अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त-७१ देवता—सरस्वती
शिवाः न शंतमा भव सुमृडीका सरस्वति. मा ते युयोम संदृशः.. (१)
हे सरस्वती! तुम हमारे निमित्त सभी सुख देने वाली, रोगनिवारण में अत्यधिक समर्थ
एवं शोभन सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारे यथार्थ रूप के ज्ञान से अलग न हों. (१)
सूक्त-७२ देवता—सुख
शं नो वातो वातु शं नस्तपतु सूर्यः.
अहानि शं भवन्तु नः शं रात्री प्रति धीयतां शमुषा नो व्युच्छतु.. (१)
बाहर चलती हुई वायु हमारे लिए सुख देती हुई बहे. सब के प्रेरक सूर्य हमारे लिए सुख
देते हुए तपें. दिन हमारे लिए सुख देने वाले हों तथा रात भी हमें सुख प्रदान करे. उषाकाल
इस प्रकार विकसित हों, जिस से हमें सुख मिल सके. (१)
सूक्त-७३ देवता—श्येन आदि मंत्र में उक्त
यत् किं चासौ मनसा यच्च वाचा यज्ञैर्जुहोति हविषा यजुषा.
तन्मृत्युना निर्ऋतिः संविदाना पुरा सत्यादाहुतिं हन्त्वस्य.. (१)
दूर स्थित मेरा शत्रु मेरी हत्या करने की इच्छा से जो कर्म करने का विचार करता है तथा
वचन से जो कर्म करने की बात कहता है, अभिचार कर्मों अर्थात् जादूटोने के द्वारा उस के
लिए उचित द्रव्य के द्वारा तथा मंत्र के द्वारा जो होम करता है, उस कर्म को सफल होने से
पहले ही पाप देवता निर्ऋति मृत्यु के साथ मिल कर नष्ट करें. (१)
यातुधाना निर्ऋतिरादु रक्षस्ते अस्य घ्नन्त्वनृतेन सत्यम्.
इन्द्रेषिता देवा आज्यमस्य मथ्नन्तु मा तत् सं पादि यदसौ जुहोति.. (२)
दूसरों को पीड़ा देने वाली पाप की देवी निर्ऋति एवं राक्षस मेरे इस शत्रु के यथार्थ कर्म
फल को असत्य फल के द्वारा समाप्त करें. तात्पर्य यह है कि मेरे शत्रु के द्वारा किया हुआ
अभिचार कर्म फल देने वाला न हो. उस का फल विपरीत हो. इंद्र के द्वारा प्रेरित देव इस शत्रु
का होम कर्म नष्ट करें. यह शत्रु हमारे वध के लिए जो कर्म करता है, वह संपन्न एवं
फलदायक न हो. (२)
अजिराधिराजौ श्येनौ संपातिनाविव.
आज्यं पृतन्यतो हतां यो नः कश्चाभ्यघायति.. (३)
अजिर और अधिराज नामक मृत्यु दूत मुझ से संग्राम करने के इच्छुक पुरुष के घृत से
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