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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 151 of 1063

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Page 151

व्यार्त्या पवमानो वि शक्रः पापकृत्यया.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (२)
वायु इस बालक को रोगजनित पीड़ा से अलग रखे तथा इंद्र पाप के कार्यों से बचाएं. मैं
इसे रोग आदि दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन
से युक्त करता हूं. (२)
वि ग्राम्याः पशव आरण्यैर्व्यापस्तृष्णयास्रन्.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (३)
जिस प्रकार गाय, भैंस आदि ग्रामीण पशु वन के पशुओं से तथा जल प्यासे व्यक्तियों से
दूर रहता है, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःख उत्पन्न करने वाले पापों से तथा
यक्ष्मा रोग से दूर कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (३)
वी ३ मे द्यावापृथिवी इतो वि पन्थानो दिशंदिशम्.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (४)
जिस प्रकार धरती और आकाश एक दूसरे से अलग रहते हैं तथा एक गांव से प्रत्येक
दिशाओं में जाने वाले मार्ग स्वाभाविक रूप से पृथक् होते हैं, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को
रोग आदि दुःखों के उत्पादक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक कर के चिर जीवन से युक्त
करता हूं. (४)
त्वष्टा दुहित्रे वहतुं युनक्तीतीदं विश्वं भुवनं वि याति.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (५)
त्वष्टा ने अपनी पुत्री के विवाह में जो दहेज दिया था, उसे स्थापित करने के निमित्त
धरती और आकाश जिस प्रकार पृथक् हुए थे, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि
दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा क्षय रोग से पृथक् कर के दीर्घ जीवन से संयुक्त करता
हूं. (५)
अग्निः प्राणान्त्सं दधाति चन्द्रः प्राणेन संहितः.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (६)
जिस प्रकार जठराग्नि चक्षु आदि इंद्रियों को अन्न से बना हुआ रस पहुंचा कर
अपनाअपना कार्य करने में समर्थ बनाती है तथा चंद्रमा प्राण वायु से युक्त हो कर अमृत रस
से सभी आत्माओं का पोषण करता है, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों के
उत्पादक पापों से तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् करके दीर्घ जीवन प्रदान करता हूं. (६)
प्राणेन विश्वतोवीर्यं देवाः सूर्यं समैरयन्.
व्य१हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (७)
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