Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 146 of 1063

Read in context
Page 146

तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (४)
उत्तर दिशा हम पर अनुग्रह करे. सोम इस दिशा के अधिपति अर्थात् स्वामी हैं. स्वयं
उत्पन्न होने वाला सर्प इस का रक्षक है और वज्र इस के दुष्टों को वश में करने वाला बाण है.
इस के अधिपति सोम को, स्वयं उत्पन्न होने वाले रक्षक सर्प को और वज्र रूप बाण को
हमारा नमस्कार प्रसन्न करने वाला हो. जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाते हैं अथवा हम जिन से द्वेष
करते हैं. हे सोम आदि देवो! उन्हें हम तुम्हारे भक्षण के लिए तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (४)
ध्रुवा दिग् विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (५)
नीचे की ओर वाली अर्थात् स्थिर दिशा हम पर अनुग्रह करे. विष्णु इस के अधिपति हैं,
काली गरदन वाला सांप इस का रक्षक है और वृक्ष इस के दुष्ट नाशकारी बाण हैं. इस के
अधिपति विष्णु को, रक्षक काली गरदन वाले सर्प को और आयुध वृक्षों को हमारा नमस्कार
प्रसन्न करने वाला हो. हे विष्णु आदि देवो! जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाते हैं अथवा हम जिन से
द्वेष रखते हैं, उन्हें हम तुम्हारे भक्षण के हेतु तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (५)
ऊर्ध्वा दिग् बृहस्पतिरधिपतिः श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (६)
ऊपर वर्तमान दिशा हम पर कृपा करे. बृहस्पति इस के स्वामी हैं, श्वेतवर्ण का सर्प इस
का रक्षक है और वर्षा का जल इस का दुष्ट निवारक आयुध है. हम इस के स्वामी बृहस्पति
को रक्षक श्वेत वर्ण के सर्प को तथा दुष्ट निवारक आयुध वर्षा के जल को नमस्कार करते हैं.
हे बृहस्पति आदि देवो! जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाते हैं अथवा हम जिन से द्वेष रखते हैं, उन्हें
हम तुम्हारे भक्षण के हेतु तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (६)
सूक्त-२८ देवता—अश्विनीकुमार
एकैकयैषा सृष्ट्या सं बभूव यत्र गा असृजन्त भूतकृतो विश्वरूपाः.
यत्र विजायते यमिन्यपर्तुः सा पशून् क्षिणाति रिफती रुशती.. (१)
विधाता के द्वारा बनाई गई यह सृष्टि क्रमशः एकएक कर के उत्पन्न हुई. यहां पृथिवी
आदि तत्त्वों के निर्माता ऋषियों ने अनेक रंगों वाली गायों, मानुषियों और घोड़ियों को उत्पन्न
किया. उत्पत्ति वाली इस सृष्टि में यदि कोई गाय आदि निकृष्ट रज और वीर्य से उत्पन्न जुड़वां
संतान को जन्म देती है, वह यजमान के गाय आदि पशुओं का भक्षण करती हुई और चोर,
ebook converter DEMO Watermarks*