अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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स य एवं विद्वान् न द्विषन्नश्नीयान्न द्विषतो ऽ न्नमश्नीयान्न
मीमांसितस्य न मीमांसमानस्य.. (७)
जिस के विषय में विचार कर चुका हो, अतिथि उस का अन्न खाए, जिस के विषय में
विचार चल रहा हो, उस का अन्न न खाए. (७)
सर्वो वा एष जग्धपाप्मा यस्यान्नं नाश्नन्ति.. (८)
अतिथि जिस का अन्न खाता है, उस के सभी पापों को भी खाता है. (८)
सर्वो वा एषो ऽ जग्धपाप्मा यस्यान्नं नाश्नन्ति.. (९)
अतिथि जिस का अन्न नहीं खाता है, उस के पापों को भी नहीं खाता है. (९)
सर्वदा वा एष युक्तग्रावार्द्रपवित्रो वितताध्वर आहतयज्ञक्रतुर्य उपहरति..
(१०)
जो यजमान अतिथियों को अन्न देता रहता है, वह ग्रावाओं अर्थात् सोमलता कूटने वाले
पत्थरों से गीले यज्ञ का कर्ता और उस यज्ञ को पूर्ण करने वाला होता है. (१०)
प्राजापत्यो वा एतस्य यज्ञो विततो य उपहरति.. (११)
अतिथि के निमित्त अन्न देना प्राजापत्य यज्ञ है. (११)
प्रजापतेर्वा एष विक्रमाननुविक्रमते य उपहरति.. (१२)
जो अतिथि के निमित्त भोजन लाता है, वह प्रजापति के समान ही पराक्रम करता है.
(१२)
योऽतिथीनां स आहवनीयो यो वेश्मनि स गार्हपत्यो
यस्मिन् पचन्ति स दक्षिणाग्निः.. (१३)
अतिथियों को बुलाना आह्वनीय अग्नि है, अपने घर में उन्हें भोजन कराना गार्हपत्य
अग्नि है और जिस पात्र में अतिथि के लिए भोजन पकाया जाता है, वह दीक्षाग्नि है. (१३)
सूक्त-८ देवता—अतिथि, विद्या
इष्टं च वा एष पूर्तं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (१)
जो अतिथि से पहले भोजन कर लेता है, वह अपने में होने वाले इष्टापूर्त कर्मों का फल
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