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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 487 of 1063

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Page 487

पञ्चौदनः पञ्चधा वि क्रमतामाक्रंस्यमानस्त्रीणि ज्योतींषि.
ईजानानां सुकृतां प्रेहि मध्यं तृतीये नाके अधि वि श्रयस्व.. (८)
पञ्चौदन अर्थात् पांच प्रकार के भातों के पांच क्रम दिए जाएं. वह आक्रमण करता हुआ
सूर्य, चंद्र, अग्नि—इन तीनों ज्योतियों में आरूढ़ हो. तू यज्ञ करने वाले पुण्यात्माओं के मध्य
में जा कर तीसरे स्वर्ग को प्राप्त हो. (८)
अजा रोह सुकृतां यत्र लोकः शरभो न चत्तो ऽ ति दुर्गाण्येषः.
पञ्चौदनो ब्रह्मणे दीयमानः स दातारं तृप्त्या तर्पयात.. (९)
हे अज! तू ऐसे पुण्यात्माओं के लोक में आरोहण कर, जहां शरभ अर्थात् हिंसक बाघ
नहीं जा सकता और जहां समस्त दुर्लभ पदार्थ उपलब्ध हैं. ब्रह्मा के निमित्त दिया जाने वाला
पंचौदन दाता को तृप्ति प्रदान करता है. (९)
अजस्त्रिनाके त्रिदिवे त्रिपृष्ठे नाकस्य पृष्ठे ददिवांसं दधाति.
पञ्चौदनो ब्रह्मणे दीयमानो विश्वरूपा धेनुः कामदुघा ऽ स्येका.. (१०)
यह अज देने वाले को तीसरे स्वर्ग में और तीन पृष्ठों वाले स्वर्ग में पहुंचाता है. ब्रह्मा के
निमित्त दिया हुआ पंचौदन यजमान को इच्छानुसार दूध देने वाली एवं अनेक रूप वाली धेनु
बन जाता है. (१०)
एतद् वो ज्योतिः पितरस्तृतीयं पञ्चौदनं ब्रह्मणे ऽ जं ददाति.
अजस्तमांस्यप हन्ति दूरमस्मिंल्लोके श्रद्दधानेन दत्तः.. (११)
हे पितरो! जो ब्रह्मा के निमित्त तृतीय पंचौदन के रूप में अज का दान करता है, श्रद्धालु
के द्वारा इस लोक में दिया हुआ यह अज दूरवर्ती लोक में विस्तृत अंधकार का विनाश करता
है. (११)
ईजानानां सुकृतां लोकमीप्सन् पञ्चौदनं ब्रह्मणे ऽ जं ददाति.
स व्याप्तिमभि लोकं जयैतं शिवो ३ स्मभ्यं प्रतिगृहीतो अस्तु.. (१२)
यज्ञ करने वाले पुण्यात्माओं के लोक में जाने की इच्छा करने वाला जो यजमान ब्रह्मा
के लिए अज का दान करता है, वह मंगलमय स्थान प्राप्त करता है एवं स्वर्ग को जीतता है.
(१२)
अजो ह्य १ ग्नेरजनिष्ट शोकाद् विप्रो विप्रस्य सहसो विपश्चित्.
इष्टं पूर्तमभिपूर्तं वषट्कृतं तद् देवा ऋतुशः कल्पयन्तु.. (१३)
यह ज्ञानी एवं विद्वान् अज ब्राह्मण की अग्नि से प्रकट हुआ है. देवगण इस के कारण
इष्ट, पूर्त एवं वषट् कर्म की ऋतु के अनुसार कल्पना करें. (१३)
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