अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूनृतावन्तः सुभगा इरावन्तो हसामुदाः.
अतृष्या अक्षुध्या स्त गृहा मास्मद् बिभीतन.. (६)
हे घरो! तुम में प्यारी और सच्ची बातें कही जाएं, तुम शोभन भाग्य वाले बनो. सदा तुम
में अन्न भरा रहे. तुम लोगों की हंसी से मुखरित रहो. हम जब बाहर से आएं तो तुम हमें
पराया समझ कर भयभीत मत होना. (६)
इहैव स्त मानु गात विश्वा रूपाणि पुष्यत.
ऐष्यामि भद्रेणा सह भूयांसो भवता मया.. (७)
हे घरो! तुम इसी स्थान पर सुखी रहो. प्रवास करते हुए मुझ गृहस्वामी के पीछे मत
आओ. तुम पशु आदि सभी रूपों वाले का पोषण करो. मैं धन ले कर पुनः तुम्हारे समीप
आऊंगा. देशांतर से वापस आते मुझे पराया समझ कर तुम भयभीत मत होना. (७)
सूक्त-६३ देवता—अग्नि
यदग्ने तपसा तप उपतप्यामहे तपः.
प्रियाः श्रुतस्य भूयास्मायुष्मन्तः सुमेधसः.. (१)
हे अग्नि देव! तुम्हारे समीप समिदाधान आदि रूप कर्म के द्वारा जो तप किया जा
सकता है, वह तप हम करते हैं. उस तप के द्वारा हम अध्ययन किए हुए वेदमंत्रों के प्रिय,
अधिक आयु वाले और उत्तम धारण शक्ति से संपन्न बनें. (१)
अग्ने तपस्तप्यामह उप तप्यामहे तपः.
श्रुतानि शृण्वन्तो वयमायुष्मन्तः सुमेधसः.. (२)
हे अग्नि देव! तुम्हारे समीप ही हम शरीर को सुखाने वाला तप करें. हम इस का तप
किसी दूसरे स्थान पर न करें. हम अध्ययन किए गए वेदमंत्रों को सुनते हुए अधिक आयु वाले
और उत्तम बुद्धि वाले बनें. (२)
सूक्त-६४ देवता—जातवेद
अयमाग्नः सत्पतिर्वृद्धवृष्णो रथीव पत्तीनजयत् पुरोहितः.
नाभा पृथिव्यां निहितो दविद्युतदधस्पदं कृणुतां ये पृतन्यवः.. (१)
यह अग्नि देव देवों का पालन करने वाले तथा अधिक शक्ति संपन्न हैं. रथ में बैठा हुआ
व्यक्ति जिस प्रकार दूसरे की पत्नी अथवा प्रजा को अपने अधिकार में कर लेता है, उसी
प्रकार प्रजा को हम अपने वश में करें. यज्ञस्थल की नाभि अर्थात् उत्तरवेदी में स्थापित तथा
अत्यधिक दीप्त होते हुए अग्नि संग्राम में हमें जीतने वाले शत्रुओं को हमारे पैरों के नीचे
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