अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयो वा अभिभुवं नामर्तुं वेद.
अभिभवन्तीमभिभवन्तीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वा अभिभूर्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३६)
जो अभिभवंती नाम की ऋतु को जानता है, वह अभिभवंती ऋतु को जानता हुआ ही
अपने अप्रिय शत्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य को छीन लेता है. यह अभिभू नाम की ऋतु ही
पंचौदन रूप अज है. जो दक्षिणा से प्रकाशित पंचौदन रूप अज का दान करता है, वह अपने
अप्रिय शत्रुओं और बांधवों के ऐश्वर्य को अपने तेज से जला देता है. (३६)
अजं च पचत पञ्च चौदनान्.
सर्वा दिशः संमनसः सध्रीचीः सान्तर्देशाः प्रति गृह्णन्तु त एतम्.. (३७)
पंचौदन रूप अज को पकाओ. अंतर्दिशाओं के सहित दिशाएं एकमत हो कर अंतर्देशों
सहित उसे ग्रहण करे. (३७)
तास्ते रक्षन्तु तव तुभ्यमेतं ताभ्य आज्यं हविरिदं जुहोमि.. (३८)
वे सभी दिशाएं मेरे यज्ञ की रक्षा करें. उन के लिए मैं यह हवि देता हूं. (३८)
सूक्त-६ देवता—अतिथि, विद्या
यो विद्याद् ब्रह्म प्रत्यक्षं परूंषि यस्य संभारा ऋचो यस्यानूक्यम्.. (१)
जो ब्रह्म को प्रत्यक्ष रूप में जानता है, उस की गांठें ही संभार हैं तथा ऋचाएं उस का
अनूक्य हैं. (१)
सामानि यस्य लोमानि यजुर्हृदयमुच्यते परिस्तरणमिद्धविः.. (२)
सामवेद के मंत्र जिस के रोम हैं और परिस्तरण जिस का हवि है. (२)
यद् वा अतिथिपतिरतिथीन् प्रतिपश्यति देवयजनं प्रेक्षते.. (३)
अथवा जो अतिथियों का स्वामी और अतिथियों को देखता है, वह देव यज्ञ को ही
देखता है. (३)
यदभिवदति दीक्षामुपैति यदुदकं याचत्यपः प्र णयति.. (४)
अतिथि से जो बोलता है, वही दीक्षा है. जल की याचना ही उस को लाना है. (४)
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