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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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खा लेता है. संध्या आदि नित्य कर्म इष्ट और किसी प्रयोजन से किए जाने वाले यज्ञ आदि
कर्म आपूर्त कहलाते हैं. (१)
पयश्च वा एष रसं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वोऽतिथेरश्नाति.. (२)
जो अतिथियों से पहले भोजन करता है, वह अपने घरों के दूध और रस को नष्ट करता
है. (२)
ऊर्जां च वा एष स्फातिं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (३)
जो व्यक्ति अतिथि से पहले भोजन कर लेता है, वह अपने घरों के बल और समृद्धि का
नाश करता है. (३)
प्रजां च वा एष पशूंश्च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (४)
जो अतिथि से पहले भोजन करता है, वह अपने घरों की संतान और पशुओं का भक्षण
करता है. (४)
कीर्तिं च वा एष यशश्च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (५)
जो अतिथि से पूर्व भोजन करता है, वह अपने घरों की कीर्ति और यश को समाप्त
करता है. (५)
श्रियं च वा एष संविदं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (६)
जो अतिथि से पूर्व भोजन करता है, वह अपने घरों की श्री और सौमनस्य का विनाश
करता है. (६)
एष वा अतिथिर्यच्छ्रोत्रियस्तस्मात् पूर्वो नाश्नीयात्.. (७)
श्रोत्रिय ब्राह्मण ही वास्तव में अतिथि है. यजमान को चाहिए कि उस से पूर्व भोजन नहीं
करे. (७)
अशितावत्यतिथावश्नीयाद् यज्ञस्य सात्मत्वाय यज्ञस्याविच्छेदाय तद्
व्रतम्.. (८)
अतिथि के भोजन कर लेने पर ही यजमान भोजन करे. यज्ञ के निर्वाह एवं यज्ञ का
विच्छेद न होने के लिए ही यह व्रत है. (८)
एतद् वा उ स्वादीयो यदधिगवं क्षीरं वा मांसं वा तदेव नाश्नीयात्.. (९)
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