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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 158

वीर्य वर्धक ओषधियों में श्रेष्ठ तथा गर्भाधान में समर्थ पुरुषों का सार यह ओषधि तुझे
वीर्य युक्त करे. हे इंद्र! पुष्ट करने वाली ओषधियों में जो वीर्य है, उसे इस पुरुष के शरीर में
धारण करो. (४)
अपां रसः प्रथमजो ऽ थो वनस्पतीनाम्.
उत सोमस्य भ्रातास्युताशर्मसि वृष्ण्यम्.. (५)
हे कपित्थ की जड़! तू जलों के मंथन के समय सब से पहले रस के रूप में उत्पन्न हुई.
तू सभी वृक्षों का सार और सोम की सजातीय है. तू अंगिरा आदि ऋषियों के मंत्रों से उत्पन्न
वीर्य है. (५)
अद्याग्ने अद्य सवितरद्य देवि सरस्वति.
अद्यास्य ब्रह्मणस्पते धनुरिवा तानया पसः.. (६)
हे अग्नि, सरिता, देवी सरस्वती और ब्रह्मणस्पति! इस वीर्य चाहने वाले पुरुष की
पुरुषइंद्रिय को आज वीर्य प्रदान कर के धनुष के समान तान दो. (६)
आहं तनोमि ते पसो अधि ज्यामिव धन्वनि.
क्रमस्वर्श इव रोहितमनवग्लायता सदा.. (७)
हे वीर्य के इच्छुक पुरुष! मैं तेरी पुरुषइंद्रिय को अपने मंत्र के प्रभाव से धनुष पर चढ़ी
डोरी के समान सशक्त बनाता हूं. इस कारण तू गर्भाधान करने में समर्थ बैल के समान प्रसन्न
मन से सदा अपनी पत्नी पर आक्रमण कर. (७)
अश्वस्याश्वतरस्याजस्य पेत्वस्य च.
अथ ऋषभस्य ये वाजास्तानस्तिन् धेहि तनूवशिन्.. (८)
हे ओषधि! घोड़ों, बच्चों, बकरों, मेढ़ों और बैलों में जो वीर्य है, तू इस पुरुष के शरीर में
वैसा ही वीर्य स्थापित कर. (८)
सूक्त-५ देवता—वृषभ
सहस्रशृङ्गो वृषभो यः समुद्रादुदाचरत्.
तेना सहस्येना वयं नि जनान्त्स्वापयामसि.. (१)
कामनाओं एवं जल की वर्षा करने वाले सूर्य उदयाचल के समीपवर्ती सागर से उदय
होते हैं. उदित एवं शत्रुओं को वश में करने वाले सूर्य के द्वारा हम अपने सामने स्थित
व्यक्तियों को निद्रा-परवश बनाते हैं. (१)
न भूमिं वातो अति वाति नाति पश्यति कश्चन.
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