अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयज्ञ में दी गई सफेद पैरों वाली भेड़ सागर के जल के समान कभी क्षीण नहीं होती और
इस का दूध बढ़ता ही जाता है. अश्विनीकुमारों के समान यह भेड़ कभी क्षीण नहीं होती. (६)
क इदं कस्मा अदात् कामः कामायादात्.
कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामः समुद्रमा विवेश.
कामेन त्वा प्रति गृह्णामि कामैतत् ते.. (७)
यह दक्षिणा रूपी धन प्रजापति ने प्रजापति को ही दिया था. दक्षिणा देने वाला
पारलौकिक फल का अभिलाषी है और लेने वाला लौकिक फल का इच्छुक है. इस प्रकार
दक्षिणा का दाता और लेने वाला दोनों ही इच्छा वाले हैं. इच्छा का रूप सागर के समान
असीमित है. इच्छा का अंत नहीं है. हे दक्षिणा द्रव्य! मैं इसी प्रकार की इच्छा से तुझे ग्रहण
करता हूं. हे अभिलाषा! स्वीकार किया हुआ यह धन तेरे लिए हो. (७)
भूमिष्ट्वा प्रति गृह्णात्वन्तरिक्षमिदं महत्.
माहं प्राणेन मात्मना मा प्रजया प्रतिगृह्य वि राधिषि.. (८)
हे दक्षिणा द्रव्य! तुझे यह धरती और विशाल आकाश ग्रहण करे. इसीलिए तुझे ग्रहण
कर के मैं प्राण से, आत्मा से और पुत्रपौत्र आदि संतान से हीन न बनूं. (८)
सूक्त-३० देवता—सौमनस्य
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः.
अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या.. (१)
हे विवाद करने वाले पुरुषो! मैं तुम्हारे लिए सौमनस्य कर्म करता हूं जो विद्वेष रहित एवं
परस्पर प्रेम कराने वाला है. जिस प्रकार गाय अपने बछड़े से प्रेम करती है. उसी प्रकार तुम
भी परस्पर प्रेम करो. (१)
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः.
जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शान्तिवाम्.. (२)
पुत्र पिता के अनुकूल कर्म करने वाला हो. माता पुत्र आदि के प्रति सौमनस्य वाली बने.
पत्नी पति से मधुर एवं सुखकर वचन कहे. (२)
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा.
सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया.. (३)
भाई अपने सगे भाई से उत्तराधिकार को ले कर तथा बहन अपनी सगी बहन से द्वेष न
करे. यह सब समान गति वाले एवं समान कर्मों वाले हो कर कल्याणकारी वचन कहें. (३)
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