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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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हैं. (२६)
या पूर्वं पतिं वित्त्वाथान्यं विन्दते ऽ परम्.
पञ्चौदनं च तावजं ददातो न वि योषतः.. (२७)
जो स्त्री पूर्व पति को वाग्दान के रूप में जान कर भी अन्य पुरुष को प्राप्त कर लेती है,
वे दोनों पंचौदन के रूप में अज का दान करने से कभी अलग नहीं होते. (२७)
समानलोको भवति पुनर्भूव ऽ परः पतिः.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२८)
जो दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में दान करता है, वह पुनर्विवाहिता के
साथ समान लोकों में निवास करता है. (२८)
अनुपूर्ववत्सां धेनुमनड्वाहमुपबर्हणम्.
वासो हिरण्यं दत्त्वा ते यन्ति दिवमुत्तमाम्.. (२९)
जो स्वर्ण के तारों से कढ़े हुए वस्त्रों सहित उपबर्हण अर्थात् गर्भाधान समर्थ बैल और
प्रतिवर्ष बछड़ा देने वाली गाय का दान करते हैं, वे उत्तम स्वर्ग में जाते हैं. (२९)
आत्मानं पितरं पुत्रं पौत्रं पितामहम्.
जायां जनित्रीं मातरं ये प्रियास्तानुप ह्वये.. (३०)
मैं अपनेआप को, पिता को, पुत्र को, पौत्र को, बाबा को, पत्नी तथा जन्म देने वाली
माता को एवं समस्त प्रियजनों को बुलाता हूं. (३०)
यो वै नैदाघं नामर्तुं वेद.
एष वै नैदाघो नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३१)
जो नैदाघ अर्थात् ग्रीष्म नाम की ऋतु को जानता है, वह कहता है—“यह जो पंचौदन
के रूप वाला अज है, वही नैदाघ नामक ऋतु है. जो दक्षिणा से प्रकाश युक्त अज को पंचौदन
के रूप में दान करता है, वह अप्रिय शत्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य को छीन लेता है.” (३१)
यो वै कुर्वन्तं नामर्तुं वेद.
कुर्वतींकुर्वतीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वै कुर्वन्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३२)
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