अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextस्त्रियश्च सर्वाः स्वापय शुनश्चेन्द्रसखा चरन्.. (२)
भूमि पर वायु अधिक न चले अर्थात् तेज हवा के कारण लोगों की नींद न टूटे. सोए हुए
व्यक्तियों में से कोई भी दूसरों को न देख सके. हे इंद्र के मित्र वायु! तुम प्राण वायु के रूप में
शरीर में वर्तमान रह कर सभी समीपवर्ती स्त्रियों और कुत्तों को सुला दो. (२)
प्रोष्ठेशयास्तल्पेशया नारीर्या वह्यशीवरीः.
स्त्रियो याः पुण्यगन्धयस्ताः सर्वाः स्वापयामसि.. (३)
जो स्त्रियां आंगन में अथवा पलंग पर सो रही हैं अथवा जो स्त्रियां झूले आदि में सोने
की अभ्यस्त हैं और उत्तम गंध वाली हैं, उन सब को मैं सुलाता हूं. (३)
एजदेजदजग्रभं चक्षुः प्राणमजग्रभम्.
अङ्गान्यजग्रभं सर्वा रात्रीणामतिशर्वरे.. (४)
सभी गतिशील प्राणियों को मैं ने सुला दिया. उन के नेत्र और नासिका निद्रा द्वारा गृहीत
हैं. उन के हस्त, चरण आदि को भी मैं ने निद्रा मग्न करा दिया है. यह सब मध्य रात्रि के समय
किया है, जब अंधकार की अधिकता होती है. (४)
य आस्ते यश्चरति यश्च तिष्ठन् विपश्यति.
तेषां सं दध्मो अक्षीणि यथेदं हर्म्यं तथा.. (५)
हमारे संचरण के समय जो मार्ग में बैठा है तथा जो ठहर कर देख रहा है, मैं उन सब की
आंखें इस प्रकार बंद करता हूं, जिस प्रकार दिखाई देने वाला यह भवन देखने में असमर्थ है.
(५)
स्वप्तु माता स्वप्तु पिता स्वप्तु श्वा स्वप्तु विशपतिः.
स्वपन्त्वस्यै ज्ञातयः स्वप्त्वयमभितो जनः.. (६)
जिस स्त्री को निद्रित कर के हम वश में करने के इच्छुक हैं, उस की माता सब से पहले
सो जाए. इस के पश्चात उस का पिता, घर की रक्षा करने वाला कुत्ता और घर का स्वामी उस
का पति भी सो जाए. उस के बंधुबांधव एवं उस के घर की रक्षा के लिए नियुक्त चारों ओर
स्थित जन भी सो जाएं. (६)
स्वप्न स्वप्नाभिकरणेन सर्वं नि ष्वापया जनम्.
ओत्सूर्यमन्यान्त्स्वापायाव्युषं जागृतादहमिन्द्र इवारिष्टो अक्षितः.. (७)
हे स्वप्न के देव! शय्या आदि पर सोने वाले इन जनों को तथा अन्य व्यक्तियों को सूर्योदय
तक निद्रा मग्न रखो. सब के सो जाने पर हिंसा और क्षय से रहित हो कर इंद्र के समान मैं
भोग में संलग्न रहूं एवं जागरण करूं. (७)
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