अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त-६ देवता—ब्राह्मण आदि
ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः.
स सोमं प्रथमः पपौ स चकारारसं विषम्.. (१)
सर्पों में सब से पहले तक्षक उत्पन्न हुआ, जो मनुष्यों में ब्राह्मण के समान सर्पों में पूज्य
था. उस के दस शीश और दस मुख थे. क्षत्रिय आदि जातियों वाले सर्पों से पहले उत्पन्न होने
के कारण तक्षक ने सब से पहले स्वर्गलोक में स्थित अमृत पिया. सोम अर्थात् अमृत पीने
वाला ब्राह्मण तक्षक कंद मूल आदि से उत्पन्न रस को विष के प्रभाव से हीन बनाए. (१)
यावती द्यावापृथिवी वरिम्णा यावत् सप्त सिन्धवो वितष्ठिरे.
वाचं विषस्य दूषणीं तामितो निरवादिषम्.. (२)
धरती और आकाश का जितना विस्तार है तथा सागर जितने परिमाण में स्थित है, मैं
इन दोनों स्थानों में स्थित कंद, मूल, फल से उत्पन्न विष को नष्ट करने वाले मंत्रों से युक्त वाणी
का उच्चारण करता हूं. (२)
सुपर्णस्त्वा गरुत्मान् विष प्रथममावयत्.
नामीमदो नारूरुप उतास्मा अभवः पितुः.. (३)
हे विष! सब से पहले सुंदर पंखों वाले गरुड़ ने तुम्हें खाया था. इस कारण तू इस पुरुष
को मतवाला मत बना एवं विमूढ़ मत कर. हे विष! तू इस के लिए अन्न बन जा. (३)
यस्त आस्यत् पञ्चाङ्गुरिर्वक्राच्चिदधि धन्वनः.
अपस्कम्भस्य शल्यान्निरवोचमहं विषम्.. (४)
पांच अंगुलियों वाले जिस हाथ ने डोरी चढ़े हुए होने के कारण झुके हुए धनुष के द्वारा
पुरुष के शरीर में विष को पहुंचाया है, उस हाथ को मैं सुपारी वृक्ष के टुकड़े से मंत्रों की
सहायता से प्रभावहीन करता हूं. (४)
शल्याद् विषं निरवोचं प्राञ्जनादुत पर्णधेः.
अपाष्ठाच्छृङ्गात् कुल्मलान्निरवोचमहं विषम्.. (५)
बाणों में लगे फल से जिस विष ने शरीर में प्रवेश किया, उसे मैं मंत्र बल से बाहर
निकालता हूं. विषैले पत्तों वाले वृक्ष से, लेप से, पत्तों से, पशु के सींग से एवं मल से जो विष
उत्पन्न हुआ है, उसे मैं अपने मंत्र बल से शरीर से अलग करता हूं. (५)
अरसस्त इषो शल्यो ऽ थो ते अरसं विषम्.
उतारसस्य वृक्षस्य धनुष्टे अरसारसम्.. (६)
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