अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextजो उलूखल अर्थात् ओखली और मूसल हैं, वे ही पत्थर हैं. (१५)
शूर्पं पवित्रं तुषा ऋजीषाभिषवणीरापः.. (१६)
सूप ही पवित्र छन्ना है, भूमि ऋजीषा है और अभिषवणी ही जल है. (१६)
स्रुग् दुर्विर्नेक्षणमायवनं द्रोणकलशाः कुम्भ्यो वायव्यानि
पात्राणीयमेव कृष्णाजिनम्.. (१७)
सुवा ही दर्वी अर्थात् करछुली हैं, शुद्ध करना ही आयवन है, द्रोण कलश ही घड़ा है,
वायव्य पात्र ही कृष्णाजिन अर्थात् काले मृग का चर्म है. (१७)
सूक्त-७ देवता—अतिथि, विद्या
यजमानब्राह्मणं वा एतदतिथिपतिः कुरुते
यदाहार्याणि प्रेक्षत इदं भूया ३ इदा ३ मिति.. (१)
जो यजमान को अथवा ब्राह्मण को अतिथि पति अर्थात् अतिथि का पालन करने वाला
बनता है, वह आहार्य अर्थात् यज्ञ संबंधी द्रव्य को देखता हुआ कहता है कि यह होना चाहिए.
(१)
यदाह भूय उद्धरेति प्राणमेव तेन वर्षीयांसं कुरुते.. (२)
जो अतिथि से बारबार भोजन करने की बात कहता है, वह प्राण शक्ति की वृद्धि करता
है. (२)
उप हरति हवींष्या सादयति.. (३)
जो अतिथि के लिए भोजन लाता है, वह हवि प्राप्त करता है. (३)
तेषामासन्नानामतिथिरात्मन्जुहोति.. (४)
अतिथि उन परोसे हुए भोज्य पदार्थों का आत्मा में ही हवन करता है. (४)
स्रुचा हस्तेन प्राणे यूपे सुक्कारेण वषट्कारेण.. (५)
अतिथि का हाथ सुवा, उस के प्राण स्तूप अर्थात् यज्ञीय पशु को बांधने का खंभा और
खाते समय चटखारे लेना ही वषट् शब्द है. (५)
एते वै प्रियाश्चाप्रियाश्चर्त्विजः स्वर्गं लोकं गमयन्ति यदतिथयः.. (६)
अतिथि ही वे प्रिय अथवा अप्रिय अतिथि हैं, जो यजमान को स्वर्गलोक में भेजते हैं.
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