अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.
The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.
The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.
सूक्त-४८ देवता—सिनीवाली
बिगाड़ने वाले तथा दावाग्नि के जलाने के समान क्रोध करते हुए सामने वाले पुरुष को मेरे
विषय में प्रयोग की जाती हुई ईर्ष्या को इस प्रकार शांत करो, जिस प्रकार शीतल जल डालने
से अग्नि शांत कर दी जाती है. (१)
सूक्त-४८ देवता—सिनीवाली
सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानाम्सि स्वसा.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिड्ढि नः.. (१)
हे सिनीवाली! अर्थात् ऐसी अमावस्या! जिस में चंद्रमा दिखाई नहीं देता है, तू बहुत से
जनों द्वारा स्तुति की गई एवं देवों की बहन है. तू सामने डाले गए हव्य को स्वीकार कर तथा
हमारे लिए पुत्र आदि के रूप में प्रजा प्रदान कर. (१)
या सुबाहुः स्वङगुरिः सुषूमा बहुसूवरी.
तस्यै विशपत्न्यै हविः सिनीवाल्यै जुहोतन.. (२)
हे सिनीवाली! तू सुंदर हाथ वाली, शोभन उंगलियों वाली, सुंदर प्रसव वाली तथा बहुत
सी प्रजाओं को जन्म देने वाली है. हे ऋत्विजो तथा यजमानो! प्रजाओं का पालन करने
वाली उस सिनीवाली के लिए हवि दो. (२)
या विशपत्नीन्द्रमसि प्रतीची सहस्त्रस्तुकाभियन्ती देवी.
विष्णो पत्नि तुभ्यं राता हवींषिपतिं देवि राधसे चोदयस्व.. (३)
जो सिनीवाली प्रजाओं का पालन करने वाली तथा परमैश्वर्य संपन्न इंद्र के सामने खड़ी
होने वाली है तथा हजारों स्तोताओं द्वारा प्रशंसित एवं प्रकाशित होने वाली है. हे विष्णु
अथवा इंद्र की पत्नी! तेरे लिए हवि दी गई है. हे देवी! तू प्रसन्न हो कर अपने पति इंद्र को हमें
धन देने के लिए प्रेरित कर. (३)
सूक्त-४९ देवता—कुहू
कुहूं देवीं सुकृतं विद्मनापसमस्मिन् यज्ञे सुहवा जोहवीमि.
सा नो रयिं विश्ववारं नि यच्छाद् ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम्.. (१)
कुहू अथवा चंद्रमा दिखाई न देने वाली अमावस्या देवी को मैं इस यज्ञ में बुलाता हूं
अथवा हवि से होम करता हूं. शोभन कर्म करने वाली, विदित कर्मों वाली एवं शोभन आह्वान
वाली वह अमावस्या हमें सब के द्वारा वरणीय धन दे तथा अधिक धन देने वाला, प्रशंसनीय
एवं वीर पुत्र प्रदान करे. (१)
कुहूर्देवानाम्मृतस्य पत्नी हव्या नो अस्य हविषो जुषेत.
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सूक्त-५० देवता—राका अर्थात् पूर्णमासी
शृणोतु यज्ञमुशती नो अद्य रायस्पोषं चिकितुषी दधातु.. (२)
देवों के मध्य कुहू अर्थात् अमावस्या रूप देवी अमृत अथवा जल की पत्नी अर्थात्
पालन करने वाली है. हव्य देने योग्य यह हमारे द्वारा दिए जाते हुए हवि को प्राप्त करे तथा
हमारे यज्ञ की कामना करती हुई आज हमारा आह्वान सुने. इस के पश्चात हमारे यज्ञ को
जानने वाली वह हमारे धन को पुष्ट करे. (२)
सूक्त-५० देवता—राका अर्थात् पूर्णमासी
राकामहं सुहवा सुष्टुती हुवे शृणोतु नः सुभगा बोधतु त्मना.
सीव्यत्वपः सूच्या ऽ च्छिद्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम्.. (१)
मैं शोभन आह्वान वाली, पूर्ण चंद्र से सुशोभित एवं शोभन स्तुति वाली पूर्णिमा का
आह्वान करता हूं. यह शोभन ज्ञान वाली पूर्णिमा मेरा आह्वान सुने तथा प्रजनन के लक्षण को
सी दे. ऐसा वह न टूटने वाली नाड़ी रूपी सूई से सिए. ऐसा कर के पूर्णिमा हमें विक्रांत पुत्र
एवं बहुत सा धन प्रदान करे. (१)
यास्ते राके सुमतयः सुपेशसो याभिर्ददासि दाशुषे वसूनि.
ताभिर्नो अद्य सुमना उपागहि सहस्रापोषं सुभगे रराणा.. (२)
हे राका अर्थात् पूर्णिमा देवी! तेरी जो सुंदर रूप वाली कल्याण बुद्धियां हैं, जिन के
द्वारा तू हवि देने वाले यजमान को धन प्रदान करती है, आज तू उन्हीं कल्याणकारी बुद्धियों
एवं शोभन मन से युक्त हो कर हमारे समीप आ. तू हमें बहुत से धनों का पोषण देती हुई आ.
(२)
सूक्त-५१ देवता—देव पत्नियां
देवानां पत्नीरुशतीरवन्तु नः प्रावन्तु नस्तुजये वाजसातये.
याः पार्थिवासो या अपामपि व्रते ता नो देवीः सुहवाः शर्म यच्छन्तु.. (१)
हमारी कामना करती हुई देव पत्नियां हमारी रक्षा करें तथा हमें संतान और अन्न प्रदान
करने के लिए आएं. जो देव पत्नियां पृथ्वी पर रहने वाली तथा अंतरिक्ष में स्थित हैं, वे शोभन
आह्वान सुन कर हमें सुख और गृह प्रदान करें. (१)
उत ग्ना व्यन्तु देवपत्नीरिन्द्राण्य१ग्नाय्यश्विनी राट्.
आ रोदसी वरुणानी शृणोतु व्यन्तु देवीर्य ऋतुर्जनीनाम्.. (२)
देव पत्नियां अर्थात् देवियां मेरी कामना करें. वे देवियां इंद्र पत्नी, अग्नि पत्नी एवं
अश्विनीकुमारों की पत्नियां हैं. रुद्र की पत्नी रुद्राणी और वरुण की पत्नी वरुणानी मेरे सामने
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सूक्त-५२ देवता—इंद्र
आ कर मेरी स्तुति सुनें. नारियों का जो ऋतु काल है, उस समय देव पत्नियां हमारी हवि को
स्वीकार करें. (२)
सूक्त-५२ देवता—इंद्र
यथा वृक्षमशनिर्विश्वाहा हन्त्यप्रति. एवाहमद्य कितवानक्षैर्बध्यासमप्रति..
(१)
बिजली की आग अद्वितीय है तथा वह जिस प्रकार वृक्षों का विनाश करती है, उसी
प्रकार मैं भी अद्वितीय हो कर आज जुआरी पुरुषों का वध करूं. मैं जुआरियों का वध पासों
से करूंगा अर्थात् उन्हें पासों से हराऊंगा, पराजित करूंगा. (१)
तुराणामतुराणां विशामवर्जुषीणाम्. समैतु विश्वतो भगो अन्तर्हस्तं कृतं
मम.. (२)
जुआ खेलने में चाहे जुआरी शीघ्रता करे अथवा देरी करे, मैं ही उस से जुए में जीतूंगा.
जो जुआरी हार जाने पर भी इस आशा से जुआ खेलना बंद नहीं करता कि मैं ही जीतूंगा,
ऐसे जुआरी लोगों का धन सभी ओर से मेरे ही पास आए. जुए के पासे मेरे ही हाथ में रहें.
(२)
ईडे अग्निं स्वावसुं नमोभिरिह प्रसक्तो वि चयत् कृतं नः.
रथैरिव प्र भरे वाजयद्भिः प्रदक्षिणं मरुतां स्तोममृध्याम्.. (३)
जो अग्नि देव अपना धन अपने स्तुतिकर्ताओं को देते हैं, मैं उन की स्तुति करता हूं. इस
द्यूत कर्म के अधिपति अग्नि देव हम जुआरियों के लाभ के लिए कृपा करें. अग्नि देव रथों के
समान स्थित पासों से प्रहार करें. इस के पश्चात मैं सभी देवों की क्रम से स्तुति प्रारंभ करूं.
(३)
वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमंशमुदवा भरेभरे.
अस्मभ्यमिन्द्र वरीयः सुगं कृधि प्र शत्रूणां मघवन् वृष्ण्या रुज.. (४)
हे इंद्र! तुम्हारी सहायता से हम अपने विरोधी जुआरी को जीत लें. तुम प्रत्येक द्यूत
क्रीड़ा में हम जीत के इच्छुकों का अंश सुरक्षित करो. इस के अतिरिक्त तुम हमें अत्यधिक
धन प्राप्त कराओ. हे धनवान इंद्र! तुम मेरे विरोधी जुआरियों को जीतने की शक्ति को समाप्त
कर दो. (४)
अजैषं त्वा संलिखितमजैषमुत संरुधम्.
अविं वृको यथा मथदेवा मथ्नामि ते कृतम्.. (५)
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विरोधी जुआरी को संबोधन कर के कहा जा रहा है—हे जुआरी! तूने अपने पैरों में
अंकों को ठीक से लिख लिया है. फिर भी मैं तुझे जीतूंगा. मैं तुझे ऐसे स्थान में जीत लूंगा,
जहां अंक रोके जाते हैं. भेड़िया जिस प्रकार भेड़ को मसल डालता है, उसी प्रकार मैं तेरे
दांव को नष्ट कर दूंगा. (५)
उत प्रहामतिदीवा जयति कृतमिव श्वघ्नी वि चिनोति काले.
यो देवकामो न धनं रुणद्धि समित् तं रायः सृजति स्वधाभिः.. (६)
अधिक जुआ खेलता हुआ पुरुष अपने विरोधी जुआरी को जीत लेता है, क्योंकि दूसरे
का धन हरण करने वाला जुआरी पासे फेंकने से पहले ही उस के अंकों का निश्चय कर लेता
है. देवों की कामना करता हुआ जो जुआरी जीत में प्राप्त धन को देव संबंधी कार्यों में लगाता
है, उसे इंद्र धनों और अन्नों से युक्त करते हैं. (६)
गोभिष्टरेमाममतिं दुरेवां यवेन वा क्षुधं पुरुहूत विश्वे.
वयं राजसु प्रथमा धनान्यरिष्टासो वृजनीभिर्जयेम.. (७)
हे इंद्र! दरिद्रता के कारण आई हुई दुर्बुद्धि को मैं पशुओं के द्वारा पार करूं. हे बहुतों
द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम सभी जौ आदि अन्नों की सहायता से भूख का निवारण करें. विरोधी
जुआरियों से पराजित न होते हुए हम मुख्य धनों को जुआघर से जीत कर ले जाएं. (७)
कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः.
गोजिद् भूयासमश्वजिद् धनंजयो हिरण्यजित्.. (८)
मेरे दाहिने हाथ में लाभ का कारण कृत अर्थात् जुए की महान विजय तथा बाएं हाथ में
ऐसी विजय है, जो जुए का साध्य है. इस प्रकार मैं दूसरों की गायों को जीतने वाला, घोड़ों
को जीतने वाला, धन को जीतने वाला और स्वर्ण जीतने वाला बनूं. (८)
अक्षाः फलवतीं ध्रुवं दत्त गां क्षीरिणीमिव.
सं मा कृतस्य धारया धनुः स्नाव्नेव नह्यत.. (९)
विजय के लिए पासों से प्रार्थना की जा रही है—हे पासो! तुम इस जुए के खेल को मेरे
लिए इस प्रकार फल देने वाला बनाओ, जिस प्रकार दूध देने वाली गाय होती है. धनुष जिस
प्रकार तांत से बनी डोरी के द्वारा बाण को दूर फेंकता है, उसी प्रकार पासे चार संख्या वाले
दावों के लिए मुझे विजय से जोड़ें. (९)
सूक्त-५३ देवता—इंद्र, बृहस्पति
बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः.
इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरीयः कृणोतु.. (१)
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सूक्त-५४ देवता—सौमनस्य
बृहस्पति पश्चिम दिशा से, उत्तर दिशा से तथा नीचे वाले स्थान से हिंसा करने वाले पुरुष
से मेरी रक्षा करें. इंद्र पूर्व दिशा से तथा बीच के स्थान से हमारी रक्षा करें. मित्र बने हुए इंद्र
हम स्तोताओं के लिए अधिक धन प्रदान करें. (१)
सूक्त-५४ देवता—सौमनस्य
संज्ञानं नः स्वेभिः संज्ञानमरणेभिः. संज्ञानमश्विना युवमिहास्मासु नि
यच्छतम्.. (१)
अपने लोगों के साथ हमारा एकमत हो तथा अनुकूल न बोलने वाले अर्थात् प्रतिकूल
पुरुषों के साथ हम समान ज्ञान वाले हों. हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों इस समय इस विषय में
अपने और परायों के साथ हमें एकमत बनाओ. (१)
सं जानामहै मनसा सं चिकित्वा मा युष्महि मनसा दैव्येन.
मा घोषा उत्स्थुर्बहुले विनिर्हते मेषुः पप्तदिन्द्रस्याहन्यागते.. (२)
हम अपने मन के साथ दूसरों के मन को संयुक्त करें और जाग कर दूसरों के कार्यों से
संगत बनें. हम देव संबंधी मन अर्थात् देवों के प्रति श्रद्धा रखने वाले मन के कारण दूसरों से
अलग न हों. अधिक कुटिलता संबंधी शब्द न उठें. दिन निकलने पर इंद्र के वज्र के समान
मर्मवेधी वाणी हमें सुनाई न दे. (२)
सूक्त-५५ देवता—आयु
अमुत्रभूयादधि यद् यमस्य बृहस्पतेअभिशस्तेरमुञ्चः.
प्रत्यौहतामश्विना मृत्युमस्मद् देवानाम्ने भिषजा शचीभिः.. (१)
हे बृहस्पति! परलोक में भवन वाले यमराज के शाप से तुम इस ब्रह्मचारी को छुड़ाते
हो. यमराज का शाप मरण का कारण है. हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से अश्विनीकुमार अपनी
क्रियाओं के द्वारा हमारे ब्रह्मचारी को मृत्यु के कारण से छुड़ाएं. (१)
सं क्रामतं मा जहीतं शरीरं प्राणापानौ ते सयुजाविह स्ताम्.
शतं जीव शरदो वर्धमानो ऽ ग्निष्टे गोपा अधिपा वसिष्ठः.. (२)
हे प्राण और अपान वायु! तुम दोनों आयु की कामना करने वाले मनुष्य के शरीर में
संक्रमण करो तथा उस के शरीर का त्याग मत करो. हे आयु की कामना करने वाले पुरुष!
तेरे इस शरीर में प्राण और अपान वायु संयुक्त रहें. इस के पश्चात तू सौ वर्ष तक जीवित रहे.
जीवित रहते हुए तेरे हवि आदि से समृद्ध होते हुए अग्नि देव तेरी रक्षा करने वाले, तुझे अपना
समझने वाले तथा निवास स्थान देने वाले हों. (२)
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आयुर्यत् ते अतिहितं पराचैरपानः प्राणः पुनरा ताविताम्.
अग्निष्टदाहार्निर्ऋतेरुपस्थात् तदात्मनि पुनरा वेशयामि ते.. (३)
हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तुम्हारा जो जीवन तुम्हें छोड़ कर और तुम्हारा
अतिक्रमण कर के गया है, वह प्राण और अपान वायु की कृपा से पुनः वापस आ जाए. उस
आयु का अग्नि ने निकृष्ट गति वाली मृत्यु के पास से हरण कर लिया है. अग्नि के द्वारा हरण
कर के लाई गई उस आयु को मैं तेरे शरीर में पुनः स्थापित करता हूं. (३)
मेमं प्राणो हासीन्मो अपानो ऽ वहाय परा गात्.
सप्तर्षिभ्य एनं परि ददामि त एनं स्वस्ति जरसे वहन्तु.. (४)
प्राण वायु इस आयु चाहने वाले पुरुष का त्याग न करे तथा अपान वायु भी इसे छोड़
कर न जाए. मैं इस पुरुष को रक्षा के हेतु सप्त ऋषियों के लिए सौंप रहा हूं. वे सात ऋषि
अर्थात् सात प्राण इसे वृद्धावस्था तक ले जाएं. (४)
प्र विशतं प्राणापानावड्वान्वाविव व्रजम्.
अयं जरिम्णः शेवधिररिष्ट इह वर्धताम्.. (५)
हे प्राण और अपान वायु! जिस प्रकार गाड़ी को खींचने वाले बैल गोठ में प्रवेश करते
हैं, उसी प्रकार तुम आयु चाहने वाले पुरुष के शरीर में प्रवेश करो. वह आयु चाहने वाला
पुरुष वृद्धावस्था की निधि बने. वह इस लोक में मृत्यु की बाधा से रहित हो कर जीवित रहे
एवं वृद्धि को प्राप्त करे. (५)
आ ते प्राणं सुवामसि परा यक्ष्मं सुवामि ते.
आयुर्नो विश्वतो दधदयमग्निवरेण्यः.. (६)
हे आयु चाहने वाले पुरुष! हम तेरे प्राण को वापस बुलाते हैं. हम तेरी आयु के
प्रतिबंधक यक्ष्मा रोग को पीछे हटने के लिए प्रेरित करते हैं. वे वरेण्य एवं हवन किए जाते हुए
अग्नि देव हमारे इस यजमान को सभी प्रकार से सौ वर्ष की आयु प्रदान करें. (६)
उद् वयं तमस्परि रोहन्तो नाकमृत्तमम्.
देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (७)
पाप से ऊपर उठे हुए हम उत्तम एवं दुःख रहित स्वर्ग में आरोहण करें. इस के पश्चात
हम उत्तम एवं ज्योतिरूप में प्रकाशित सूर्य देव के समीप जाएं. (७)
सूक्त-५६ देवता—इंद्र
ऋचं साम यजामहे याभ्यां कर्माणि कुर्वते.
एते सदसि राजतो यज्ञं देवेषु यच्छतः.. (१)
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सूक्त-५७ देवता—इंद्र
हे धन देने वाले इंद्र! तुम्हारे जो मार्ग द्युलोक से नीचे वर्तमान हैं, उन विश्व प्रेरक मार्गों के
द्वारा हमें सुख में स्थापित करो. अर्थात् हमें सुख प्रदान करो. (१)
सूक्त-५७ देवता—इंद्र
ऋचं साम यदप्राक्षं हविरोज़ो यजुर्बलम्.
एष मा तस्मान्मा हिंसीद् वेदः पृष्टः शचीपते.. (१)
हम ऋग्वेद और सामवेद को हवि के द्वारा पूजते हैं. यजमान ऋग्वेद और सामवेद के
द्वारा यज्ञ कर्म करते हैं. ये दोनों वेद सदस नामक मंडप में शोभा देते हैं तथा यज्ञ को देवों तक
पहुंचाते हैं. (१)
ये ते पन्थानो ऽ व दिवो येभिर्विश्वम्मैरयः. तेभिः सुम्नया धेहि नो वसो.. (२)
मैं ने ऋग्वेद से हवि, सामवेद से ओज और यजुर्वेद से बल के विषय में पूछा था. अर्थात्
ऋग्वेद आदि में हवि आदि का अध्ययन किया था. हे शची के पति और व्याकरण के नियम
बनाने वाले इंद्र! इस प्रकार सुविचारित ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद मुझ अध्यापक के
अध्ययनअध्यापन में बाधा न डाल कर मनचाहा फल दें. (२)
सूक्त-५८ देवता—बिच्छू
तिरश्चिराजेरसितात् पृदाकोः परि संभृतम्.
तत् कङ्कपर्वणो विषमियं वीरुदनीनशत्.. (१)
तिरश्चिराजी अर्थात् तिरछी रेखाओं वाले काले और पृदाकू अर्थात् अपने द्वारा काटे हुए
प्राणियों को रुलाने वाले सर्पों के विष को तथा कंकपर्व नामक काटने वाले विषैले जंतु के
विष को यह मधु नाम की जड़ीबूटी नष्ट करे. (१)
इयं वीरुन्मधुजाता मधुश्चुन्मधुला मधूः.
सा विह्रुतस्य भेषज्यथो मशकजम्भनी.. (२)
यह प्रयोग की जाती हुई ओषधि मधु अर्थात् शहद से निर्मित है, इसलिए इस से शहद
टपकता है. मधु युक्त तथा मधूक नाम वाली यह जड़ीबूटी कुटिलता करने वाले विष का नाश
करने वाली तथा मच्छरों को समाप्त करने वाली है. (२)
यतो दष्टं यतो धीतं ततस्ते निर्ह्वयामसि.
अर्भस्य तृप्रदंशिनो मशकस्यारसं विषम्.. (३)
विषैले जंतु द्वारा काटे गए पुरुष से कहा जा रहा है—हे सर्प द्वारा काटे गए पुरुष!
तुम्हारे जिस अंग में विषैले सर्प ने काटा है अथवा तुम्हारे जिस अंग को सर्प आदि ने पिया है,
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उस अंग से मैं सर्प का विष निकालता हूं तथा मुख, पूंछ और चरण-इन तीन अंगों से काटने
वाले मच्छर के विष को भी मैं प्रभावहीन बनाता हूं. (३)
अयं यो वक्रो विपरुर्व्यङ्गो मुखानि वक्रा वृजिना कृणोषि.
तानि त्वं ब्रह्मणस्पत इषीकामिव सं नमः.. (४)
हे ब्रह्मणस्पति! सर्प आदि के द्वारा काटा हुआ जो यह पुरुष अंगों को सिकोड़ता है, इस
के अंगों के जोड़ ढीले पड़ गए हैं, इस के अवयव विवश हो गए हैं तथा इस के मुख आदि
अंग टेढ़े पड़ गए हैं. तुम इस के सभी अंगों को उसी प्रकार सीधा बनाओ, जिस प्रकार टेढ़ी
सींक को सरल बनाया जाता है. (४)
अरसस्य शर्कोटस्य नीचीनस्योपसर्पतः. विषं ह्य१ स्यादिष्यथो
एनमजीजभम्.. (५)
विष रहित, नीचे की ओर मुंह किए हुए एवं तेरे समीप आते हुए शर्कोटक नाम के सांप
के मैं ने टुकड़े कर दिए हैं अर्थात् मैं ने इस का विष समाप्त कर दिया है तथा इस सर्प को मैं
ने नष्ट कर दिया है. (५)
न ते बाह्वोर्बलमस्ति न शीर्षे नोत मध्यतः.
अथ किं पापया ऽ मुया पुच्छे बिभर्ष्यर्भकम्.. (६)
बिच्छू को संबोधन कर के कहा जा रहा है - हे बिच्छू! तेरे हाथों में दूसरों को पीड़ा
पहुंचाने वाला बल नहीं है. तेरे सिर में भी बल नहीं है. तेरे मध्य भाग अर्थात् कमर में भी बल
नहीं है. तू अपनी, परपीड़ाकारिणी बुद्धि के द्वारा थोड़ा विष अपनी पूंछ में क्यों धारण करता
है? (६)
अदन्ति त्वा पिपीलिका वि वृश्चन्ति मयूर्यः.
सर्वे भल ब्रवाथ शर्कोटमरसं विषम्.. (७)
हे सर्प! तुझे चीटियां खा लेती हैं और मोरनियां तेरे टुकड़े-टुकड़े कर देती हैं. हे सर्प का
विष दूर करने में समर्थ जड़ीबूटियो! तुम शर्कोटक सर्प के विष को सामर्थ्यहीन कर देती हो,
यह बात भलीभांति कही जाती है. (७)
य उभाभ्यां प्रहरसि पुच्छेन चास्ये न च.
आस्ये ३ न ते विषं किमु ते पुच्छधावसत्.. (८)
हे बिच्छू! तू पूंछ और मुख दोनों के द्वारा प्राणियों को बाधा पहुंचाता है तेरे मध्य भाग
और मुख में विष नहीं है. तेरे रोओं वाले भाग अर्थात् पूंछ में विष क्यों हो. (८)
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सूक्त-५९ देवता—सरस्वती
यदाशसा वदतो मे विचुक्षुभे यद् याचमानस्य चरतो जनाँ अनु.
यदात्मनि तन्वो मे विरिष्टं सरस्वती तदा पृणद् घृतेन.. (१)
मांगने के लिए दाताओं से स्पष्ट बात कहने वाला मेरा जो अंग क्षुब्ध था तथा मांगने के
लिए जनजन के समीप मेरा जो अंग व्याकुल था, मेरे शरीर का वह बाधित अंग सरस्वती
क्षोभ रहित करें तथा उसे घृत से पूर्ण करें. (१)
सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवृत्न्र्तानि.
उभे इदस्योभे अस्य राजत उभे यतेते उभे अस्य पुष्यतः.. (२)
मरुतों से युक्त एवं जलों के पुत्र वरुण के लिए सात नदियां बहती हैं. द्युलोक में स्थित
इंद्र के निमित्त मनुष्य यज्ञ आदि कर्म करते हैं. वे यज्ञकर्म देवों और मानवों के संघ के निवास
स्थान होते हैं एवं आकाश और धरती इन देवों और मनुष्यों के ऐश्वर्य बनते हैं. आकाश और
धरती इन देवों तथा मनुष्यों के लिए प्रयत्न करते हैं तथा अन्न, जल आदि से पोषण करते हैं.
(२)
सूक्त-६० देवता—इंद्र, वरुण
इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रतौ.
युवो रथो अध्वरो देववीतये प्रति स्वसरमुप यातु पीतये.. (१)
हे निचोड़े गए सोमरस को पीने वाले एवं व्रत धारण करने वाले इंद्र और वरुण! मद
करने वाले एवं हमारे द्वारा निचोड़े गए सोमरस को पियो. शत्रुओं के द्वारा पराजित न होने
वाला तुम्हारा रथ तुम दोनों को सोमरस पीने और यज्ञ कर्म करने के लिए यजमान के घर के
समीप ले जाए. (१)
इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्.
इदं वामन्धः परिषिक्तमासद्यास्मिन् बर्हिषि मादयेथाम्.. (२)
हे मनचाहा फल देने वाले इंद्र और वरुण! तुम दोनों अत्यधिक मधुर और मनचाहा फल
देने वाले सोमरस को पियो. यह सोमलक्षण अन्न हम ने चमस आदि पात्रों में रख दिया है,
इसीलिए इस कुशासन पर बैठ कर सोमरस पियो और तृप्त हो जाओ. (२)
सूक्त-६१ देवता—शत्रु नाशन
यो नः शपादशपतः शपतो यश्च नः शपात्.
वृक्ष इव विद्युता हत आ मूलादनु शुष्यतु.. (१)
सूक्त-६२ देवता—गुहा
जो शत्रु हम निंदा न करने वालों की निंदा करता है और जो शत्रु हम निंदा करने वालों
की निंदा करता है, वह इस प्रकार नष्ट हो जाए जिस प्रकार बिजली से मारा हुआ वृक्ष जड़ से
सूख जाता है. (१)
सूक्त-६२ देवता—गुहा
ऊर्जं बिभ्रद् वसुवनिः सुमेधा अघोरेण चक्षुषा मित्रियेण.
गृहानैमि सुमना वन्दमानो रमध्वं मा बिभीत मत्.. (१)
हे घरो! अन्न धारण करता हुआ और धन का स्वामी मैं शोभन बुद्धि वाला हो कर तुम्हें
अनुकूल और मैत्री पूर्ण दृष्टि से देखूं. मैं तुम्हारी स्तुति करता हुआ तुम्हारे पास आऊं. मेरे
अधिकार में तुम सुखी रहो, इसलिए जब मैं दूसरे स्थान से तुम्हारे पास आऊं तो तुम मुझे
पराया समझ कर भय मत करो. (१)
इमे गृहा मयोभुव ऊर्जस्वन्तः पयस्वन्तः.
पूर्णा वामेन तिष्ठन्तस्ते नो जानन्त्वायतः.. (२)
यह घर सुख देने वाले, अन्न एवं रस से युक्त, दूध आदि एवं धन से समृद्ध रहे हैं. सामने
दिखाई देते हुए ये घर प्रवास से आते हुए हमें स्वामी के रूप में जानें. (२)
येषामध्येति प्रवसन् येषु सौमनसो बहुः.
गृहानुप ह्वयामहे ते नो जानन्त्वायतः.. (३)
प्रवास करता हुआ पुरुष जिन घरों का स्मरण करता है तथा जिन घरों में सौमनस्य
वाला पदार्थ अधिक मात्रा में है, मैं ऐसे घर पाने के लिए प्रार्थना करता हूं. हमारे ये घर प्रवास
से आते हुए हमें स्वामी के रूप में जानें. (३)
उपहूता भूरिधनाः सखायः स्वादुसंमुदः.
अक्षुध्या अतृष्या स्त गृहा मास्मद् बिभीतन.. (४)
हे घरो! अनुमति हेतु प्रार्थना करने पर तुम अधिक धन युक्त, मैत्रीपूर्ण तथा स्वादिष्ट और
मधुर पदार्थों से युक्त बनो. तुम सदा भूख और प्यास से रहित अर्थात सभी प्रकार तृप्त जनों
वाले बनो. हे घरो! जब हम बाहर से आएं, तब तुम हमें पराया समझ कर भयभीत मत बनो.
(४)
उपहूता इह गाव उपहूता अजावयः.
अथो अन्नस्य कीलाल उपहूतो गृहेषु नः.. (५)
हमारे घरों में गाएं, बकरियां और भेड़ें बुलाई जाएं. इस के अतिरिक्त हमारे घरों में अन्न
का सारभूत अंश भी चाहा जाए. (५)
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सूनृतावन्तः सुभगा इरावन्तो हसामुदाः.
अतृष्या अक्षुध्या स्त गृहा मास्मद् बिभीतन.. (६)
हे घरो! तुम में प्यारी और सच्ची बातें कही जाएं, तुम शोभन भाग्य वाले बनो. सदा तुम
में अन्न भरा रहे. तुम लोगों की हंसी से मुखरित रहो. हम जब बाहर से आएं तो तुम हमें
पराया समझ कर भयभीत मत होना. (६)
इहैव स्त मानु गात विश्वा रूपाणि पुष्यत.
ऐष्यामि भद्रेणा सह भूयांसो भवता मया.. (७)
हे घरो! तुम इसी स्थान पर सुखी रहो. प्रवास करते हुए मुझ गृहस्वामी के पीछे मत
आओ. तुम पशु आदि सभी रूपों वाले का पोषण करो. मैं धन ले कर पुनः तुम्हारे समीप
आऊंगा. देशांतर से वापस आते मुझे पराया समझ कर तुम भयभीत मत होना. (७)
सूक्त-६३ देवता—अग्नि
यदग्ने तपसा तप उपतप्यामहे तपः.
प्रियाः श्रुतस्य भूयास्मायुष्मन्तः सुमेधसः.. (१)
हे अग्नि देव! तुम्हारे समीप समिदाधान आदि रूप कर्म के द्वारा जो तप किया जा
सकता है, वह तप हम करते हैं. उस तप के द्वारा हम अध्ययन किए हुए वेदमंत्रों के प्रिय,
अधिक आयु वाले और उत्तम धारण शक्ति से संपन्न बनें. (१)
अग्ने तपस्तप्यामह उप तप्यामहे तपः.
श्रुतानि शृण्वन्तो वयमायुष्मन्तः सुमेधसः.. (२)
हे अग्नि देव! तुम्हारे समीप ही हम शरीर को सुखाने वाला तप करें. हम इस का तप
किसी दूसरे स्थान पर न करें. हम अध्ययन किए गए वेदमंत्रों को सुनते हुए अधिक आयु वाले
और उत्तम बुद्धि वाले बनें. (२)
सूक्त-६४ देवता—जातवेद
अयमाग्नः सत्पतिर्वृद्धवृष्णो रथीव पत्तीनजयत् पुरोहितः.
नाभा पृथिव्यां निहितो दविद्युतदधस्पदं कृणुतां ये पृतन्यवः.. (१)
यह अग्नि देव देवों का पालन करने वाले तथा अधिक शक्ति संपन्न हैं. रथ में बैठा हुआ
व्यक्ति जिस प्रकार दूसरे की पत्नी अथवा प्रजा को अपने अधिकार में कर लेता है, उसी
प्रकार प्रजा को हम अपने वश में करें. यज्ञस्थल की नाभि अर्थात् उत्तरवेदी में स्थापित तथा
अत्यधिक दीप्त होते हुए अग्नि संग्राम में हमें जीतने वाले शत्रुओं को हमारे पैरों के नीचे
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सूक्त-६५ देवता—अग्नि
अर्थात् हमारा वशवर्ती बनाएं. (१)
सूक्त-६५ देवता—अग्नि
पृतनाजितं सहमानमग्निमुक्थैर्हवामहे परमात् सधस्थात्.
स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा क्षामद् देवो ऽ ति दुरितान्यग्निः.. (१)
संग्राम में शत्रुओं को जीतने वाले, शत्रुओं को पराजित करने वाले एवं अरणि रूपी
उत्तम स्थान से जन्म लेने वाले अग्नि का आह्वान हम मंत्रों के द्वारा करते हैं. वह हमारे सभी
कष्टों का विनाश करें. दीप्ति वाले अग्नि हमारे सभी पापों को दग्ध करें. (१)
सूक्त-६६ देवता—जल, अग्नि
इदं यत् कृष्णः शकुनिरभिनिष्पतन्नपीपतत्.
आपो मा तस्मात् सर्वस्माद् दुरितात् पान्त्वंहसः.. (१)
काले पक्षी अर्थात् कौए ने आकाश से नीचे आते हुए, जो पंखों से मेरे अंग पर चोट की
है, उस से होने वाले समस्त पापों से अभिमंत्रित जल मेरी रक्षा करे. (१)
इदं यत् कृष्णः शकुनिरवामृक्षन्निर्ऋते ते मुखेन.
अग्निर्मा तस्मादेनसो गार्हपत्यः प्र मुञ्चतु.. (२)
हे मृत्युदेवता! काले पक्षी अर्थात् कौए ने जो अपने मुख से मेरे अंग को स्पर्श किया है,
उस से होने वाले पाप से मुझे गार्हपत्य नामक अग्नि बचाएं. (२)
सूक्त-६७ देवता—अपामार्ग
प्रतीचीनफलो हि त्वमपामार्ग रुरोहिथ.
सर्वान् मच्छपथाँ अधि वरीयो यावया इतः.. (१)
हे अपामार्ग अर्थात् चिरचिटा के झाड़! तुम सामने की ओर मुख वाले फलों के रूप में
उगे हो, इस कारण मेरे सभी दोषों को मुझ से अत्यधिक दूर करो. (१)
यद् दुष्कृतं यच्छमलं यद् वा चेरिम पापया.
त्वया तद् विश्वतोमुखापामार्गाप मृज्महे.. (२)
हमने जो दुष्कर्म, पाप एवं मलिन आचरण किया है, हे सभी ओर शाखाओं वाले
अपामार्ग अर्थात् चिरचिटा के झाड़! तेरे द्वारा हम उसे दूर करते हैं. (२)
श्यावदता कुनखिना बण्डेन यत्सहासिम.
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सूक्त-६८ देवता—ब्रह्मा
अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे.. (३)
हम ने काले दांतों वाले, बुरे नाखूनों वाले एवं नपुंसक पुरुष के साथ भोजन किया है. हे
अपामार्ग अर्थात् चिरचिटा के झाड़! तेरे द्वारा उस से होने वाले पाप का हम निवारण करते
हैं. (३)
सूक्त-६८ देवता—ब्रह्मा
यद्यन्तरिक्षे यदि वात आस यदि वृक्षेषु यदि वोलपेषु.
यदश्रवन् पशव उद्यमानं तद् ब्राह्मणं पुनरस्मानुपैतु.. (१)
आकाश के मेघाच्छन्न होने पर, आंधी चलने पर, वृक्षों की छाया में, फसलों में, ग्रामीण
एवं जंगली पशुओं के समीप मैं ने जो वेदाध्ययन किया है अथवा वेदपाठ सुना है, वह भी मेरे
लिए फलदायक हो. (१)
सूक्त-६९ देवता—आत्मा
पुनर्मैत्विन्द्रियं पुनरात्मा द्रविणं ब्राह्मणं च.
पुनरग्नयो धिष्ण्या यथास्थाम कल्पयन्तामिहैव.. (१)
इंद्र के द्वारा दिया हुआ वीर्य अथवा दी हुई चक्षु आदि इंद्रियों की शक्ति मेरे पास पुनः
आए. आत्मा, धन एवं वेद का अध्ययन मुझे पुनः प्राप्त हो. यज्ञ आदि कर्मों में स्थापित
अग्नियां इसी स्थान में पुनः प्रवृद्ध हों. (१)
सूक्त-७० देवता—सरस्वती
सरस्वति व्रतेषु ते दिव्येषु देवि धामसु.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि ररास्व नः.. (१)
हे सरस्वती देवी! तुम अपने से संबंधित व्रतों में एवं गार्हपत्य यज्ञ आदि रूप दिव्य
स्थानों में सामने आ कर हवि स्वीकार करो तथा हमें पुत्र आदि रूप प्रजा प्रदान करो. (१)
इदं ते हव्यं घृतवत् सरस्वतीदं पितॄणां हविरास्यं १ यत्.
इमानि त उदिता शांतमानि तेभिर्वयं मधुमन्तः स्याम.. (२)
हे सरस्वती! तुम्हारे लिए हवन किया जाता हुआ घृतयुक्त यह हवि तथा पितरों के
निमित्त दिया जाता हुआ यह हवि तथा हमारे लिए सुख देने वाले जो हवि हैं, ये तुम्हारे निमित्त
समर्पित किए गए हैं. तुम्हारे निमित्त दिए गए हवियों के द्वारा हम मधुर रस से युक्त अन्न वाले
हों. (२)
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सूक्त-७१ देवता—सरस्वती
सूक्त-७१ देवता—सरस्वती
शिवाः न शंतमा भव सुमृडीका सरस्वति. मा ते युयोम संदृशः.. (१)
हे सरस्वती! तुम हमारे निमित्त सभी सुख देने वाली, रोगनिवारण में अत्यधिक समर्थ
एवं शोभन सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारे यथार्थ रूप के ज्ञान से अलग न हों. (१)
सूक्त-७२ देवता—सुख
शं नो वातो वातु शं नस्तपतु सूर्यः.
अहानि शं भवन्तु नः शं रात्री प्रति धीयतां शमुषा नो व्युच्छतु.. (१)
बाहर चलती हुई वायु हमारे लिए सुख देती हुई बहे. सब के प्रेरक सूर्य हमारे लिए सुख
देते हुए तपें. दिन हमारे लिए सुख देने वाले हों तथा रात भी हमें सुख प्रदान करे. उषाकाल
इस प्रकार विकसित हों, जिस से हमें सुख मिल सके. (१)
सूक्त-७३ देवता—श्येन आदि मंत्र में उक्त
यत् किं चासौ मनसा यच्च वाचा यज्ञैर्जुहोति हविषा यजुषा.
तन्मृत्युना निर्ऋतिः संविदाना पुरा सत्यादाहुतिं हन्त्वस्य.. (१)
दूर स्थित मेरा शत्रु मेरी हत्या करने की इच्छा से जो कर्म करने का विचार करता है तथा
वचन से जो कर्म करने की बात कहता है, अभिचार कर्मों अर्थात् जादूटोने के द्वारा उस के
लिए उचित द्रव्य के द्वारा तथा मंत्र के द्वारा जो होम करता है, उस कर्म को सफल होने से
पहले ही पाप देवता निर्ऋति मृत्यु के साथ मिल कर नष्ट करें. (१)
यातुधाना निर्ऋतिरादु रक्षस्ते अस्य घ्नन्त्वनृतेन सत्यम्.
इन्द्रेषिता देवा आज्यमस्य मथ्नन्तु मा तत् सं पादि यदसौ जुहोति.. (२)
दूसरों को पीड़ा देने वाली पाप की देवी निर्ऋति एवं राक्षस मेरे इस शत्रु के यथार्थ कर्म
फल को असत्य फल के द्वारा समाप्त करें. तात्पर्य यह है कि मेरे शत्रु के द्वारा किया हुआ
अभिचार कर्म फल देने वाला न हो. उस का फल विपरीत हो. इंद्र के द्वारा प्रेरित देव इस शत्रु
का होम कर्म नष्ट करें. यह शत्रु हमारे वध के लिए जो कर्म करता है, वह संपन्न एवं
फलदायक न हो. (२)
अजिराधिराजौ श्येनौ संपातिनाविव.
आज्यं पृतन्यतो हतां यो नः कश्चाभ्यघायति.. (३)
अजिर और अधिराज नामक मृत्यु दूत मुझ से संग्राम करने के इच्छुक पुरुष के घृत से
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पूर्ण होने वाले होम कर्म का उसी प्रकार विनाश करें, जिस प्रकार पक्षियों के ऊपर बाज
आकाश मार्ग से गिरता है. जो शत्रु हमारे विपरीत हिंसा कर्म करने की इच्छा करता है, उस
का आज्य नष्ट हो जाए. (३)
अपाञ्चौ त उभौ बाहू अपि नह्याम्यास्यम्.
अग्नेर्देवस्य मन्युना तेन ते ऽ वधिषं हविः.. (४)
हे हमारे निमित्त अभिचार कर्म करने वाले मनुष्य! होम कर्म में लगे हुए तेरे दोनों हाथों
को मैं पीछे की ओर बांधता हूं, जिस से वे होम करने में समर्थ न हो सकें. मंत्र का उच्चारण
करने में समर्थ तेरे मुख को भी मैं बंद करता हूं. तेरे हाथों और मुख को बांधने से अग्नि देव के
क्रोध के कारण तेरे हवि को मैं नष्ट करूंगा. (४)
अपि नह्यामि ते बाहू अपि नह्याम्यास्यम्.
अग्नेर्घोरस्य मन्युना तेन ते ऽ वधिषं हविः.. (५)
मैं अभिचार कर्म में संलग्न तेरे दोनों हाथों और मुख को बांधता हूं, जिस से तेरे हाथ
आहुति न दे सकें और मुख मंत्र का उच्चारण न कर सके. इस प्रकार अग्नि देव के भयानक
क्रोध के द्वारा मैं तेरे हवि एवं उस से सिद्ध होने वाले कर्म का विनाश करता हूं. (५)
सूक्त-७४ देवता—अग्नि
परि त्वा ऽ ग्ने पुरं वयं विप्रं सहस्य धीमहि.
धृषद्वर्णं दिवेदिवे हन्तारं भंगुरावतः.. (१)
हे अरणि मंथन से उत्तम अग्नि! तुम कर्म फलों को पूर्ण करने वाले एवं मेधावी हो. हम
राक्षसों का हनन करने के लिए तुम्हें चारों ओर धारण करते हैं. तुम घर्षक रूप वाले एवं
राक्षसों का प्रतिदिन विनाश करने वाले हो. (१)
सूक्त-७५ देवता—इंद्र
उत् तिष्ठता ऽ व पश्यतेन्द्रस्य भागमृत्वियम्.
यदि श्वातं जुहोतन यद्यश्वातं ममत्तन.. (१)
ऋत्विजो! उठो, अर्थात् अपने आसनों पर बैठे मत रहो. वसंत आदि ऋतुओं में इंद्र को
देने के लिए पकाए जाने वाले हवि के भाग को देखो. यदि वह हवि पक गया है तो उसे इंद्र के
निमित्त अग्नि में हवन कर दो. यदि वह नहीं पका है तो उसे पकाओ. (१)
श्वातं हविरो ष्विन्द्र प्र याहि जगाम सूरो अध्वनो वि मध्यम्.
परि त्वासते निधिभिः सखायः कुलपा न व्राजपतिं चरन्तम्.. (२)
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सूक्त-७६ देवता—इंद्र
हे इंद्र! तुम्हारे निमित्त हवि पक गया है. इसलिए तुम शीघ्र आओ. सूर्य अपने गंतव्य
मार्ग के मध्य भाग में पहुंच गए हैं अर्थात् दोपहर हो गया है. ऋत्विज् निचोड़े हुए सोमरस के
द्वारा उसी प्रकार तुम्हारी उपासना कर रहे हैं, जिस प्रकार वंश के रक्षक पुत्र गृहपति की
उपासना करते हैं. (२)
सूक्त-७६ देवता—इंद्र
श्नातं मन्य ऊधनि श्नातमग्नौ सुशृतं मन्ये तदृतं नवीय:.
माध्यन्दिनस्य सवनस्य दध्न: पिबेन्द्र वज्रिन् पुरुकृज्जुषाण:.. (१)
हवि गाय के थनों में दूध के रूप में पका है और थनों से काढ़ा हुआ दूध अग्नि पर तपा
कर पकाया जाता है. मैं मानता हूं कि यह हवि भलीभांति पक चुका है, इसलिए यह हवि
सत्य एवं अधिक नवीन है. हे वज्रधारी एवं बहुत से कर्म करने वाले इंद्र! तुम प्रसन्न होते हुए,
माध्यंदिन सवन अर्थात् यज्ञ में सोमरस से संबंधित दधिमिश्रित सोमरस नामक हवि का पान
करो. (१)
सूक्त-७७ देवता—अंगिरस
समिद्धो अग्निर्वृषणा रथी दिवस्तप्तो घर्मो दुह्यते वामिषे मधु.
वयं हि वां पुरूदमासो अश्विना हवामहे सधमादेषु कारव:.. (१)
हे मनचाहा फल देने वाले अश्विनीकुमारो! द्युलोक में स्थित देवों के रथी अग्नि देव दीप्त
हो चुके हैं. उस अग्नि से आज्य ठीक से पक गया है. इस के पश्चात तुम्हारे अन्न के हेतु मधुर
रस वाला दूध काढ़ा जाता है. तुम दोनों के स्तुतिकर्ता हम हवि से पूर्ण घरों वाले हों एवं यज्ञों
में तुम्हारा आह्वान करें. (१)
समिद्धो अग्निरश्विना तप्तो वां घर्म आ गतम्.
दुह्यन्ते नूनं वृषणेह धेनवो दस्रा मदन्ति वेधस:.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! अग्नि दीप्त हो गई है और उस पर तुम्हारे लिए आज्य तप्त हो चुका
है, इसीलिए तुम आ जाओ. हे अभिमत फल देने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारे निमित्त प्रवर्ग्य
नामक कर्म में गाएं अधिक मात्रा में दुही जाती हैं इसलिए शत्रुओं का विनाश करने वाले तुम
अश्विनीकुमारों की स्तुतियों के द्वारा सेवा करते हुए होता प्रसन्न हो रहे हैं. (२)
स्वाहाकृत: शुचिर्देवेषु यज्ञो यो अश्विनोश्चमसो देवपान:.
तमु विश्वे अमृतासो जुषाणा गन्धर्वस्य प्रत्यास्ना रिहन्ति.. (३)
दीप्त प्रवर्ग्ययाग अश्विनीकुमारों आदि देवों के निमित्त दिया गया है. अश्विनीकुमार चमस
के द्वारा उस का पान करते हैं. अश्विनीकुमारों के उसी चमस को सभी अमर देव प्रसन्न होते
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हुए आदित्य के मुख से चाटते हैं. (३)
यदुस्रियास्वाहुतं घृतं पयो ऽ यं स वामश्विना भाग आ गतम्.
माध्वी धर्तारा विदथस्य सत्पती तप्तं घर्मं पिबतं रोचने दिवः.. (४)
गोशाला में स्थित गायों में वर्तमान जो घृत का उत्पादक दूध है, वह यज्ञ के पात्र में डाल
दिया गया है. वह तुम दोनों का भाग है, इसीलिए आओ. हे मधु विद्या के ज्ञाता
अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ के धारण कर्ता हो. हे देवों का पालन करने वाले अश्विनीकुमारो!
द्युलोक के प्रकाशक अग्नि में तपाए हुए घी का पान करो. (४)
तप्तो वां घर्मो नक्षतु स्वहोता प्र वामध्वर्युश्चरतु पयस्वान्.
मधोर्दुग्धस्याश्विना तनाया वीतं पातं पयस उस्रियायाः.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों होता के द्वारा भलीभांति स्तुति किए गए हो. तुम ठीक से
तपाए गए एवं विशाल पात्र में स्थित आज्य अर्थात् घी को प्राप्त करो. तुम्हारे लिए अध्वर्यु
नामक ऋत्विज् यज्ञ करे. इस के पश्चात दूध, घी आदि के द्वारा यज्ञ का विस्तार करने वाली
गाय के मधुर रस से युक्त दूध को तुम दोनों पियो. (५)
उप द्रव पयसा गोधुगोषमा घर्मे सिञ्च पय उस्रियायाः.
वि नाकमख्यत् सविता वरेण्यो ऽ नुप्रयाणमुषसो वि राजति.. (६)
हे गाय को दुहने वाले अध्वर्यु! तुम तपाए हुए दूध के साथ मेरे समीप आओ तथा गाय
के दूध को तपे हुए घी में डालो, जिस से सब के प्रेरक सविता देव स्वर्ग को प्रकाशित करें. वे
आदि उषा के गमन के पीछे विराजते हैं. (६)
उप ह्वये सुदुघां धेनुमेतां सुहस्तो गोधुगुत दोहदेनाम्
श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नोऽभीद्धो घर्मस्तदु षु प्र वोचत्.. (७)
मैं सरलता से दुही जाने योग्य इस गाय का आह्वान करता हूं. आई हुई इस गाय को
कल्याणमय हाथ वाला अध्वर्यु दुहे. सब के प्रेरक सविता देव हमें उत्तम दूध प्रदान करें. (७)
हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसा न्यागन्.
दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्धतां महते सौभगाय.. (८)
अपने बछड़े के लिए हुंकार करती हुई, धनों का पालन करने वाली तथा मन से अपने
बछड़े की कामना करती हुई गाय सभी प्रकार मेरे समीप आए. यह गाय अश्विनीकुमारों के
लिए दूध दे तथा हमारे सौभाग्य के हेतु अपने परिवार की वृद्धि करे. (८)
जुष्टो दमूना अतिथिर्दुरोण इमं नो यज्ञमुप याहि विद्वान्.
विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्य शत्रूयतामा भरा भोजनानि.. (९)
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हे अग्नि! सब के द्वारा सेवित एवं प्रसन्न मन वाला अतिथि सभी यजमानों के घरों में
आए तथा तुम्हारे विषय में मेरी भक्ति को जाने. हे अग्नि! तुम मुझ पर आक्रमण करने वाली
शत्रु सेनाओं को त्याग कर मेरे शत्रुओं का भोजन मेरे लिए लाओ. (९)
अग्ने शर्ध महते सौभाग्य तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु.
सं जास्पत्यं सुयममा कृणुष्वशत्रूयतामभि तिष्ठा महांसि.. (१०)
हे अग्नि! तुम हमें धनधान्य देने के लिए कोमल मन वाले बनो. तुम्हारे प्रकाशित होते
हुए तेज उत्तम हों. तुम इस प्रकार की कृपा करो, जिस से हम पतिपत्नी दोनों एकमात्र
तुम्हारी सेवा करें. जो अपनेआप को हमारा शत्रु मानते हैं, उन के तेजों पर तुम आक्रमण
करो. (१०)
सूयवसाद् भगवती हि भूया अधावयं भगवन्तः स्याम.
अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती.. (११)
हे धर्मदुघा धेनु! तू उत्तम घास खाती हुई हमारे लिए सौभाग्यशालिनी हो, इस से हम भी
धन वाले बनें. तू सदा घास का भक्षण कर तथा शोभन भाग्य वाली बन. हे गाय! तू सर्वदा
घास खा तथा सभी ओर घूमती हुई निर्मल जल पी. (११)
सूक्त-७८ देवता—मंत्र में बताए गए
अपचितां लोहिनीनां कृष्णा मातेति शुश्रुम.
मुनेर्देवस्य मूलेन सर्वा विध्यामि ता अहम्.. (१)
हम ने ऐसा सुना है कि लाल रंग की गंडमालाओं को उत्पन्न करने वाली कृष्णा नाम की
राक्षसी है. इस प्रकार की बढ़ी हुई सभी गंडमालाओं को मैं द्योतमान अथर्वा ऋषि के द्वारा
बताए हुए बाण से विदीर्ण करता हूं. (१)
विध्याम्यासां प्रथमां विध्याम्युत मध्यमाम्.
इदं जघन्या मासाम छिन्द्वि स्तुकामिव.. (२)
दोष की दृष्टि से गंडमालाएं तीन प्रकार की हैं. उन्हीं का यहां वर्णन है. मैं इन पकी हुई
गंडमालाओं में से मुख्य गंडमाला को जानता हूं, जिस की चिकित्सा करना कठिन है. मैं बाण
से उसे फाड़ता हूं. दूसरे प्रकार की सुसाध्य अर्थात् सरलता से चिकित्सा के योग्य गंडमाला
मध्यमा है. मैं उसे भी फोड़ता हूं. इस समय मैं इन गंडमालाओं के मध्य उस को ऊन के धागे
के समान तोड़ता हूं, जिस की चिकित्सा थोड़े प्रयत्न से हो सकती है. (२)
त्राष्ट्रेणाहं वचसा वि त ईर्ष्याममीमदम्.
अथो यो मन्युष्टे पते तमु ते शमयामसि.. (३)
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हे ईर्ष्यायुक्त पुरुष! स्त्री के विषय में तेरा जो क्रोध है, उसे मैं त्वष्टा संबंधी मंत्र से दूर
करता हूं. हे इस के पति! तेरा जो क्रोध है उसे भी मैं शांत करता हूं. (३)
व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह.
तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वै.. (४)
हे व्रत के पालन कर्ता अग्नि! दर्श, पौर्णमास आदि यज्ञकर्मों द्वारा सम्मानित तुम सभी
दिनों में प्रसन्न मन वाले हो कर हमारे घर में दीप्त बनो. हे जातवेद अग्नि! भलीभांति दीप्त
तुम्हारे चारों और हम पुत्र, पौत्र आदि के साथ बैठें. (४)
सूक्त-७९ देवता—गौ
प्रजावतीः सूयवसे रुशन्तीः शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः.
मा व स्तेन ईशत माघशंसः परि वो रुद्रस्य हेतिर्वृणक्तु.. (१)
हे गायो! तुम संतान से युक्त, शोभन घास वाले प्रदेश में घास चरती हो तथा सुख से
जल पीने योग्य तालाब आदि में जल पीती हो. तुम्हें कोई चोर न चुरा सके. बाघ आदि दुष्ट
पशु भी तुम्हें न खा सकें. ज्वर के देव रुद्र के आयुध तुम्हें त्याग दें. (१)
पदज्ञा स्थ रमतयः संहिता विश्वनाम्नीः.
उप मा देवीर्देवेभिरेत.
इमं गोष्ठमिदं सदो घृतेनास्मान्त्समुक्षत.. (२)
हे गायो! तुम अपनी सहचरी गायों के खुरों के चिह्नों को जानो. बछड़ों एवं दूसरी गायों
के साथ मिल कर तुम अनेक नामों वाली बनो. हे दीप्तिशालिनी धेनुओ! तुम देवों के सहित
मुझ पुष्टि के इच्छुक के समीप आओ तथा यहां आ कर मेरी गोशाला, घर एवं मुझ गृहस्वामी
को घी और दूध से सींचो. (२)
सूक्त-८० देवता—अपचित ओषधि आदि
आ सुस्रसः सुस्रसो असतीभ्यो असत्तराः.
सेहोररसतरा लवणाद् विक्लेदीयसीः.. (१)
अत्यधिक पीब टपकाने वाली और बाधा पहुंचाने वाले रोग के लक्षणों से भी अधिक
कष्ट पहुंचाने वाली गंडमालाएं सभी ओर से बहने वाली बनें. तात्पर्य यह है कि मंत्र तथा
ओषधि के प्रयोग से गंडमालाएं समाप्त हो जाएं. गंडमालाएं रुई से भी अधिक नीरस तथा
नमक से भी अधिक भीगने वाली बनें. (१)
या ग्रैव्या अपचितो ऽ थो या उपपक्ष्याः.
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विजाम्नि या अपचितः स्वयंस्स्रः.. (२)
जो गंडमालाएं गले में होती हैं, बगल में होती हैं और गोपनीय स्थानों में होती हैं, वे सब
बिना पकी हुई गंडमालाएं पक कर फूट जाएं. (२)
यः कीकसाः प्रशृणाति तलीद्यमवतिष्ठति.
निर्हास्तं सर्वं जाया्न्यं यः कश्च ककुदि श्रितः.. (३)
जो कष्टसाध्य राजयक्ष्मा रोग हड्डियों में व्याप्त होता है, जो अस्थियों के समीप वाले
मांस को सुखाता है, जो गरदन के ऊपर वाले भाग को पतला कर देता है तथा जो पत्नी के
निरंतर संभोग से उत्पन्न होता है, इन सभी प्रकार के क्षय रोगों को यह जड़ी नष्ट करे. (३)
पक्षी जाया्न्यः पतति स आविशति पूरुषम्.
तदक्षितस्य भेषजमुभयोः सुक्षतस्य च.. (४)
क्षय रोग पक्षी बन कर गिरता है तथा पुरुष में प्रवेश करता है. हम शरीर की सभी
धातुओं का शोषण करने वाले तथा शोषण न करने वाले दोनों प्रकार के रोगों को मंत्र और
ओषधि से दूर करते हैं. (४)
सूक्त-८१ देवता—इंद्र
विद्म वै ते जाया्न्य जानं यतो जाया्न्य जायसे.
कथं ह तत्र त्वं हनो यस्य कृण्मो हविर्गृहे.. (१)
हे क्षय रोग! हम तेरी उत्पत्ति के उस स्थान को जानते हैं, जहां से तू जन्म लेता है. तेरी
उत्पत्ति के स्थान को जानते हुए हम यजमान के घर में इंद्र आदि देवों के लिए तुझे देते हैं. (१)
धृषत् पिब कलशे सोममिन्द्र वृत्रहा शूर समरे वसूनाम्.
माध्यन्दिने सवन आ वृषस्व रयिष्ठानो रयिमस्मासु धेहि.. (२)
हे शत्रुओं को दलित करने वाले इंद्र! द्रोण कलश में स्थित सोमरस का पान करो. हे शूर
एवं वृत्र का हनन करने वाले इंद्र! तुम धन संबंधी युद्धों के निमित्त अर्थात् हमें धन प्राप्त
कराने के लिए सोमपान करो. तुम हमारे माध्यंदिन यज्ञ में भरपेट सोमरस पियो. तुम धन के
अधिष्ठान हो, इसीलिए हमें धन प्रदान करो. (२)
सूक्त-८२ देवता—मरुत्
सांतपना इदं हविर्मरुतस्तज्जुजुष्टन. अस्माकोती रिशादसः.. (१)
हे संतपन अर्थात् सूर्य से संबंधित अथवा संताप के समय अर्थात् दोपहर में यज्ञ करने
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