अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे धन देने वाले इंद्र! तुम्हारे जो मार्ग द्युलोक से नीचे वर्तमान हैं, उन विश्व प्रेरक मार्गों के
द्वारा हमें सुख में स्थापित करो. अर्थात् हमें सुख प्रदान करो. (१)
सूक्त-५७ देवता—इंद्र
ऋचं साम यदप्राक्षं हविरोज़ो यजुर्बलम्.
एष मा तस्मान्मा हिंसीद् वेदः पृष्टः शचीपते.. (१)
हम ऋग्वेद और सामवेद को हवि के द्वारा पूजते हैं. यजमान ऋग्वेद और सामवेद के
द्वारा यज्ञ कर्म करते हैं. ये दोनों वेद सदस नामक मंडप में शोभा देते हैं तथा यज्ञ को देवों तक
पहुंचाते हैं. (१)
ये ते पन्थानो ऽ व दिवो येभिर्विश्वम्मैरयः. तेभिः सुम्नया धेहि नो वसो.. (२)
मैं ने ऋग्वेद से हवि, सामवेद से ओज और यजुर्वेद से बल के विषय में पूछा था. अर्थात्
ऋग्वेद आदि में हवि आदि का अध्ययन किया था. हे शची के पति और व्याकरण के नियम
बनाने वाले इंद्र! इस प्रकार सुविचारित ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद मुझ अध्यापक के
अध्ययनअध्यापन में बाधा न डाल कर मनचाहा फल दें. (२)
सूक्त-५८ देवता—बिच्छू
तिरश्चिराजेरसितात् पृदाकोः परि संभृतम्.
तत् कङ्कपर्वणो विषमियं वीरुदनीनशत्.. (१)
तिरश्चिराजी अर्थात् तिरछी रेखाओं वाले काले और पृदाकू अर्थात् अपने द्वारा काटे हुए
प्राणियों को रुलाने वाले सर्पों के विष को तथा कंकपर्व नामक काटने वाले विषैले जंतु के
विष को यह मधु नाम की जड़ीबूटी नष्ट करे. (१)
इयं वीरुन्मधुजाता मधुश्चुन्मधुला मधूः.
सा विह्रुतस्य भेषज्यथो मशकजम्भनी.. (२)
यह प्रयोग की जाती हुई ओषधि मधु अर्थात् शहद से निर्मित है, इसलिए इस से शहद
टपकता है. मधु युक्त तथा मधूक नाम वाली यह जड़ीबूटी कुटिलता करने वाले विष का नाश
करने वाली तथा मच्छरों को समाप्त करने वाली है. (२)
यतो दष्टं यतो धीतं ततस्ते निर्ह्वयामसि.
अर्भस्य तृप्रदंशिनो मशकस्यारसं विषम्.. (३)
विषैले जंतु द्वारा काटे गए पुरुष से कहा जा रहा है—हे सर्प द्वारा काटे गए पुरुष!
तुम्हारे जिस अंग में विषैले सर्प ने काटा है अथवा तुम्हारे जिस अंग को सर्प आदि ने पिया है,
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