Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 152 of 1063

Read in context
Page 152

देवों ने सारे विश्व के प्रेरक सूर्य को प्राण के रूप में उत्पन्न किया. मैं ऐसे सूर्य को इस
ब्रह्मचारी की आयु वृद्धि के निमित्त इस में स्थापित करता हूं. मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि
दुःखों के उत्पादक पापों से, तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं.
(७)
आयुष्मतामायुष्कृतां प्राणेन जीव मा मृथाः.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (८)
हे ब्रह्मचारी! तू दीर्घ आयु वाले पुरुषों की आयु से दीर्घ आयु प्रदान करने वाले देवों के
प्राण से चिरकाल तक जीवन धारण कर तथा मृत्यु को प्राप्त मत हो. मैं तुझे रोग आदि दुःखों
के जनक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (८)
प्राणेन प्राणतां प्राणेहैव भव मा मृथाः.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (९)
हे ब्रह्मचारी! श्वास लेने वाले प्राणियों की प्राण वायु से तू सांस ले. तू इसी लोक में
निवास कर अर्थात् जीवित रह, मर मत. मैं तुझे रोग के उत्पादक पापों तथा यक्ष्मा रोग से
पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (९)
उदायुषा समायुषोषधीनां रसेन.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (१०)
हम चिर काल के जीवन से मृत्यु को प्राप्त करते हैं, इस लोक में निवास करते हैं तथा
जौ, गेहूं आदि के रस से वृद्धि को प्राप्त करते हैं. मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों के
जनक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से संयुक्त करता हूं. (१०)
आ पर्जन्यस्य वृष्ट्योदस्थामामृता वयम्.
व्य१हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (११)
हम वृष्टि करने वाले पर्जन्य देव के द्वारा बरसाए हुए जल से अमरता प्राप्त कर के उठ
बैठते हैं. हे ब्रह्मचारी! मैं तुझे रोग आदि दुःखों से जन्य पापों से पृथक् कर के चिर जीवन से
संयुक्त करता हूं. (११)
ebook converter DEMO Watermarks*