और धरती ठोड़ी का ऊपर वाला
भाग है. (२)
विद्युज्जिह्वा मरुतो दन्ता रेवतीर्ग्रीवाः कृत्तिका स्कन्धा घर्मो वहः.. (३)
बिजली गाय की जीभ, मरुद्गण, दांत, रेवती नक्षत्र गरदन, कृत्तिका नक्षत्र कंधा और
धर्म रक्त का प्रवाह है. (३)
विश्वं वायुः स्वर्गो लोकः कृष्णद्रं विधरणी निवेश्यः.. (४)
विश्व वायु, स्वर्गलोक तथा कृष्णाद्रि विधरणी (धारक शक्ति) निवेश्य (पृष्ठ भाग) है. (४)
श्येनः क्रोडो ३ न्तरिक्षं पाजस्यं १ बृहस्पतिः ककुद् बृहतीः कीकसाः..
(५)
श्येन गाय का क्रोड अर्थात् कोख अथवा बगल, अंतरिक्ष पाजस्य (उदर), बृहस्पति
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ककुद, अर्थात् ठाट तथा बृहती छंद हड्डियां हैं. (५)
देवानां पत्नी: पृष्टय उपसद: पर्शव:.. (६)
देवों की पत्नियां गाय की पसलियां हैं और उपसद उस की कोखें हैं. (६)
मित्रश्च वरुणश्चांसौ त्वष्टा चार्यमा च दोष्णी महादेवो बाहू.. (७)
मित्र और वरुण गाय के कंधे हैं, त्वष्टा तथा अर्यमा गाय की भुजाएं अर्थात् अगले पैर हैं
तथा महादेव बाहु हैं. (७)
इन्द्राणी भसद् वायु: पुच्छं पवमानो बाला:.. (८)
इंद्राणी गाय की कमर है. वायु पूंछ है और पवमान बाल हैं. (८)
ब्रह्म च क्षत्रं च श्रोणी बलमूरू.. (९)
ब्राह्मण और क्षत्रिय गाय के नितंब हैं तथा बल उस की जंघाएं हैं. (९)
धाता च सविता चाष्ठीवन्तौ जङ्घा गन्धर्वा
अप्सरस: कुष्ठिका अदिति: शफा:.. (१०)
धाता और सविता गाय के होंठ, गंधर्व जंघाएं, अप्सराएं कोखें और अदिति शफ अर्थात्
खुर हैं. (१०)
चेतो हृदयं यकृन्मेधा व्रतं पुरीतत्.. (११)
चेत गाय का हृदय, यकृत अर्थात् जिगर मेधा अर्थात् बुद्धि है तथा व्रत पुरीतत (आंत)
नाड़ी है. (११)
क्षुत् कुक्षिरिरा वनिष्ठ: पर्वता: प्लाशय:.. (१२)
पर्वत बैल की प्लाशि (छोटी आंत) है, इरा उस की बड़ी आंत है और भूख के अभिमानी
देवता इस की कोख हैं. (१२)
क्रोधो वृक्कौ मन्युराण्डौ प्रजा शेप:.. (१३)
क्रोध इस के गुरदे हैं, मन्यु इस के अंडकोष हैं और प्रजा इस का जननांग है. (१३)
नदी सूत्री वर्षस्य पतय स्तना स्तनयित्नुरूध:.. (१४)
नदी इस गाय का मूत्र, वर्ष के स्वामी इस के थन और मेघगर्जन इस का एन है. (१४)
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