अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.
The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.
The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.
सूक्त-२६ देवता—अग्नि
ये ३ स्यां स्थ प्राच्यां दिशि हेतयो नाम देवास्तेषां वो अग्निरिषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (१)
हे दान आदि गुण युक्त गंधर्वो! तुम हमारे निवास स्थान से पूर्व दिशा में हमारे विरोधियों
को मारने वाले बनो. तुम्हारे अग्नि तुल्य बाण उन पूर्व दिशा के निवासियों से हमारी रक्षा करने
में समर्थ हों. वे हमें सुखी करें. तुम्हारे बाण सर्प, बिच्छू आदि शत्रुओं को हम से दूर रखें. तुम
हमें अपना कहो. हम तुम्हें नमस्कार करते और आहुति देते हैं. (१)
ये ३ स्यां स्थ दक्षिणायां दिश्यविष्ववो नाम देवास्तेषां वः काम इषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (२)
हे दान आदि गुणों से युक्त गंधर्वो! तुम हमारे निवास स्थान से दक्षिण दिशा में हमारे
विरोधियों से हमारे रक्षक बनो. हमारी अभिलाषा ही तुम्हारा बाण है, वह हमारी रक्षा करे.
तुम हमें अपना कहो. हम तुम्हें नमस्कार करें और आहुति देते रहें. (२)
ये ३ स्यां स्थ प्रतीच्यां दिशि वैराजा नाम देवास्तेषां व आप इषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (३)
हे देवो! तुम पश्चिम दिशा में हमें अन्न देने वाले बनो. वर्षा के जल तुम्हारे बाण हैं. वे
हमारी रक्षा करें. तुम हमें अपना बनाओ. तुम्हें हम नमस्कार करते हैं और आहुति देते हैं. (३)
ये ३ स्यां स्थोदीच्यां दिशि प्रविध्यन्तो नाम देवास्तेषां वो वात इषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (४)
हे दान आदि गुणों से युक्त गंधर्वो! तुम उत्तर दिशा में हमारी हिंसा करने वालों को मारने
वाले बनो. वायु ही तुम्हारा बाण है, वह हमारी रक्षा करे. तुम हमें अपना कहो. हम तुम्हें
नमस्कार करते हैं और आहुति देते हैं. (४)
ये ३ स्यां स्थ ध्रुवायां दिशि निलिम्पा नाम देवास्तेषां व ओषधीरिषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (५)
हे दान आदि गुणों से युक्त गंधर्वो! तुम ध्रुव दिशा में अर्थात् पृथ्वी पर हमारी रक्षा करने
वाले बनो. जौ, गेहूं, पेड़, पौधे आदि तुम्हारे बाण हैं. वे हमारी रक्षा करें. तुम हमें अपना कहो.
हम तुम्हें नमस्कार करते हैं और आहुति देते हैं. (५)
ये ३ स्यां स्थोध्र्वायां दिश्यवस्वन्तो नाम देवास्तेषां वो बृहस्पतिरिषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (६)
हे दान आदि गुणों से युक्त गंधर्वो! इस ऊपर की दिशा में तुम हमारे रक्षक बनो.
बृहस्पति तुम्हारे बाण हैं. वे हमारी रक्षा करें. हम तुम्हें नमस्कार करते हैं और आहुति देते हैं.
(६)
सूक्त-२७ देवता—प्राची
प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (१)
पूर्व दिशा हम पर कृपा करे. अग्नि इस दिशा के अधिपति हैं. काले रंग के सांप उस में
रक्षा करने के लिए स्थित हैं. अदिति के पुत्र धाता, अर्यमा आदि इस दिशा के आयुध हैं. इस
के अधिपति अग्नि, रक्षक काले सांप, धाता अर्यमा आदि आयुधों को मेरा नमस्कार प्रसन्न
करने वाला हो. जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाता है अथवा हम जिस से द्वेष रखते हैं. हे अग्नि
आदि देवो! उसे हम तुम्हारे भोजन के लिए तुम्हारी दाढ़ के नीचे रखते हैं. (१)
दक्षिणा दिगिन्द्रो ऽ धिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (२)
दक्षिण दिशा हम पर कृपा करे. इंद्र इस के अधिपति हैं. टेढ़ेमेढ़े चलने वाले सर्प इस
दिशा के रक्षक हैं. पितर इस दिशा के दुष्टों का निग्रह करने वाले आयुध हैं. इस के अधिपति
इंद्र को, रक्षक टेढ़ेमेढ़े चलने वाले सर्प को और आयुध रूप पितरों को मेरा नमस्कार प्रसन्न
करने वाला हो. जो शत्रु मुझे बाधा पहुंचाता है अथवा मैं जिन से द्वेष रखता हूं, हे इंद्र आदि
देवो! मैं उसे तुम्हारे भक्षण के लिए तुम्हारी दाढ़ में रखता हूं. (२)
प्रतीची दिग् वरुणो ऽ धिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (३)
पश्चिम दिशा हम पर कृपा करे. वरुण इस के अधिपति हैं. कुत्सित शब्द करने वाला
पृदाकू नाम का सर्प इस का रक्षक है और जौ, गेहूं आदि इस दिशा के दुष्टों को वश में करने
वाले बाण हैं. इस के अधिपति वरुण को, रक्षक कुत्सित शब्द करने वाले पृदाकू नाम वाले
सर्प को और जौ तथा गेहूं आदि बाणों को हमारा नमस्कार प्रसन्न करने वाले हो. जो शत्रु हमें
बाधा पहुंचाता है अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं, हे वरुण आदि देवो! हम उसे तुम्हारे
भक्षण के लिए तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (३)
उदीची दिक् सोमोऽधिपतिः स्वजो रक्षिताशनिरिषवः.
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तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (४)
उत्तर दिशा हम पर अनुग्रह करे. सोम इस दिशा के अधिपति अर्थात् स्वामी हैं. स्वयं
उत्पन्न होने वाला सर्प इस का रक्षक है और वज्र इस के दुष्टों को वश में करने वाला बाण है.
इस के अधिपति सोम को, स्वयं उत्पन्न होने वाले रक्षक सर्प को और वज्र रूप बाण को
हमारा नमस्कार प्रसन्न करने वाला हो. जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाते हैं अथवा हम जिन से द्वेष
करते हैं. हे सोम आदि देवो! उन्हें हम तुम्हारे भक्षण के लिए तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (४)
ध्रुवा दिग् विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (५)
नीचे की ओर वाली अर्थात् स्थिर दिशा हम पर अनुग्रह करे. विष्णु इस के अधिपति हैं,
काली गरदन वाला सांप इस का रक्षक है और वृक्ष इस के दुष्ट नाशकारी बाण हैं. इस के
अधिपति विष्णु को, रक्षक काली गरदन वाले सर्प को और आयुध वृक्षों को हमारा नमस्कार
प्रसन्न करने वाला हो. हे विष्णु आदि देवो! जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाते हैं अथवा हम जिन से
द्वेष रखते हैं, उन्हें हम तुम्हारे भक्षण के हेतु तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (५)
ऊर्ध्वा दिग् बृहस्पतिरधिपतिः श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (६)
ऊपर वर्तमान दिशा हम पर कृपा करे. बृहस्पति इस के स्वामी हैं, श्वेतवर्ण का सर्प इस
का रक्षक है और वर्षा का जल इस का दुष्ट निवारक आयुध है. हम इस के स्वामी बृहस्पति
को रक्षक श्वेत वर्ण के सर्प को तथा दुष्ट निवारक आयुध वर्षा के जल को नमस्कार करते हैं.
हे बृहस्पति आदि देवो! जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाते हैं अथवा हम जिन से द्वेष रखते हैं, उन्हें
हम तुम्हारे भक्षण के हेतु तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (६)
सूक्त-२८ देवता—अश्विनीकुमार
एकैकयैषा सृष्ट्या सं बभूव यत्र गा असृजन्त भूतकृतो विश्वरूपाः.
यत्र विजायते यमिन्यपर्तुः सा पशून् क्षिणाति रिफती रुशती.. (१)
विधाता के द्वारा बनाई गई यह सृष्टि क्रमशः एकएक कर के उत्पन्न हुई. यहां पृथिवी
आदि तत्त्वों के निर्माता ऋषियों ने अनेक रंगों वाली गायों, मानुषियों और घोड़ियों को उत्पन्न
किया. उत्पत्ति वाली इस सृष्टि में यदि कोई गाय आदि निकृष्ट रज और वीर्य से उत्पन्न जुड़वां
संतान को जन्म देती है, वह यजमान के गाय आदि पशुओं का भक्षण करती हुई और चोर,
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बाघ आदि के द्वारा हिंसा करती हुई विनाश करती है. (१)
एषा पशून्त्सं क्षिणाति क्रव्याद् भूत्वा व्यद्वरी.
उतैनां ब्रह्मणे दद्यात् तथा स्योना शिवा स्यात्.. (२)
दो बच्चों को एक साथ जन्म देने वाली यह गाय मांस खाने वाली एवं दुःख देने वाली के
समान यजमान के अन्य पशुओं का विनाश करती है. यह टोनेटोटके के समान संताप देने
वाली है. इसे ब्राह्मण को दान कर देना चाहिए. ऐसा करने से यह अपनी संतान के द्वारा
यजमान के लिए कल्याणकारिणी बन जाती है. (२)
शिवा भव पुरुषेभ्यो गोभ्यो अश्वेभ्यः शिवा.
शिवास्मै सर्वस्मै क्षेत्राय शिवा न इहैधि.. (३)
हे जुड़वां बच्चों को जन्म देने वाली गाय! तू मनुष्यों, गायों और घोड़ों के लिए
कल्याणकारिणी बन. तू इस देश में हमें सब प्रकार से सुखदायी हो. (३)
इह पुष्टिरिह रस इह सहस्रसातमा भव.
पशून् यमिनि पोषय.. (४)
मेरे यजमान के इस घर में गाय आदि धन पुष्ट हों तथा दूध, दही आदि रस समृद्ध हों. हे
जुड़वां बच्चों को जन्म देने वाली गाय! तू इस यजमान के पशुओं का पोषण कर और इसे
हजारों प्रकार के धन प्रदान कर. (४)
यत्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोगं तन्व १ः स्वायाः.
तं लोकं यमिन्यभिसंबभूव सा नो मा हिंसीत् पुरुषान् पशूंश्च.. (५)
जिस लोक में शोभन हृदय वाले तथा उत्तम कर्म करने वाले पुरुष प्रसन्न होते हैं तथा
ज्वर आदि रोगों का त्याग कर के उन के शरीर पुष्ट होते हैं, वहाँ यदि जुड़वां बच्चों को जन्म
देने वाली गाय सामने आ जाए तो वह हमारे मनुष्यों और पशुओं की हिंसा न करे. (५)
यत्रा सुहार्दां सुकृतामग्निहोत्रहुतां यत्र लोकः.
तं लोकं यमिन्यभिसंबभूव सा नो मा हिंसीत् पुरुषान् पशूंश्च.. (६)
जिस लोक में शोभन हृदय, शोभन ज्ञान और शोभन कर्म वाले अपने शरीर से ज्वर
आदि रोगों का त्याग कर के प्रसन्न होते हैं, वहां जुड़वां बच्चों को जन्म देने वाली गाय आ गई
है. वह हमारे पुरुषों और पशुओं की हिंसा न करे. (६)
सूक्त-२९ देवता—अवि, काम, भूमि
यद् राजानो विभजन्ति इष्टापूर्तस्य षोडशं यमस्यामी सभासदः.
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अविस्तस्मात् प्र मुञ्चति दत्तः शितिपात् स्वधा.. (१)
दक्षिण दिशा के आकाश में दिखाई देने वाले यमराज के सभासद दुष्टों को दंड दें और
धर्मात्माओं का पालन करने में युक्त हों. श्रुतियों में बताए गए यज्ञ आदि और स्मृतियों में
बताए गए वापी, कूप, सरोवर आदि कर्मों के जो सोलह पाप होते हैं, उन्हें यमराज के
सभासद पुण्य से पृथक् करते हैं. उस पाप से यज्ञ में बलि के रूप में दी गई यह सफेद पैरों
वाली भेड़ हमें मुक्त करे. यह भेड़ यमराज के सभासदों के लिए अग्नि हो. (१)
सर्वान् कामान् पूरयत्याभवन् प्रभवन् भवन्.
आकूतिप्रो ऽ विर्दत्तः शितिपात्नोप दस्यति.. (२)
चारों दिशाओं को व्याप्त करने वाला, फल देने में समर्थ एवं वृद्धि करने वाला यह यज्ञ
हमारी सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करता है. संकल्पों को पूर्ण करने वाली यह सफेद पैरों
वाली भेड़ इस यज्ञ में दी जा रही है. यह क्षीण न हो कर हमारी इच्छा के अनुसार बढ़ेगा ही.
(२)
यो ददाति शितिपादमविं लोकेन संमितम्.
स नाकमभ्यारोहति यत्र शुल्को न क्रियते अबलेन बलीयसे.. (३)
जो यजमान सफेद पैरों वाली एवं लोक विश्वास के अनुसार फल देने वाली भेड़ का दान
करता है, वह स्वर्ग को प्राप्त करता है. स्वर्गलोक में निर्बल व्यक्ति सबल का शासन मान कर
शुल्क नहीं देता. (३)
पञ्चापूपं शितिपादमविं लोकेन संमितम्.
प्रदातोप जीवति पितॄणां लोकेऽक्षितम्.. (४)
जिस भेड़ के चारों पैरों और नाभि पर पांच पूए रखे जाते हैं, उसे पंचापूप कहते हैं.
पंचापूप अर्थात् पांच पूओं वाली और सफेद पैरों वाली भेड़ का दाता पृथ्वी आदि लोकों के
पांच समान पितरों के लोक में समाप्त न होने वाला फल भोगता है. (४)
पञ्चापूपं शितिपादमविं लोकेन संमितम्.
प्रदातोप जीवति सूर्यामासयोरक्षितम्.. (५)
पंचापूप अर्थात् पांच पूओं वाली और सफेद पैरों वाली भेड़ को लोक विश्वास के
अनुसार दान करने वाला सूर्य और चंद्रमा के लोकों में समाप्त न होने वाला फल भोगता है.
(५)
इरेव नोप दस्यति समुद्र इव पयो महत्.
देवौ सवासिनाविव शितिपात्नोप दस्यति.. (६)
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यज्ञ में दी गई सफेद पैरों वाली भेड़ सागर के जल के समान कभी क्षीण नहीं होती और
इस का दूध बढ़ता ही जाता है. अश्विनीकुमारों के समान यह भेड़ कभी क्षीण नहीं होती. (६)
क इदं कस्मा अदात् कामः कामायादात्.
कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामः समुद्रमा विवेश.
कामेन त्वा प्रति गृह्णामि कामैतत् ते.. (७)
यह दक्षिणा रूपी धन प्रजापति ने प्रजापति को ही दिया था. दक्षिणा देने वाला
पारलौकिक फल का अभिलाषी है और लेने वाला लौकिक फल का इच्छुक है. इस प्रकार
दक्षिणा का दाता और लेने वाला दोनों ही इच्छा वाले हैं. इच्छा का रूप सागर के समान
असीमित है. इच्छा का अंत नहीं है. हे दक्षिणा द्रव्य! मैं इसी प्रकार की इच्छा से तुझे ग्रहण
करता हूं. हे अभिलाषा! स्वीकार किया हुआ यह धन तेरे लिए हो. (७)
भूमिष्ट्वा प्रति गृह्णात्वन्तरिक्षमिदं महत्.
माहं प्राणेन मात्मना मा प्रजया प्रतिगृह्य वि राधिषि.. (८)
हे दक्षिणा द्रव्य! तुझे यह धरती और विशाल आकाश ग्रहण करे. इसीलिए तुझे ग्रहण
कर के मैं प्राण से, आत्मा से और पुत्रपौत्र आदि संतान से हीन न बनूं. (८)
सूक्त-३० देवता—सौमनस्य
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः.
अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या.. (१)
हे विवाद करने वाले पुरुषो! मैं तुम्हारे लिए सौमनस्य कर्म करता हूं जो विद्वेष रहित एवं
परस्पर प्रेम कराने वाला है. जिस प्रकार गाय अपने बछड़े से प्रेम करती है. उसी प्रकार तुम
भी परस्पर प्रेम करो. (१)
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः.
जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शान्तिवाम्.. (२)
पुत्र पिता के अनुकूल कर्म करने वाला हो. माता पुत्र आदि के प्रति सौमनस्य वाली बने.
पत्नी पति से मधुर एवं सुखकर वचन कहे. (२)
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा.
सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया.. (३)
भाई अपने सगे भाई से उत्तराधिकार को ले कर तथा बहन अपनी सगी बहन से द्वेष न
करे. यह सब समान गति वाले एवं समान कर्मों वाले हो कर कल्याणकारी वचन कहें. (३)
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येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथः.
तत् कृण्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं पुरुषेभ्यः.. (४)
जिस मंत्र के बल से देवगण, भिन्नभिन्न विचारों वाले नहीं बनते और परस्पर द्वेष नहीं
करते, उसी मंत्र का प्रयोग मैं तुम्हारे घर में एकमत स्थापित करने के लिए करता हूं. (४)
ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ट संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः.
अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोमि.. (५)
हे मनुष्यो! तुम छोटेबड़े की भावना से एक दूसरे का अनुसरण करते हुए समान चित्त
वाले, समान सिद्धि वाले तथा समान कार्य करने वाले बनो. इस प्रकार आचरण करते हुए तुम
एक दूसरे से बिछुड़ो मत तथा एक दूसरे से प्रिय वचन बोलते हुए आओ. मैं भी तुम सब से
मिलकर तुम्हें कार्यों में प्रवृत्त होने वाला तथा समान विचारों वाला बनाता हूं. (५)
समानी प्रपा सह वो ऽ न्नभागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि.
सम्यञ्चो ऽ ग्निं सपर्यतारा नाभिमिवाभितः.. (६)
हे समानता के इच्छुक जनो! तुम परस्पर प्रेम के कारण एक स्थान पर रह कर समान
जल और अन्न का उपयोग करो. इस के लिए मैं तुम सब को प्रेम के एक बंधन में बांधता हूं.
जिस प्रकार पहिए के अनेक अरे एक नाभि को घेरे रहते हैं, उसी प्रकार तुम सब एक फल
की कामना करते हुए अग्नि की उपासना करो. (६)
सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोम्येकश्नुष्टीन्संवननेन सर्वान्.
देवा इवामृतं रक्षमाणाः सायंप्रातः सौमनसो वो अस्तु.. (७)
मैं तुम सब को एक कार्य करने में एक साथ संलग्न कर के समान विचारों वाला बनाता
हूं तथा समान अन्न का उपयोग करने वाला और सौमनस्य कर्म के द्वारा तुम्हें वश में करता हूं.
स्वर्गलोक में अमृत रक्षा करने वाले इंद्र आदि देवों का मन जिस प्रकार समान बना रहता है,
उसी प्रकार मैं तुम्हें सभी समयों में समान मन वाला बनाता हूं. (७)
सूक्त-३१ देवता—अग्नि आदि
वि देवा जरसावृतन् वि त्वमग्ने अरात्या.
व्य१हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम इस बालक को आयु की हानि करने वाली वृद्धावस्था से दूर
रखो. हे अग्नि! तुम इसे दान न देने के स्वभाव से और शत्रुओं से दूर रखो. मैं इसे रोग आदि
दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से संयुक्त
करता हूं. (१)
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व्यार्त्या पवमानो वि शक्रः पापकृत्यया.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (२)
वायु इस बालक को रोगजनित पीड़ा से अलग रखे तथा इंद्र पाप के कार्यों से बचाएं. मैं
इसे रोग आदि दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन
से युक्त करता हूं. (२)
वि ग्राम्याः पशव आरण्यैर्व्यापस्तृष्णयास्रन्.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (३)
जिस प्रकार गाय, भैंस आदि ग्रामीण पशु वन के पशुओं से तथा जल प्यासे व्यक्तियों से
दूर रहता है, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःख उत्पन्न करने वाले पापों से तथा
यक्ष्मा रोग से दूर कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (३)
वी ३ मे द्यावापृथिवी इतो वि पन्थानो दिशंदिशम्.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (४)
जिस प्रकार धरती और आकाश एक दूसरे से अलग रहते हैं तथा एक गांव से प्रत्येक
दिशाओं में जाने वाले मार्ग स्वाभाविक रूप से पृथक् होते हैं, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को
रोग आदि दुःखों के उत्पादक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक कर के चिर जीवन से युक्त
करता हूं. (४)
त्वष्टा दुहित्रे वहतुं युनक्तीतीदं विश्वं भुवनं वि याति.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (५)
त्वष्टा ने अपनी पुत्री के विवाह में जो दहेज दिया था, उसे स्थापित करने के निमित्त
धरती और आकाश जिस प्रकार पृथक् हुए थे, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि
दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा क्षय रोग से पृथक् कर के दीर्घ जीवन से संयुक्त करता
हूं. (५)
अग्निः प्राणान्त्सं दधाति चन्द्रः प्राणेन संहितः.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (६)
जिस प्रकार जठराग्नि चक्षु आदि इंद्रियों को अन्न से बना हुआ रस पहुंचा कर
अपनाअपना कार्य करने में समर्थ बनाती है तथा चंद्रमा प्राण वायु से युक्त हो कर अमृत रस
से सभी आत्माओं का पोषण करता है, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों के
उत्पादक पापों से तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् करके दीर्घ जीवन प्रदान करता हूं. (६)
प्राणेन विश्वतोवीर्यं देवाः सूर्यं समैरयन्.
व्य१हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (७)
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देवों ने सारे विश्व के प्रेरक सूर्य को प्राण के रूप में उत्पन्न किया. मैं ऐसे सूर्य को इस
ब्रह्मचारी की आयु वृद्धि के निमित्त इस में स्थापित करता हूं. मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि
दुःखों के उत्पादक पापों से, तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं.
(७)
आयुष्मतामायुष्कृतां प्राणेन जीव मा मृथाः.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (८)
हे ब्रह्मचारी! तू दीर्घ आयु वाले पुरुषों की आयु से दीर्घ आयु प्रदान करने वाले देवों के
प्राण से चिरकाल तक जीवन धारण कर तथा मृत्यु को प्राप्त मत हो. मैं तुझे रोग आदि दुःखों
के जनक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (८)
प्राणेन प्राणतां प्राणेहैव भव मा मृथाः.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (९)
हे ब्रह्मचारी! श्वास लेने वाले प्राणियों की प्राण वायु से तू सांस ले. तू इसी लोक में
निवास कर अर्थात् जीवित रह, मर मत. मैं तुझे रोग के उत्पादक पापों तथा यक्ष्मा रोग से
पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (९)
उदायुषा समायुषोषधीनां रसेन.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (१०)
हम चिर काल के जीवन से मृत्यु को प्राप्त करते हैं, इस लोक में निवास करते हैं तथा
जौ, गेहूं आदि के रस से वृद्धि को प्राप्त करते हैं. मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों के
जनक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से संयुक्त करता हूं. (१०)
आ पर्जन्यस्य वृष्ट्योदस्थामामृता वयम्.
व्य१हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (११)
हम वृष्टि करने वाले पर्जन्य देव के द्वारा बरसाए हुए जल से अमरता प्राप्त कर के उठ
बैठते हैं. हे ब्रह्मचारी! मैं तुझे रोग आदि दुःखों से जन्य पापों से पृथक् कर के चिर जीवन से
संयुक्त करता हूं. (११)
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सूक्त-१ देवता—बृहस्पति
चौथा कांड
सूक्त-१ देवता—बृहस्पति
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः.
स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (१)
सत्, चित, आनंद और सारे विश्व का कारण ब्रह्म सब से पहले सूर्य रूप में प्रकट हुआ
जो पूर्व दिशा में उत्पन्न होता है तथा अपने तेज से सारे जगत् को व्याप्त करता है. यह प्रकाश
और वर्षा का कारण सूर्यात्मक तेज सभी दिशाओं से आरंभ हो कर अपने शोभन प्रकाश को
फैलाता है. सत् और असत् के उत्पत्ति स्थान के ज्ञान का तथा धरती, आकाश आदि का ज्ञान
प्रकट करने वाला वही सूर्यात्मक तेज है. (१)
इयं पित्र्या राष्ट्र्येत्वग्रे प्रथमाय जनुषे भुवनेष्ठाः.
तस्मा एतं सुरुचं ह्वारमह्यं घर्मं श्रीणन्तु प्रथमाय धास्यवे.. (२)
संपूर्ण जगत् को उत्पन्न करने वाले पिता प्रजापति ब्रह्मा हैं. उन से प्राप्त और नाद रूप
में सभी प्राणियों में व्याप्त वाणी सारे संसार के व्यवहारों की स्वामिनी है. ये प्रथम शब्द से
वाच्य सूर्यात्मक तेज अर्थात् ब्रह्म को स्तुति रूप में प्राप्त हों. (२)
प्र यो जज्ञे विद्वानस्य बन्धुर्विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति.
ब्रह्म ब्रह्मण उज्जभार मध्यान्नीचैरुच्चैः स्वधा अभि प्र तस्थौ.. (३)
इस प्रपंच के कारण, हितकारी एवं निरावरण ज्ञान से सारे जगत् को जानते हुए जो देव
सर्वप्रथम उत्पन्न हुए, वे इंद्र आदि सभी देवों के जन्मों का वर्णन करते हैं. प्रथम उत्पन्न देव ने
सब के कारण रूप ब्रह्म के मध्य भाग से, नीचे वाले भाग से और ऊपर वाले भाग से वेदों का
उद्धार किया. इस के पश्चात देवों को हवि के रूप में अन्न मिला. (३)
स हि दिवः स पृथिव्या ऋतस्था मही क्षेमं रोदसी अस्कभायत्.
महान् मही अस्कभायद् वि जातो द्यां सद्म पार्थिवं च रजः.. (४)
सूर्य के रूप में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए देव आकाश में कारण रूप में तथा पृथ्वी में सत्य
रूप में स्थित हैं एवं उन्होंने धरती व आकाश को अविनाशी रूप में स्थापित किया. धरती
और आकाश को व्याप्त कर के वर्तमान उस प्रथम देव ने धरती और आकाश को स्थापित
किया है. वह इन दोनों के मध्य में सूर्य के रूप में उत्पन्न हुआ है तथा आकाश और पृथ्वी को
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अपने तेज से व्याप्त कर रहा है. (४)
स बुध्न्यादाष्ट्र जनुषो ऽ भ्यग्रं बृहस्पतिर्देवता तस्य सम्राट्.
अहर्यच्छुक्रं ज्योतिषो जनिष्ठाथ द्युमन्तो वि वसन्तु विप्राः.. (५)
प्रथम तेज के रूप में उत्पन्न परब्रह्म ने लोक के मूल अर्थात् निचले भाग से ले कर ऊपर
वाले भाग तक को व्याप्त किया. दान आदि गुणों से युक्त बृहस्पति इस लोक के अधिपति हैं.
दीप्ति वाला दिन उस प्रकाश वाले सूर्य से उत्पन्न हुआ. इस के पश्चात दीप्ति वाले एवं मेधावी
ऋत्विज् अपनेअपने व्यापारों में लग गए. (५)
नूनं तदस्य काव्यो हिनोति महो देवस्य पूर्व्यस्य धाम.
एष जज्ञे बहुभिः साकमित्था पूर्वे अर्धे विषिते ससन् नु.. (६)
ऋत्विजों का यज्ञ इस दिखाई न देने वाले और सब से पहले उत्पन्न सूर्य देव का मंडल
निश्चय ही सब को प्रेरणा देता है. यह सूर्य हजारों किरणों के साथ इस प्रकार पूर्व दिशा में
प्रकट होता है कि इन्हें हवि लक्षण अन्न शीघ्र प्राप्त हो जाता है. (६)
यो ऽ थर्वाणं पितरं देवबन्धुं बृहस्पतिं नमसाव च गच्छात्.
त्वं विश्वेषां जनिता यथासः कविर्देवो न दभायत् स्वधावान्.. (७)
बृहस्पति देव ने प्रजापति अथर्वा को लोक का उत्पन्न करने वाला और इंद्र आदि देवों
का बंधु जाना. बृहस्पति एवं अथर्वा को हमारा नमस्कार है. हवि रूप अन्न से युक्त हो कर वे
हम पर उसी प्रकार कृपा करते हैं, जिस प्रकार वे अन्न से युक्त एवं सभी प्राणियों के जन्म
दाता हैं. (७)
सूक्त-२ देवता—आत्मा
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः.
यो ३स्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१)
जो प्रजापति सभी प्राणियों को प्राण एवं शांति देने वाले हैं, सभी प्राणी एवं देव भी
जिन का शासन मानते हैं तथा दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं.
हम हवि द्वारा इस प्रकार के प्रजापति देव की पूजा करते हैं. (१)
यः प्राणतो निमिषतो महित्वैको राजा जगतो बभूव.
यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (२)
जो प्रजापति अपने माहात्म्य से सांस लेने वाले और पलक झपकाने वाले समस्त
गतिशील प्राणियों के एकमात्र स्वामी हैं, जीवन और मृत्यु छाया के समान जिन के अधीन हैं,
मैं हवि के द्वारा उन प्रजापति देव की पूजा करता हूं. (२)
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यं क्रन्दसी अवतश्श्वस्कभाने भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्.
यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (३)
संसार की रक्षा के लिए धरती और आकाश अपने स्थान पर स्थिर हैं. प्रजापति ने उन्हें
निराधार प्रदेश में धारण किया है. नीचे गिरने की आशंका से भयभीत धरती और आकाश के
मध्य विद्यमान वे प्रजापति रोए थे, इसलिए इन दोनों का नाम रोदसी हुआ. जिस प्रजापति
का आकाश में स्थित मार्ग वर्षा के जल का निर्माण करता है, हम हवि द्वारा उन प्रजापति की
पूजा करते हैं. (३)
यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्व १न्तरिक्षम्.
यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (४)
जिन प्रजापति की महिमा से आकाश विस्तीर्ण और पृथ्वी विस्तृत हुई है, जिन की
महिमा से अंतरिक्ष अर्थात् आकाश और पृथ्वी के मध्यवर्ती भाग का विस्तार हुआ है तथा
आकाश में प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला सूर्य विस्तीर्ण हुआ है, हम हव्य द्वारा उस प्रजापति की
पूजा करते हैं. (४)
यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः.
इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (५)
जिस प्रजापति देव की महिमा से हिमालय आदि सभी पर्वत उत्पन्न हुए हैं, सागर में
सभी सरिताएं जिस की महिमा से समा जाती हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण चार दिशाएं
जिस प्रजापति की भुजाएं हैं, हम हवि के द्वारा उस की पूजा करते हैं. (५)
आपो अग्रे विश्वमावन् गर्भं दधाना अमृता ऋतज्ञाः.
यासु देवीष्वधि देव आसीत् कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (६)
सृष्टि के आदि में जिन बलों ने सारे जगत् की रक्षा की, अविनाशी और जगत् के कारण
हिरण्यगर्भ को जिन दिव्य जलों ने गर्भ के रूप में धारण किया, उन जलों को अपने मध्य
धारण करने वाले प्रजापति की हम हवि के द्वारा पूजा करते हैं. (६)
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्.
स दाधार पृथिवीमुत द्यां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (७)
सृष्टि के आदि में हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुए तथा उत्पन्न होते ही सभी प्राणियों के स्वामी हो
गए. उन्होंने इस धरती और आकाश को धारण किया. हम हवि द्वारा उन प्रजापति की पूजा
करते हैं. (७)
आपो वत्सं जनयन्तीर्गर्भमग्रे समैरयन्.
तस्योत जायमानस्योल्ब आसीद्धिरण्मयः कस्मै देवाय हविषा विधेम..
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सूक्त-३ देवता—व्याघ्र
(८)
ईश्वर के द्वारा सब से प्रथम निर्मित जलों ने हिरण्यगर्भ को जन्म देने के लिए ईश्वर के
वीर्य को धारण किया. उस उत्पन्न होने वाले प्रजापति के उल्ब अर्थात् गर्भ को घेरने वाली
झील स्वर्णमय थी. हम हव्य द्वारा उस प्रजापति की पूजा करते हैं. (८)
सूक्त-३ देवता—व्याघ्र
उदितस्त्रयो अक्रमन् व्याघ्रः पुरुषो वृकः.
हिरुग्धि यन्ति सिन्धवो हिरुग् देवो वनस्पतिर्हिरुङ् नमन्तु शत्रवः.. (१)
बाघ, चोर मनुष्य और भेड़िए—ये तीन इस स्थान से भाग कर दूर चले जाएं. जिस
प्रकार सरिताएं गूढ़ रूप में बहती हैं, उसी प्रकार बाघ आदि भी दिखाई न दें. वनस्पतियों के
अधिष्ठाता देव जिस प्रकार वनस्पतियों में छिपे रहते हैं, उसी प्रकार बाघ आदि भी लुप्त हो
जाएं. बाघ आदि के जो शत्रु हैं, वे उन्हें दूर भगा दें. (१)
परेणैतु पथा वृकः परमेणोत तस्करः.
परेण दत्वती रज्जुः परेणाघायुरर्षतु.. (२)
जंगली हिंसक पशु भेड़िया हमारे चलनेफिरने के मार्ग से दूर चला जाए. चोर भेड़िए से
भी अधिक दूर चला जाए. दांतों वाले, रस्सी के आकार वाले एवं दूसरे की हिंसा करने वाले
सांप के अतिरिक्त अन्य हिंसक प्राणी भी हमारे संचरण मार्ग से दूर चले जाएं. (२)
अक्ष्यौ च ते मुखं च ते व्याघ्र जम्भयामसि.
आत् सर्वान् विंशतिं नखान्.. (३)
हे बाघ! मैं तेरी दोनों आंखों और मुख को नष्ट करता हूं. इस के अतिरिक्त मैं तेरे चारों
पैरों के बीस नाखूनों को भी नष्ट करता हूं. (३)
व्याघ्रं दत्वतां वयं प्रथमं जम्भयामसि.
आदु ष्टेनमथो अहिं यातुधानमथो वृकम्.. (४)
हम दांतों से हिंसा करने वाले पशुओं में सब से पहले बाघ का नाश करते हैं. इस के
पश्चात हम चोर, सर्प, यक्ष, राक्षस आदि तथा भेड़िए का नाश करते हैं. (४)
यो अद्य स्तेन आयति स संपिष्टो अपायति.
पथामपध्वंसेनेत्विन्द्रो वज्रेण हन्तु तम्.. (५)
आज जो चोर आता है, वह हमारे द्वारा कुटपिट कर दूर भागे. वह मार्गों में से
कष्टदायक मार्ग से जाए और इंद्र अपने वज्र से उस की हिंसा करें. (५)
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मूर्णा मृगस्य दन्ता अपिशीर्णा उ पृष्टयः.
निम्रुक् ते गोधा भवतु नीचायच्छशयुर्मृगः.. (६)
बाघ आदि हिंसक पशुओं के दांत भोथरे अर्थात् खाने में असमर्थ हो जाएं. उन के सींग
और पसलियों की हड्डियां भी पैनी न रहें. हे पथिक! वह तेरे मार्ग में दिखाई न दे और सोने
वाले दुष्ट पशु भी पिछले मार्ग से दूर चले जाएं. (६)
यत् संयमो न वि यमो वि यमो यन्न संयमः.
इन्द्रजाः सोमजा आथर्वणमसि व्याघ्रजम्भनम्.. (७)
जहां मंत्र के सामर्थ्य से इंद्र और सोम से संबंधित संयमन कभी विपरीत प्रभाव नहीं
डालता. हे क्रियाकलाप! तू अथर्वा महर्षि द्वारा दिया हुआ है, इसलिए तू बाघ आदि दुष्ट
प्राणियों का हिंसक बन. (७)
सूक्त-४ देवता—वनस्पति आदि
यां त्वा गन्धर्वो अखनद् वरुणाय मृतभ्रजे.
तां त्वा वयं खनामस्योषधिं शेपहर्षणीम्.. (१)
हे कपित्थ अर्थात् कैथ नाम के वृक्ष एवं फल! वरुण का पौरुष नष्ट होने पर उन्हें वह
शक्ति पुनः प्राप्त कराने के लिए गंधर्वों ने तुझे खोद कर प्राप्त किया था. उसी शक्तिवर्धक
ओषधि को हम खोदते हैं. (१)
उदुषा उदु सूर्य उदिदं मामकं वचः.
उदेजतु प्रजापतिर्वृषा शुष्मेण वाजिना.. (२)
सूर्यपत्नी उषा शक्तिशाली वीर्य से युक्त हो तथा सूर्यदेव उसे उत्कृष्ट वीर्य संपन्न करें. मेरा
यह मंत्र भी शक्तिशाली हो तथा जगत् के स्रष्टा प्रजापति देव भी इसे अपने बल वीर्य से उन्नत
करें. (२)
यथा स्म ते विरोहतोऽभितप्तमिवानति.
ततस्ते शुष्मवत्तरमियं कृणोत्वोषधिः.. (३)
हे वीर्य के इच्छुक पुरुष! पुत्र, पौत्र आदि के रूप में विरोहण के कारण तेरी पुरुष इंद्रिय
क्रोधित सांप के फन के समान चेष्टा कर सके, इसी कारण मैं तुझे यह ओषधि प्रदान करता
हूं. (३)
उच्छुष्मौषधीनां सार ऋषभाणाम्.
सं पुंसामिन्द्र वृष्ण्यमस्मिन् धेहि तनूवशिन्.. (४)
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वीर्य वर्धक ओषधियों में श्रेष्ठ तथा गर्भाधान में समर्थ पुरुषों का सार यह ओषधि तुझे
वीर्य युक्त करे. हे इंद्र! पुष्ट करने वाली ओषधियों में जो वीर्य है, उसे इस पुरुष के शरीर में
धारण करो. (४)
अपां रसः प्रथमजो ऽ थो वनस्पतीनाम्.
उत सोमस्य भ्रातास्युताशर्मसि वृष्ण्यम्.. (५)
हे कपित्थ की जड़! तू जलों के मंथन के समय सब से पहले रस के रूप में उत्पन्न हुई.
तू सभी वृक्षों का सार और सोम की सजातीय है. तू अंगिरा आदि ऋषियों के मंत्रों से उत्पन्न
वीर्य है. (५)
अद्याग्ने अद्य सवितरद्य देवि सरस्वति.
अद्यास्य ब्रह्मणस्पते धनुरिवा तानया पसः.. (६)
हे अग्नि, सरिता, देवी सरस्वती और ब्रह्मणस्पति! इस वीर्य चाहने वाले पुरुष की
पुरुषइंद्रिय को आज वीर्य प्रदान कर के धनुष के समान तान दो. (६)
आहं तनोमि ते पसो अधि ज्यामिव धन्वनि.
क्रमस्वर्श इव रोहितमनवग्लायता सदा.. (७)
हे वीर्य के इच्छुक पुरुष! मैं तेरी पुरुषइंद्रिय को अपने मंत्र के प्रभाव से धनुष पर चढ़ी
डोरी के समान सशक्त बनाता हूं. इस कारण तू गर्भाधान करने में समर्थ बैल के समान प्रसन्न
मन से सदा अपनी पत्नी पर आक्रमण कर. (७)
अश्वस्याश्वतरस्याजस्य पेत्वस्य च.
अथ ऋषभस्य ये वाजास्तानस्तिन् धेहि तनूवशिन्.. (८)
हे ओषधि! घोड़ों, बच्चों, बकरों, मेढ़ों और बैलों में जो वीर्य है, तू इस पुरुष के शरीर में
वैसा ही वीर्य स्थापित कर. (८)
सूक्त-५ देवता—वृषभ
सहस्रशृङ्गो वृषभो यः समुद्रादुदाचरत्.
तेना सहस्येना वयं नि जनान्त्स्वापयामसि.. (१)
कामनाओं एवं जल की वर्षा करने वाले सूर्य उदयाचल के समीपवर्ती सागर से उदय
होते हैं. उदित एवं शत्रुओं को वश में करने वाले सूर्य के द्वारा हम अपने सामने स्थित
व्यक्तियों को निद्रा-परवश बनाते हैं. (१)
न भूमिं वातो अति वाति नाति पश्यति कश्चन.
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स्त्रियश्च सर्वाः स्वापय शुनश्चेन्द्रसखा चरन्.. (२)
भूमि पर वायु अधिक न चले अर्थात् तेज हवा के कारण लोगों की नींद न टूटे. सोए हुए
व्यक्तियों में से कोई भी दूसरों को न देख सके. हे इंद्र के मित्र वायु! तुम प्राण वायु के रूप में
शरीर में वर्तमान रह कर सभी समीपवर्ती स्त्रियों और कुत्तों को सुला दो. (२)
प्रोष्ठेशयास्तल्पेशया नारीर्या वह्यशीवरीः.
स्त्रियो याः पुण्यगन्धयस्ताः सर्वाः स्वापयामसि.. (३)
जो स्त्रियां आंगन में अथवा पलंग पर सो रही हैं अथवा जो स्त्रियां झूले आदि में सोने
की अभ्यस्त हैं और उत्तम गंध वाली हैं, उन सब को मैं सुलाता हूं. (३)
एजदेजदजग्रभं चक्षुः प्राणमजग्रभम्.
अङ्गान्यजग्रभं सर्वा रात्रीणामतिशर्वरे.. (४)
सभी गतिशील प्राणियों को मैं ने सुला दिया. उन के नेत्र और नासिका निद्रा द्वारा गृहीत
हैं. उन के हस्त, चरण आदि को भी मैं ने निद्रा मग्न करा दिया है. यह सब मध्य रात्रि के समय
किया है, जब अंधकार की अधिकता होती है. (४)
य आस्ते यश्चरति यश्च तिष्ठन् विपश्यति.
तेषां सं दध्मो अक्षीणि यथेदं हर्म्यं तथा.. (५)
हमारे संचरण के समय जो मार्ग में बैठा है तथा जो ठहर कर देख रहा है, मैं उन सब की
आंखें इस प्रकार बंद करता हूं, जिस प्रकार दिखाई देने वाला यह भवन देखने में असमर्थ है.
(५)
स्वप्तु माता स्वप्तु पिता स्वप्तु श्वा स्वप्तु विशपतिः.
स्वपन्त्वस्यै ज्ञातयः स्वप्त्वयमभितो जनः.. (६)
जिस स्त्री को निद्रित कर के हम वश में करने के इच्छुक हैं, उस की माता सब से पहले
सो जाए. इस के पश्चात उस का पिता, घर की रक्षा करने वाला कुत्ता और घर का स्वामी उस
का पति भी सो जाए. उस के बंधुबांधव एवं उस के घर की रक्षा के लिए नियुक्त चारों ओर
स्थित जन भी सो जाएं. (६)
स्वप्न स्वप्नाभिकरणेन सर्वं नि ष्वापया जनम्.
ओत्सूर्यमन्यान्त्स्वापायाव्युषं जागृतादहमिन्द्र इवारिष्टो अक्षितः.. (७)
हे स्वप्न के देव! शय्या आदि पर सोने वाले इन जनों को तथा अन्य व्यक्तियों को सूर्योदय
तक निद्रा मग्न रखो. सब के सो जाने पर हिंसा और क्षय से रहित हो कर इंद्र के समान मैं
भोग में संलग्न रहूं एवं जागरण करूं. (७)
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सूक्त-६ देवता—ब्राह्मण आदि
ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः.
स सोमं प्रथमः पपौ स चकारारसं विषम्.. (१)
सर्पों में सब से पहले तक्षक उत्पन्न हुआ, जो मनुष्यों में ब्राह्मण के समान सर्पों में पूज्य
था. उस के दस शीश और दस मुख थे. क्षत्रिय आदि जातियों वाले सर्पों से पहले उत्पन्न होने
के कारण तक्षक ने सब से पहले स्वर्गलोक में स्थित अमृत पिया. सोम अर्थात् अमृत पीने
वाला ब्राह्मण तक्षक कंद मूल आदि से उत्पन्न रस को विष के प्रभाव से हीन बनाए. (१)
यावती द्यावापृथिवी वरिम्णा यावत् सप्त सिन्धवो वितष्ठिरे.
वाचं विषस्य दूषणीं तामितो निरवादिषम्.. (२)
धरती और आकाश का जितना विस्तार है तथा सागर जितने परिमाण में स्थित है, मैं
इन दोनों स्थानों में स्थित कंद, मूल, फल से उत्पन्न विष को नष्ट करने वाले मंत्रों से युक्त वाणी
का उच्चारण करता हूं. (२)
सुपर्णस्त्वा गरुत्मान् विष प्रथममावयत्.
नामीमदो नारूरुप उतास्मा अभवः पितुः.. (३)
हे विष! सब से पहले सुंदर पंखों वाले गरुड़ ने तुम्हें खाया था. इस कारण तू इस पुरुष
को मतवाला मत बना एवं विमूढ़ मत कर. हे विष! तू इस के लिए अन्न बन जा. (३)
यस्त आस्यत् पञ्चाङ्गुरिर्वक्राच्चिदधि धन्वनः.
अपस्कम्भस्य शल्यान्निरवोचमहं विषम्.. (४)
पांच अंगुलियों वाले जिस हाथ ने डोरी चढ़े हुए होने के कारण झुके हुए धनुष के द्वारा
पुरुष के शरीर में विष को पहुंचाया है, उस हाथ को मैं सुपारी वृक्ष के टुकड़े से मंत्रों की
सहायता से प्रभावहीन करता हूं. (४)
शल्याद् विषं निरवोचं प्राञ्जनादुत पर्णधेः.
अपाष्ठाच्छृङ्गात् कुल्मलान्निरवोचमहं विषम्.. (५)
बाणों में लगे फल से जिस विष ने शरीर में प्रवेश किया, उसे मैं मंत्र बल से बाहर
निकालता हूं. विषैले पत्तों वाले वृक्ष से, लेप से, पत्तों से, पशु के सींग से एवं मल से जो विष
उत्पन्न हुआ है, उसे मैं अपने मंत्र बल से शरीर से अलग करता हूं. (५)
अरसस्त इषो शल्यो ऽ थो ते अरसं विषम्.
उतारसस्य वृक्षस्य धनुष्टे अरसारसम्.. (६)
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हे बाण! तेरा विष बुझा हुआ फल विष रहित हो जाए. इस के बाद तेरा विष प्रभावहीन
हो जाए. सारहीन वृक्ष से बना हुआ और तुझ से संबंधित धनुष भी प्रभावहीन हो जाए. (६)
ये अपीषन् ये अदिहन् य आस्यन् ये अवासृजन्.
सर्वे ते वध्रयः कृता वध्रिर्विषगिरिः कृतः.. (७)
जो लोग विषपूर्ण जड़ीबूटियों को पीस कर खिलाते हैं, जो लोग लेप के रूप में विष का
प्रयोग करते हैं, जो विष को दूर से फेंकते हैं तथा जो समीप रह कर अन्न, फल आदि में विष
मिला देते हैं, मैं ने अपने मंत्र के प्रभाव से इन सब को शक्तिहीन बना दिया है. जिन पर्वतों पर
कंद मूल के रूप में विष उत्पन्न होता था, उन्हें भी मैं ने शक्तिहीन कर दिया है. (७)
वध्रयस्ते खनितारो वध्रिस्त्वमस्योषधे.
वध्रिः स पर्वतो गिर्यतो जातमिदं विषम्.. (८)
हे विषयुक्त जड़ीबूटी! तुझे खोदने वाले शक्तिहीन हो जाएं तथा मेरे मंत्र के प्रभाव से तू
भी प्रभावहीन हो जा. जिन पर्वतों पर विषैले कंदमूल उत्पन्न होते हैं, वे भी शक्तिहीन हो जाएं.
(८)
सूक्त-७ देवता—वनस्पति
वारिदं वारयातै वरणावत्यामधि.
तत्रामृतस्यासिक्तं तेना ते वारये विषम्.. (१)
वारण वृक्ष जहां उत्पन्न होते हैं, उस वारणावती का विषहारी जल हम मनुष्यों के विष
को दूर करता है. उस जल में स्वर्ग स्थित अमृत का विषनाशक प्रभाव विद्यमान है. इस कारण
मैं उस अमृतमय जल से तेरे कंद, मूल आदि से उत्पन्न विष को दूर करता हूं. (१)
अरसं प्राच्यं विषमरसं यदुदीच्यम्.
अथेदमशराच्यं करम्भेण वि कल्पते.. (२)
मेरी मंत्र शक्ति से पूर्व दिशा और उत्तर दिशा में उत्पन्न होने वाला विष प्रभावहीन हो
जाए. दक्षिण, पश्चिम तथा नीचे की दिशा में उत्पन्न होने वाले विष करंभ (भात) से
सामर्थ्यहीन हो जाए. (२)
करम्भं कृत्वा तिर्यं पीबस्पाकममुदारथिम्.
क्षुधा किल त्वा दुष्टनो जक्षिवान्त्स न रूरुपः.. (३)
हे दुष्ट शरीर वाले विष! बिना जाने हुए खाया हुआ तू चरबी को जलाने वाला और उदर
संबंधी रोगों का जनक है. इस पुरुष ने तुझे करंभ (भात) समझ कर खाया था. तू इस पुरुष
को मूर्च्छित मत बना. (३)
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वि ते मदं मदावति शरमिव पातयामसि.
प्र त्वा चरुमिव येषन्तं वचसा स्थापयामसि.. (४)
हे मूर्च्छित करने वाली जड़ीबूटी! तेरे मूर्च्छा लाने वाले विष को मैं शरीर से इस प्रकार
दूर करता हूं, जिस प्रकार धनुष से छूटा हुआ बाण दूर गिरता है. हे विष! तू गुप्त रूप से जाने
वाले दूत के समान शरीर के अंगों में व्याप्त हो जाता है. मैं अपनी मंत्र शक्ति से तुझे शरीर से
निकाल कर दूर करता हूं. (४)
परि ग्राममिवाचितं वचसा स्थापयामसि.
तिष्ठा वृक्ष इव स्थामन्यभिखाते न रूरुप:.. (५)
हे खोदने से प्राप्त होने वाली जड़ीबूटी! जनसमूह के समान प्रभावशाली तेरे विष को
भी हम अपनी मंत्र शक्ति के द्वारा शरीर से निकाल कर दूर स्थापित करते हैं. तू अपने स्थान
पर वृक्ष के समान निश्चल रह तथा इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (५)
पवस्तैस्त्वा पर्यक्रीणन् दूर्शीभिरजिनैरुत.
प्रक्रीरसि त्वमोधे ऽ भ्रिखाते न रूरुप:.. (६)
हे विषमूलक जड़ीबूटी! महर्षियों ने तुझे झाड़ू के तिनकों के बदले खरीदा है. तू हरिण
आदि पशुओं के चर्म के बदले क्रय की गई है. तू बड़े परिश्रम से खरीदी गई है, इसलिए यहां
से दूर हो जा और इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (६)
अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे.
वीरान् नो अत्र मा दभन् तद् व एतत् पुरो दधे.. (७)
हे पुरुषो! तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करने वाले शत्रुओं ने पहले जो यज्ञ आदि कर्म किए
हैं, उन कर्मों के द्वारा वे हमारे पुत्र, पौत्र आदि को इस स्थान पर हिंसित न करें. किया जाता
हुआ यह चिकित्सा कर्म मैं उन की रक्षा के लिए तुम्हारे सामने उपस्थित करता हूं. (७)
सूक्त-८ देवता—जल
भूतो भूतेषु पय आ दधाति स भूतानामधिपतिर्बभूव.
तस्य मृत्युश्चरति राजसूयं स राजा राज्यमनु मन्यतामिदम्.. (१)
अभिषेक द्वारा ऐश्वर्य प्राप्त करने वाला राजा ही समृद्ध जनपदों में भोज्य सामग्री
पहुंचाता है. इस प्रकार वह प्राणियों का स्वामी हुआ. मृत्यु के देव यमराज दुष्टों को दंड
दिलाने और सज्जनों का पालन करने के लिए ही राजा का राजसूय यज्ञ कराते हैं. वह राजा
इस राज्य को तथा दुष्ट निग्रह और सज्जन परिपालन के कर्म को स्वीकार करे. (१)
अभि प्रेहि माप वेन उग्रश्चेत्ता सपत्नहा.
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आ तिष्ठ मित्रवर्धन तुभ्यं देवा अधि ब्रुवन्.. (२)
हे राजा! तुम सिंहासन तथा हाथी, रथ, घोड़ा आदि सवारियों के प्रति अनिच्छा मत
करो. तुम शक्तिशाली एवं कार्य अकार्य का ज्ञान रखने वाले हो. तुम शत्रु हंता हो,
राजसिंहासन पर बैठ कर तुम मित्रों का कल्याण करो. इंद्र आदि देव तुम्हें अपना कहें. (२)
आतिष्ठन्तं परि विश्वे अभूषञ्छ्रियं वसानश्चरति स्वरोचिः.
महत् तद् वृष्णो असुरस्य नामा विश्वरूपो अमृतानि तस्थौ.. (३)
सिंहासन पर बैठे हुए राजा की सब लोग सेवा करें. राजा भी सिंहासन पर बैठ कर
राज्यलक्ष्मी को धारण करे, तेजस्वी बने तथा प्रजा पालन में तत्पर हो. अभिषेक से उत्पन्न
राज्यतेज दसों दिशाओं में फैल जाए. शत्रुओं को दूर भगाने वाले राजा के नाममात्र से शत्रु
भयभीत होने लगें. यह राजा शत्रु, मित्र, पत्नी आदि के प्रति विविध प्रकार का व्यवहार करता
हुआ दंड, युद्ध, अध्ययन आदि कर्म करे. (३)
व्याघ्रो अधि वैयाघ्रे वि क्रमस्व दिशो महीः.
विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्त्वापो दिव्याः पयस्वतीः.. (४)
हे राजा! तुम व्याघ्रचर्म पर बैठ कर और बाघ के समान अपराजेय हो कर पूर्व आदि
विशाल दिशाओं को जीतो. तेजस्वी होने के कारण सारी प्रजाएं तुम्हारी कामना करें तथा
दिव्य जल तुम्हारे राज्य को प्राप्त हो, जिस से तुम्हारे राज्य में अकाल न पड़े. (४)
या आपो दिव्याः पयसा मदन्त्यन्तरिक्ष उत वा पृथिव्याम्.
तासां त्वा सर्वासामपामभि षिञ्चामि वर्चसा.. (५)
हे राजा! आकाश से बरसने वाले जो जल अपने रस से, प्राणियों को तृप्त करते हैं,
अंतरिक्ष और पृथ्वी पर जो जल स्थित हैं, मैं तीनों लोकों में स्थित इन जलों से तुम्हारा
अभिषेक करता हूं. (५)
अभि त्वा वर्चसासिचन्नापो दिव्याः पयस्वतीः.
यथासो मित्रवर्धनस्तथा त्वा सविता करत्.. (६)
हे राजा! दिव्य जल अपने तेज से तुम्हें सींचे, जिस से तुम मित्रों के बढ़ाने वाले बनो.
सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव तुम्हें सामर्थ्य दें. (६)
एना व्याघ्रं परिषस्वजानाः सिंहं हिन्वन्ति महते सौभगाय.
समुद्रं न सुभुवस्तस्थिवांसं मर्मृज्यन्ते द्वीपिनमप्स्व १ न्तः.. (७)
नदी के रूप में जल जिस प्रकार सागर को प्रसन्न करते हैं, उसी प्रकार दिव्य जल राजा
को शक्तिशाली बनाएं. जिस प्रकार माता पुत्र का आलिंगन करती है, उसी प्रकार महान
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