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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 396 of 1063

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Page 396

हुए आदित्य के मुख से चाटते हैं. (३)
यदुस्रियास्वाहुतं घृतं पयो ऽ यं स वामश्विना भाग आ गतम्.
माध्वी धर्तारा विदथस्य सत्पती तप्तं घर्मं पिबतं रोचने दिवः.. (४)
गोशाला में स्थित गायों में वर्तमान जो घृत का उत्पादक दूध है, वह यज्ञ के पात्र में डाल
दिया गया है. वह तुम दोनों का भाग है, इसीलिए आओ. हे मधु विद्या के ज्ञाता
अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ के धारण कर्ता हो. हे देवों का पालन करने वाले अश्विनीकुमारो!
द्युलोक के प्रकाशक अग्नि में तपाए हुए घी का पान करो. (४)
तप्तो वां घर्मो नक्षतु स्वहोता प्र वामध्वर्युश्चरतु पयस्वान्.
मधोर्दुग्धस्याश्विना तनाया वीतं पातं पयस उस्रियायाः.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों होता के द्वारा भलीभांति स्तुति किए गए हो. तुम ठीक से
तपाए गए एवं विशाल पात्र में स्थित आज्य अर्थात् घी को प्राप्त करो. तुम्हारे लिए अध्वर्यु
नामक ऋत्विज् यज्ञ करे. इस के पश्चात दूध, घी आदि के द्वारा यज्ञ का विस्तार करने वाली
गाय के मधुर रस से युक्त दूध को तुम दोनों पियो. (५)
उप द्रव पयसा गोधुगोषमा घर्मे सिञ्च पय उस्रियायाः.
वि नाकमख्यत् सविता वरेण्यो ऽ नुप्रयाणमुषसो वि राजति.. (६)
हे गाय को दुहने वाले अध्वर्यु! तुम तपाए हुए दूध के साथ मेरे समीप आओ तथा गाय
के दूध को तपे हुए घी में डालो, जिस से सब के प्रेरक सविता देव स्वर्ग को प्रकाशित करें. वे
आदि उषा के गमन के पीछे विराजते हैं. (६)
उप ह्वये सुदुघां धेनुमेतां सुहस्तो गोधुगुत दोहदेनाम्
श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नोऽभीद्धो घर्मस्तदु षु प्र वोचत्.. (७)
मैं सरलता से दुही जाने योग्य इस गाय का आह्वान करता हूं. आई हुई इस गाय को
कल्याणमय हाथ वाला अध्वर्यु दुहे. सब के प्रेरक सविता देव हमें उत्तम दूध प्रदान करें. (७)
हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसा न्यागन्.
दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्धतां महते सौभगाय.. (८)
अपने बछड़े के लिए हुंकार करती हुई, धनों का पालन करने वाली तथा मन से अपने
बछड़े की कामना करती हुई गाय सभी प्रकार मेरे समीप आए. यह गाय अश्विनीकुमारों के
लिए दूध दे तथा हमारे सौभाग्य के हेतु अपने परिवार की वृद्धि करे. (८)
जुष्टो दमूना अतिथिर्दुरोण इमं नो यज्ञमुप याहि विद्वान्.
विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्य शत्रूयतामा भरा भोजनानि.. (९)
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