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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 383 of 1063

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Page 383

विरोधी जुआरी को संबोधन कर के कहा जा रहा है—हे जुआरी! तूने अपने पैरों में
अंकों को ठीक से लिख लिया है. फिर भी मैं तुझे जीतूंगा. मैं तुझे ऐसे स्थान में जीत लूंगा,
जहां अंक रोके जाते हैं. भेड़िया जिस प्रकार भेड़ को मसल डालता है, उसी प्रकार मैं तेरे
दांव को नष्ट कर दूंगा. (५)
उत प्रहामतिदीवा जयति कृतमिव श्वघ्नी वि चिनोति काले.
यो देवकामो न धनं रुणद्धि समित् तं रायः सृजति स्वधाभिः.. (६)
अधिक जुआ खेलता हुआ पुरुष अपने विरोधी जुआरी को जीत लेता है, क्योंकि दूसरे
का धन हरण करने वाला जुआरी पासे फेंकने से पहले ही उस के अंकों का निश्चय कर लेता
है. देवों की कामना करता हुआ जो जुआरी जीत में प्राप्त धन को देव संबंधी कार्यों में लगाता
है, उसे इंद्र धनों और अन्नों से युक्त करते हैं. (६)
गोभिष्टरेमाममतिं दुरेवां यवेन वा क्षुधं पुरुहूत विश्वे.
वयं राजसु प्रथमा धनान्यरिष्टासो वृजनीभिर्जयेम.. (७)
हे इंद्र! दरिद्रता के कारण आई हुई दुर्बुद्धि को मैं पशुओं के द्वारा पार करूं. हे बहुतों
द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम सभी जौ आदि अन्नों की सहायता से भूख का निवारण करें. विरोधी
जुआरियों से पराजित न होते हुए हम मुख्य धनों को जुआघर से जीत कर ले जाएं. (७)
कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः.
गोजिद् भूयासमश्वजिद् धनंजयो हिरण्यजित्.. (८)
मेरे दाहिने हाथ में लाभ का कारण कृत अर्थात् जुए की महान विजय तथा बाएं हाथ में
ऐसी विजय है, जो जुए का साध्य है. इस प्रकार मैं दूसरों की गायों को जीतने वाला, घोड़ों
को जीतने वाला, धन को जीतने वाला और स्वर्ण जीतने वाला बनूं. (८)
अक्षाः फलवतीं ध्रुवं दत्त गां क्षीरिणीमिव.
सं मा कृतस्य धारया धनुः स्नाव्नेव नह्यत.. (९)
विजय के लिए पासों से प्रार्थना की जा रही है—हे पासो! तुम इस जुए के खेल को मेरे
लिए इस प्रकार फल देने वाला बनाओ, जिस प्रकार दूध देने वाली गाय होती है. धनुष जिस
प्रकार तांत से बनी डोरी के द्वारा बाण को दूर फेंकता है, उसी प्रकार पासे चार संख्या वाले
दावों के लिए मुझे विजय से जोड़ें. (९)
सूक्त-५३ देवता—इंद्र, बृहस्पति
बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः.
इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरीयः कृणोतु.. (१)
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