अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextउस अंग से मैं सर्प का विष निकालता हूं तथा मुख, पूंछ और चरण-इन तीन अंगों से काटने
वाले मच्छर के विष को भी मैं प्रभावहीन बनाता हूं. (३)
अयं यो वक्रो विपरुर्व्यङ्गो मुखानि वक्रा वृजिना कृणोषि.
तानि त्वं ब्रह्मणस्पत इषीकामिव सं नमः.. (४)
हे ब्रह्मणस्पति! सर्प आदि के द्वारा काटा हुआ जो यह पुरुष अंगों को सिकोड़ता है, इस
के अंगों के जोड़ ढीले पड़ गए हैं, इस के अवयव विवश हो गए हैं तथा इस के मुख आदि
अंग टेढ़े पड़ गए हैं. तुम इस के सभी अंगों को उसी प्रकार सीधा बनाओ, जिस प्रकार टेढ़ी
सींक को सरल बनाया जाता है. (४)
अरसस्य शर्कोटस्य नीचीनस्योपसर्पतः. विषं ह्य१ स्यादिष्यथो
एनमजीजभम्.. (५)
विष रहित, नीचे की ओर मुंह किए हुए एवं तेरे समीप आते हुए शर्कोटक नाम के सांप
के मैं ने टुकड़े कर दिए हैं अर्थात् मैं ने इस का विष समाप्त कर दिया है तथा इस सर्प को मैं
ने नष्ट कर दिया है. (५)
न ते बाह्वोर्बलमस्ति न शीर्षे नोत मध्यतः.
अथ किं पापया ऽ मुया पुच्छे बिभर्ष्यर्भकम्.. (६)
बिच्छू को संबोधन कर के कहा जा रहा है - हे बिच्छू! तेरे हाथों में दूसरों को पीड़ा
पहुंचाने वाला बल नहीं है. तेरे सिर में भी बल नहीं है. तेरे मध्य भाग अर्थात् कमर में भी बल
नहीं है. तू अपनी, परपीड़ाकारिणी बुद्धि के द्वारा थोड़ा विष अपनी पूंछ में क्यों धारण करता
है? (६)
अदन्ति त्वा पिपीलिका वि वृश्चन्ति मयूर्यः.
सर्वे भल ब्रवाथ शर्कोटमरसं विषम्.. (७)
हे सर्प! तुझे चीटियां खा लेती हैं और मोरनियां तेरे टुकड़े-टुकड़े कर देती हैं. हे सर्प का
विष दूर करने में समर्थ जड़ीबूटियो! तुम शर्कोटक सर्प के विष को सामर्थ्यहीन कर देती हो,
यह बात भलीभांति कही जाती है. (७)
य उभाभ्यां प्रहरसि पुच्छेन चास्ये न च.
आस्ये ३ न ते विषं किमु ते पुच्छधावसत्.. (८)
हे बिच्छू! तू पूंछ और मुख दोनों के द्वारा प्राणियों को बाधा पहुंचाता है तेरे मध्य भाग
और मुख में विष नहीं है. तेरे रोओं वाले भाग अर्थात् पूंछ में विष क्यों हो. (८)
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