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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 493 of 1063

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Page 493

या एव यज्ञ आपः प्रणीयन्ते ता एव ताः.. (५)
जिन्हें यज्ञ में लाया जाता है, ये वे ही जल हैं. (५)
यत् तर्पणमाहरन्ति य एवाग्नीषोमीयः पशुर्बध्यते स एव सः.. (६)
जो तर्पण को लाते हैं, वही अग्नि सोमीय तर्पण है. जो यज्ञ में पशु का वध किया जाता
है, वही वह है. (६)
यदावसथान् कल्पयन्ति सदोहविर्धानान्येव तत् कल्पयन्ति.. (७)
जो टखनों की कल्पना करता है, वही मानो हवि धान्य का निर्माण है. (७)
यदुपस्तृणन्ति बर्हिरेव तत्.. (८)
जिन्हें उपस्तरण कहते हैं, वे ही कुश हैं. (८)
यदुपरिशयनमाहरन्ति स्वर्गमेव तेन लोकमव रुन्ध्दे.. (९)
जो उपरिशयन का आहरण करते हैं, उस से स्वर्गलोक का उद्घाटन करते हैं. (९)
यत् कशिपूपबर्हणमाहरन्ति परिधय एव ते.. (१०)
जो कशिपु उपबर्हण को लाते हैं, वे ही यज्ञ की परिधियां हैं. (१०)
यदाञ्जनाभ्यञ्जनमाहरन्त्याज्यमेव तत्.. (११)
जो कशिपु उपबृंहण लाते हैं, वे ही आज्य हैं. (११)
यत् पुरा परिवेशात् खादमाहरन्ति पुरोडाशावेव तौ.. (१२)
जो सामने परोसने के लिए खाद्य पदार्थ लाते हैं, वे ही पुरोडाश हैं. (१२)
यदशनकृतं ह्वयन्ति हविष्कृतमेव तद्ध्वयन्ति.. (१३)
भोजन के हेतु जो आमंत्रित करते हैं, वही हवि स्वीकार करने के लिए आह्वान है. (१३)
ये व्रीहयो यवा निरुप्यन्तें ऽ शव एव ते.. (१४)
जो धान और जौ निरूपित किए जाते हैं, वे ही सोम हैं. (१४)
यान्युलूखलमुसलानि ग्रावाण एव ते.. (१५)
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