अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 157 of 1063
Read in contextमूर्णा मृगस्य दन्ता अपिशीर्णा उ पृष्टयः.
निम्रुक् ते गोधा भवतु नीचायच्छशयुर्मृगः.. (६)
बाघ आदि हिंसक पशुओं के दांत भोथरे अर्थात् खाने में असमर्थ हो जाएं. उन के सींग
और पसलियों की हड्डियां भी पैनी न रहें. हे पथिक! वह तेरे मार्ग में दिखाई न दे और सोने
वाले दुष्ट पशु भी पिछले मार्ग से दूर चले जाएं. (६)
यत् संयमो न वि यमो वि यमो यन्न संयमः.
इन्द्रजाः सोमजा आथर्वणमसि व्याघ्रजम्भनम्.. (७)
जहां मंत्र के सामर्थ्य से इंद्र और सोम से संबंधित संयमन कभी विपरीत प्रभाव नहीं
डालता. हे क्रियाकलाप! तू अथर्वा महर्षि द्वारा दिया हुआ है, इसलिए तू बाघ आदि दुष्ट
प्राणियों का हिंसक बन. (७)
सूक्त-४ देवता—वनस्पति आदि
यां त्वा गन्धर्वो अखनद् वरुणाय मृतभ्रजे.
तां त्वा वयं खनामस्योषधिं शेपहर्षणीम्.. (१)
हे कपित्थ अर्थात् कैथ नाम के वृक्ष एवं फल! वरुण का पौरुष नष्ट होने पर उन्हें वह
शक्ति पुनः प्राप्त कराने के लिए गंधर्वों ने तुझे खोद कर प्राप्त किया था. उसी शक्तिवर्धक
ओषधि को हम खोदते हैं. (१)
उदुषा उदु सूर्य उदिदं मामकं वचः.
उदेजतु प्रजापतिर्वृषा शुष्मेण वाजिना.. (२)
सूर्यपत्नी उषा शक्तिशाली वीर्य से युक्त हो तथा सूर्यदेव उसे उत्कृष्ट वीर्य संपन्न करें. मेरा
यह मंत्र भी शक्तिशाली हो तथा जगत् के स्रष्टा प्रजापति देव भी इसे अपने बल वीर्य से उन्नत
करें. (२)
यथा स्म ते विरोहतोऽभितप्तमिवानति.
ततस्ते शुष्मवत्तरमियं कृणोत्वोषधिः.. (३)
हे वीर्य के इच्छुक पुरुष! पुत्र, पौत्र आदि के रूप में विरोहण के कारण तेरी पुरुष इंद्रिय
क्रोधित सांप के फन के समान चेष्टा कर सके, इसी कारण मैं तुझे यह ओषधि प्रदान करता
हूं. (३)
उच्छुष्मौषधीनां सार ऋषभाणाम्.
सं पुंसामिन्द्र वृष्ण्यमस्मिन् धेहि तनूवशिन्.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*