अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे.. (३)
हम ने काले दांतों वाले, बुरे नाखूनों वाले एवं नपुंसक पुरुष के साथ भोजन किया है. हे
अपामार्ग अर्थात् चिरचिटा के झाड़! तेरे द्वारा उस से होने वाले पाप का हम निवारण करते
हैं. (३)
सूक्त-६८ देवता—ब्रह्मा
यद्यन्तरिक्षे यदि वात आस यदि वृक्षेषु यदि वोलपेषु.
यदश्रवन् पशव उद्यमानं तद् ब्राह्मणं पुनरस्मानुपैतु.. (१)
आकाश के मेघाच्छन्न होने पर, आंधी चलने पर, वृक्षों की छाया में, फसलों में, ग्रामीण
एवं जंगली पशुओं के समीप मैं ने जो वेदाध्ययन किया है अथवा वेदपाठ सुना है, वह भी मेरे
लिए फलदायक हो. (१)
सूक्त-६९ देवता—आत्मा
पुनर्मैत्विन्द्रियं पुनरात्मा द्रविणं ब्राह्मणं च.
पुनरग्नयो धिष्ण्या यथास्थाम कल्पयन्तामिहैव.. (१)
इंद्र के द्वारा दिया हुआ वीर्य अथवा दी हुई चक्षु आदि इंद्रियों की शक्ति मेरे पास पुनः
आए. आत्मा, धन एवं वेद का अध्ययन मुझे पुनः प्राप्त हो. यज्ञ आदि कर्मों में स्थापित
अग्नियां इसी स्थान में पुनः प्रवृद्ध हों. (१)
सूक्त-७० देवता—सरस्वती
सरस्वति व्रतेषु ते दिव्येषु देवि धामसु.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि ररास्व नः.. (१)
हे सरस्वती देवी! तुम अपने से संबंधित व्रतों में एवं गार्हपत्य यज्ञ आदि रूप दिव्य
स्थानों में सामने आ कर हवि स्वीकार करो तथा हमें पुत्र आदि रूप प्रजा प्रदान करो. (१)
इदं ते हव्यं घृतवत् सरस्वतीदं पितॄणां हविरास्यं १ यत्.
इमानि त उदिता शांतमानि तेभिर्वयं मधुमन्तः स्याम.. (२)
हे सरस्वती! तुम्हारे लिए हवन किया जाता हुआ घृतयुक्त यह हवि तथा पितरों के
निमित्त दिया जाता हुआ यह हवि तथा हमारे लिए सुख देने वाले जो हवि हैं, ये तुम्हारे निमित्त
समर्पित किए गए हैं. तुम्हारे निमित्त दिए गए हवियों के द्वारा हम मधुर रस से युक्त अन्न वाले
हों. (२)
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