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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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जो शत्रु हम निंदा न करने वालों की निंदा करता है और जो शत्रु हम निंदा करने वालों
की निंदा करता है, वह इस प्रकार नष्ट हो जाए जिस प्रकार बिजली से मारा हुआ वृक्ष जड़ से
सूख जाता है. (१)
सूक्त-६२ देवता—गुहा
ऊर्जं बिभ्रद् वसुवनिः सुमेधा अघोरेण चक्षुषा मित्रियेण.
गृहानैमि सुमना वन्दमानो रमध्वं मा बिभीत मत्.. (१)
हे घरो! अन्न धारण करता हुआ और धन का स्वामी मैं शोभन बुद्धि वाला हो कर तुम्हें
अनुकूल और मैत्री पूर्ण दृष्टि से देखूं. मैं तुम्हारी स्तुति करता हुआ तुम्हारे पास आऊं. मेरे
अधिकार में तुम सुखी रहो, इसलिए जब मैं दूसरे स्थान से तुम्हारे पास आऊं तो तुम मुझे
पराया समझ कर भय मत करो. (१)
इमे गृहा मयोभुव ऊर्जस्वन्तः पयस्वन्तः.
पूर्णा वामेन तिष्ठन्तस्ते नो जानन्त्वायतः.. (२)
यह घर सुख देने वाले, अन्न एवं रस से युक्त, दूध आदि एवं धन से समृद्ध रहे हैं. सामने
दिखाई देते हुए ये घर प्रवास से आते हुए हमें स्वामी के रूप में जानें. (२)
येषामध्येति प्रवसन् येषु सौमनसो बहुः.
गृहानुप ह्वयामहे ते नो जानन्त्वायतः.. (३)
प्रवास करता हुआ पुरुष जिन घरों का स्मरण करता है तथा जिन घरों में सौमनस्य
वाला पदार्थ अधिक मात्रा में है, मैं ऐसे घर पाने के लिए प्रार्थना करता हूं. हमारे ये घर प्रवास
से आते हुए हमें स्वामी के रूप में जानें. (३)
उपहूता भूरिधनाः सखायः स्वादुसंमुदः.
अक्षुध्या अतृष्या स्त गृहा मास्मद् बिभीतन.. (४)
हे घरो! अनुमति हेतु प्रार्थना करने पर तुम अधिक धन युक्त, मैत्रीपूर्ण तथा स्वादिष्ट और
मधुर पदार्थों से युक्त बनो. तुम सदा भूख और प्यास से रहित अर्थात सभी प्रकार तृप्त जनों
वाले बनो. हे घरो! जब हम बाहर से आएं, तब तुम हमें पराया समझ कर भयभीत मत बनो.
(४)
उपहूता इह गाव उपहूता अजावयः.
अथो अन्नस्य कीलाल उपहूतो गृहेषु नः.. (५)
हमारे घरों में गाएं, बकरियां और भेड़ें बुलाई जाएं. इस के अतिरिक्त हमारे घरों में अन्न
का सारभूत अंश भी चाहा जाए. (५)
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