Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 486 of 1063

Read in context
Page 486

को भी जाए. यह अनेक प्रकार के विशाल अंधकारों को पार कर के तीसरे स्वर्ग में पहुंचे. (१)
इन्द्राय भागं परि त्वा नयाम्यस्मिन् यज्ञे यजमानाय सूरिम्.
ये नो द्विषन्त्यनु तान् रभस्वानागसो यजमानस्य वीराः.. (२)
हे अज! मैं इस यज्ञ में तुझे इंद्र के भाग के लिए यजमान के समीप ले जा रहा हूं. जो
हमारे शत्रु हैं, तू उन पर पैर रख और यजमान के पुत्र आदि को पाप रहित बना. (२)
प्र पदो ऽ व नेनिग्धि दुश्चरितं यच्चचार शुद्धैः शफैरा क्रमतां प्रजानन्.
तीर्त्वा तमांसि बहुधा विपश्यन्नजो नाकमा क्रमतां तृतीयम्.. (३)
हे पाप कर्म करने वाले अज! तू अपने पैरों को पवित्र कर एवं जानता हुआ अपने खुरों
से स्वर्ग में आरोहण कर. यह अज अनेक प्रकार के अंधकारों को पार करता हुआ तृतीय स्वर्ग
में पहुंचे. (३)
अनु च्छ्य श्यामेन त्वचमेतां विशस्तर्यथापर्व १ सिना माभि मंस्थाः.
माभि द्रुहः परुशः कल्पयैनं तृतीये नाके अधि वि श्रयैनम्.. (४)
हे विशस्त! अर्थात् विशेष शासक काले लोहे के शस्त्र के द्वारा इस को शुद्ध करो. इस
के जोड़ों को कष्ट न हो. इस के प्रत्येक जोड़ की कल्पना करते हुए इसे तीसरे स्वर्ग में
पहुंचाओ. (४)
ऋचा कुम्भीमध्यग्नौ श्रयाम्या सिञ्चोदकमव धेह्येनम्.
पर्याधत्ताग्निना शमितारः शृतो गच्छतु सुकृतां यत्र लोकः.. (५)
मैं ऋग्वेद के मंत्रों के द्वारा कुंभी को अग्नि पर रखता हूं. तू जल छिड़क कर इसे अग्नि
पर रख. हे शमिता जनो! यह शुद्ध अर्थात् परिपक्व हो कर पुण्यवानों के लोक को जाए. (५)
उत्क्रामातः परि चेदतप्तस्तप्ताच्चरोरधि नाकं तृतीयम्.
अग्नेरग्निरधि सं बभूविथ ज्योतिष्मन्तमभि लोकं जयैतम्.. (६)
हे अज! तू इस तपे हुए अर्थात् परिपक्व चरु के द्वारा स्वर्ग में जाने के लिए ऊपर चढ़.
तू अग्नि के द्वारा अग्नि रूप हो गया है एवं प्रकाश वाले लोकों को प्राप्त कर. (६)
अजो अग्निरजमु ज्योतिराहुरजं जीवता ब्रह्मणे देयमाहुः.
अजस्तमांस्यप हन्ति दूरमस्मिंल्लोके श्रद्दधानेन दत्तः.. (७)
मनीषियों ने ऐसा कहा है कि अज ही अग्नि है और अज ही ज्योति है. जीवित पुरुष के
द्वारा अज को ब्रह्म के लिए देने योग्य कहा गया है. श्रद्धालु पुरुष द्वारा इस लोक में दान किया
हुआ अज दूरवर्ती लोकों में अंधकार का विनाश करता है. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*