अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.
The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.
The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.
हे पाठा नामक जड़ीबूटी! मैं तेरी कृपा से अपनी सौतों को पराजित करने वाली बनूं
और तू भी शत्रुओं का तिरस्कार करने में समर्थ हो. इस प्रकार हम दोनों शत्रुओं को पराजित
करने वाली बनें. मैं अपनी सौत को पराजित करूं. (५)
अभि ते ऽ धां सहमानामुप ते ऽ धां सहीयसीम्.
मामुन प्र ते मनो वत्सं गौरिव धावतु पथा वारिव धावतु.. (६)
हे सौत! मैं तेरे पलंग के चारों ओर तथा पलंग के ऊपर इस पराजित करने वाली पाठा
नाम की जड़ीबूटी को रखती हूं. थनों से दूध टपकाती हुई गाय जिस प्रकार बछड़े की ओर
दौड़ती है तथा जल जिस प्रकार नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार तू मेरे पीछेपीछे चल.
(६)
सूक्त-१९ देवता—इंद्र
संशितं म इदं ब्रह्म संशितं वीर्यं १ बलम्.
संशितं क्षत्रमजरमस्तु जिष्णुर्येषामस्मि पुरोहितः.. (१)
मेरा ब्राह्मणत्व जाति से पतित करने वाले दोष का विनाश करने में प्रबल हो. मंत्र के
प्रभाव से उत्पन्न मेरी शक्ति और मेरा शारीरिक बल अमोघ अर्थात् कभी असफल न होने
वाला बने. मैं जिस का पुरोहित हूं, वह क्षत्रिय जाति जय प्राप्त करने वाली तथा वृद्धावस्था से
रहित बने. (१)
समहमेषां राष्ट्रं स्यामि समोजो वीर्यं १ बलम्.
वृश्चामि शत्रूणां बाहुननेन हविषाऽहम्.. (२)
मैं जिस राजा के राज्य में निवास करता हूं, उस राज्य को मैं समृद्ध बनाता हूं. मैं अपने
मंत्रों के प्रभाव से अपने राजा को शारीरिक शक्ति तथा हाथी, घोड़ा आदि से युक्त बनाता हूं.
अग्नि में हवन किए जाते हुए इस हवि के द्वारा मैं अपने राजा के शत्रुओं की भुजाओं को
छिन्नभिन्न करता हूं. (२)
नीचैः पद्यन्तामधरे भवन्तु ये नः सूरिं मघवानं पृतन्यान्.
क्षिणामि ब्रह्मणामित्रान्नुन्नयामि स्वानहम्.. (३)
हमारे राजा कार्य और अकार्य को जानने वाले तथा अधिक धन वाले हैं. जो शत्रु हमारे
ऐसे राजा को पराजित करने की इच्छा से सेना एकत्र करते हैं, हमारे राजा के वे शत्रु नीचे की
ओर मुंह कर के गिरें और पैरों से कुचले जाएं. इस प्रयोजन की सिद्धि के निमित्त मैं असफल
न होने वाले मंत्रों के द्वारा अपने राजा के शत्रुओं को क्षीण करता हूं और अपने राजा को
विजय दिलाता हूं. (३)
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तीक्ष्णीयांसः परशोरग्नेस्तीक्ष्णतरा उत.
इन्द्रस्य वज्रात् तीक्ष्णीयांसो येषामस्मि पुरोहितः.. (४)
मैं जिन राजाओं का पुरोहित हूं, वे तेज धार वाले फरसे से भी अधिक शत्रु के छेदन में
समर्थ हों तथा अग्नि से अधिक शत्रु सेना को भस्म करने वाले बनें. वे राजा इंद्र के वज्र से भी
अधिक तीक्ष्ण बनें अर्थात् उन की गति कहीं रुके नहीं. (४)
एषामहमायुधा सं स्याम्येषां राष्ट्रं सुवीरं वर्धयामि.
एषां क्षत्रमजरमस्तु जिष्णवे ३ षां चित्तं विश्वे ऽ वन्तु देवाः.. (५)
मैं अपने राजाओं के आयुधों को तेज धार वाला बनाता हूं तथा इन के राज्य को शोभन
वीरों से युक्त करता हूं. इन का शारीरिक बल, बुढ़ापे से रहित तथा शत्रुओं को जीतने वाला
हो. इन के युद्धोन्मुख मन की सभी देव रक्षा करे. (५)
उद्धर्षन्तां मघवन् वाजिनान्युद् वीराणां जयतामेतु घोषः.
पृथग् घोषा उलुलयः केतुमन्त उदीरताम्.
देवा इन्द्रज्येष्ठा मरुतो यन्तु सेनया.. (६)
हे इंद्र! तुम्हारी कृपा से हमारी हाथियों, घोड़ों और रथों वाली सेना युद्ध में हर्षित रहे.
विजय प्राप्त करने वाले हमारे वीरों का जयघोष शत्रुओं के कानों को बहरा बनाता हुआ उठे.
सब से पृथक् एवं सभी के द्वारा जाने गए जयघोष फैलें. इंद्र जिन में सब से बड़े हैं, ऐसे मरुत्
युद्ध में हमारी सहायता करने के लिए अपनी सेना ले कर आएं. (६)
प्रेता जयता नर उग्रा वः सन्तु बाहवः.
तीक्ष्णेषवो ऽ बलधन्वनो हतोग्रायुधा अबलानुग्रबाहवः.. (७)
हे सैनिको! युद्ध भूमि की ओर बढ़ो तथा देवों की कृपा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो.
तेज धार वाले आयुधों को धारण करने वाली तुम्हारी भुजाएं शक्तिशालिनी बनें और शक्ति
रहित आयुधों को धारण करने वाले तथा बलहीन शत्रुओं का विनाश करें. (७)
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसंशिते.
जयामित्रान् प्र पद्यस्व जह्येषां वरंवरं मामीषां मोचि कश्चन.. (८)
हे बाण! तू मंत्रों के द्वारा तीक्ष्ण बनाया गया है तथा शत्रुओं के विनाश में कुशल है. तू
हमारे धनुष से छूट कर शत्रु सेना की ओर जा कर गिर और उन के शरीर में प्रवेश कर के उन
की उत्तम सेना का विनाश कर. शत्रु सैनिकों में से कोई भी बचने न पाए. (८)
सूक्त-२० देवता—अग्नि
अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः.
तं जानन्नग्न आ रोहाधा नो वर्धया रयिम्.. (१)
हे अग्नि देव! यह अरणि अथवा यजमान तेरी उत्पत्ति का कारण बने. जिस से उत्पन्न
हो कर तुम दीप्त होते हो, अपने उस उत्पत्ति कारण को जानते हुए उस में प्रवेश करो. इस के
पश्चात तुम हमारे धन की वृद्धि करो. (१)
अग्ने अच्छा वदेह नः प्रत्यङ् नः सुमना भव.
प्र णो यच्छ विशां पते धनदा असि नस्त्वम्.. (२)
हे अग्नि देव! हमारे सामने हो कर हमें प्राप्त होने वाले फल को प्रिय कहो तथा हमारे
सामने आ कर प्रसन्न मन वाले बनो. हे वैश्वानर रूप से प्रजापालक अग्नि! हमें अपेक्षित धन
प्रदान करो, क्योंकि तुम ही हमारे धनदाता हो. (२)
प्र णो यच्छत्वर्यमा प्र भगः प्र बृहस्पतिः.
प्र देवीः प्रोत सूनृता रयिं देवी दधातु मे.. (३)
अर्यमा, भग और बृहस्पति देव, हमें धन प्रदान करें. इंद्राणी आदि देवियां तथा प्रिय
वाणी वाली सरस्वती देवी हमें धन प्रदान करें. (३)
सोमं राजानमवसे ऽ ग्निं गीर्भिर्हवामहे.
आदित्यं विष्णुं सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्.. (४)
हम तेजस्वी सोम और अग्नि को स्तुति रूपी वचनों के द्वारा यहां बुलाते हैं. वे हमारा
मनचाहा फल दे कर हमारी रक्षा करें. हम अदिति के पुत्र, मित्र और वरुण को, सब के प्रेरक
सूर्यं को तथा इन सभी देवों को बनाने वाले ब्रह्मा को तथा देवों के हितकारक बृहस्पति को
बुलाते हैं. (४)
त्वं नो अग्ने अग्निभिर्ब्रह्म यज्ञं च वर्धय.
त्वं नो देव दातवे रयिं दानाय चोदय.. (५)
हे अग्नि! तुम अन्य अग्नियों के साथ मिल कर हमारी मंत्रों वाली स्तुति को और
स्तुतियों द्वारा साध्य यज्ञ को सफल करो. हे अग्नि देव! हवि देने वाले हमारे यजमान को हमें
धन देने के लिए प्रेरित करो. (५)
इन्द्रवायू उभाविह सुहवेह हवामहे.
यथा नः सर्व इज्जनः संगत्यां सुमना असद् दानकामश्च नो भुवत्.. (६)
इंद्र और अग्नि सुखपूर्वक बुलाए जा सकते हैं, इसलिए हम इस यज्ञ में उन का आह्वान
करते हैं. हम इस कारण उन का आह्वान करते हैं कि हमारे सभी जन उन की संगति से
शोभन मन वाले बनें तथा हमें दान देने की इच्छा करे. (६)
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अर्यमणं बृहस्पतिमिन्द्रं दानाय चोदय.
वातं विष्णुं सरस्वतीं सवितारं च वाजिनम्.. (७)
हे स्तोता! तुम अर्यमा, बृहस्पति, इंद्र, वाणी रूपी सरस्वती एवं वेग वाले सविता देव को
हमें धन देने के लिए प्रेरित करो. (७)
वाजस्य नु प्रसवे सं बभूविमेमा च विश्वा भुवनान्यन्तः.
उतादित्सन्तं दापयतु प्रजानन् रयिं च नः सर्ववीरं नि यच्छ.. (८)
हम अन्न उत्पन्न करने वाले कर्म को शीघ्र प्राप्त करे. दिखाई देने वाले सभी प्राणी वाज
प्रसव अर्थात् वृष्टि द्वारा अन्न पैदा करने वाले देव के मध्य निवास करते हैं. सभी प्राणियों के
हृदय के अभिप्राय को जानने वाले वाज-प्रसव देव दान न करने वाले मुझ पुरुष को धन दान
करने की प्रेरणा दें तथा हमारे धन को पुत्र, पौत्र आदि से युक्त करें. (८)
दुहां मे पञ्च प्रदिशो दुहामुर्वीर्यथाबलम्.
प्रापेयं सर्वा आकूतीर्मनसा हृदयेन च.. (९)
पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं इन की मध्यवर्ती दिशा—इस प्रकार पांच दिशाएं, पृथ्वी,
आकाश, दिन, रात, जल, तथा जड़ीबूटियां मुझे अभिमत फल दें. मैं हृदय और अंतःकरण से
उत्पन्न संकल्पों को प्राप्त करूं. (९)
गोसनिं वाचमुदेयं वर्चसा माभ्युदिहि.
आ रुन्धां सर्वतो वायुस्त्वष्टा पोषं दधातु मे.. (१०)
मैं सभी प्रकार के धन देने वाली वाणी का उच्चारण करता हूं. हे वाणी रूपी देवी! तुम
अपने तेज से मेरा मनचाहा फल देने के लिए आओ. वायु सभी ओर से मेरे प्राणों को
आच्छादित करे तथा त्वष्टा देव मेरे शरीर को पुष्ट बनाएं. (१०)
सूक्त-२१ देवता—अग्नि
ये अग्नयो अप्स्व १ न्तर्ये वृत्रे ये पुरुषे ये अश्मसु.
य आविवेशोषधीर्यो वनस्पतींस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (१)
मेघों में रहने वाली विद्युत रूपी अग्नि को, जलों में वाडव के रूप में निवास करने वाली
अग्नि को, मनुष्यों के शरीर में वैश्वानर के रूप में रहने वाली अग्नि को, सूर्यकांत आदि
मणियों में गेहूं, जौ, आदि फसलों में तथा वृक्षों में रहने वाली अग्नि को यह हवि प्राप्त हो.
(१)
यः सोमे अन्तर्यो गोष्वन्तर्य आविष्टो वयःसु यो मृगेषु.
य आविवेश द्विपदो यश्चतुष्पदस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (२)
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जो अग्नि सोमलता में अमृत रस का परिपाक करने के लिए रहती है, जो अग्नि गाय,
भैंस आदि पशुओं में निवास कर के उन के दूध को परिपक्व करती है, जो अग्नि पक्षियों और
पशुओं में प्रविष्ट है तथा जो अग्नि मनुष्यों और चौपायों में व्याप्त है. मेरे द्वारा दिया हुआ हवि
उसे प्राप्त हो. (२)
य इन्द्रेण सरथं याति देवो वैश्वानर उत विश्वदाव्यः.
यं जोहवीमि पृतनासु सासहिं तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (३)
दान आदि गुण वाले जो अग्नि देव इंद्र के साथ एक रथ में बैठ कर गमन करते हैं, जो
अग्नि मनुष्यों में वैश्वानर तथा विश्व को जलाने वाले दावाग्नि हैं, जो अग्नि देव युद्धों में शत्रु
को पराजित करने वाले हैं, उन सभी अग्नियों को मेरा हवि प्राप्त हो. (३)
यो देवो विश्वाद् यमु काममाहुर्यं दातारं प्रतिगृह्णन्तमाहुः.
यो धीरः शक्रः परिभूरदाभ्यस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (४)
जो अग्नि देव सब का भक्षण करने वाले हैं, जिन्हें कामना करने योग्य तथा मनचाहा
फल देने वाला कहा जाता है, जो अग्नि देव, बुद्धिमान, सभी कार्य करने में समर्थ, शत्रुओं को
पराजित करने वाले तथा किसी से पराजित न होने वाले हैं, उन्हें मेरी आहुति प्राप्त हो. (४)
यं त्वा होतारं मनसाभि संविदुस्त्रयोदश भौवनाः पञ्च मानवाः.
वर्चोधसे यशसे सूनृतावते तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (५)
जिस से प्राणी सत्ता प्राप्त करते हैं, उस संवत्सर के तेरह महीने, मनु के द्वारा सृष्टि की
आदि में कल्पित वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, पांच ऋतुएं तुम्हें देवों का आह्वान करने
वाला जानते हैं, उस तेजस्वी, यशस्वी और प्रिय वाणी वाले अग्नि को यह हवि प्राप्त हो. (५)
उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे.
वैश्वानरज्येष्ठेभ्यस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (६)
वृषभ जिन के हवि रूपी अन्न हैं, बांझ गाएं जिन का हवि हैं, सोम जिन की पीठ पर
रहता है तथा जो आहुति के द्वारा सारे जगत् के विधाता हैं और वैश्वानर अग्नि जिन में सब से
बड़े हैं, उन सभी अग्नियों को मेरा हव्य प्राप्त हो. (६)
दिवं पृथिवीमन्वन्तरिक्षं ये विद्युतमनुसंचरन्ति.
ये दिक्ष्व १ न्तर्ये वाते अन्तस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (७)
जो अग्नि देव आकाश, पृथ्वी और इन के मध्य भाग में व्याप्त हैं, जो बादलों में स्थित
बिजली में संचरण करते हैं, जो अग्नि तीनों लोकों में व्याप्त दिशाओं में वर्तमान हैं तथा सारे
जगत् के आधार वायु में संचरण करते हैं, उन सभी को मेरी आहुति प्राप्त हो. (७)
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हिरण्यपाणिं सवितारमिन्द्रं बृहस्पतिं वरुणं मित्रमग्निम्.
विश्वा॒न् देवानङ्गिरसो हवामह इमं क्रव्यादं शमयन्त्वग्निम्.. (८)
स्तोताओं को देने के लिए जिन के हाथ में सुवर्ण रहता है, ऐसे सविता, बृहस्पति, वरुण,
इंद्र तथा अग्नि का और विश्वे देवों का मैं अंगिरा ऋषि आह्वान करता हूं. वे इस मांस खाने
वाली अग्नि को शांत करें. (८)
शान्तो अग्निः क्रव्याच्छान्तः पुरुषरेषणः.
अथो यो विश्वदाव्य १ स्तॄं क्रव्यादमशीशमम्.. (९)
मांस भक्षक अग्नि सविता आदि देवों की कृपा से शांत हों. पुरुषों की हिंसा करने वाली
अग्नि भी सुखकारी हों. जो सब को जलाने वाली और मांस भक्षक अग्नि है, उस को मैं ने
शांत कर दिया है. (९)
ये पर्वताः सोमपृष्ठा आप उत्तानशीवरीः.
वातः पर्जन्य आदग्निस्ते क्रव्यादमशीशमन्.. (१०)
सोमलता जिन के ऊपर वर्तमान है, ऐसे मुंजवान आदि पर्वत के ऊपर शयन करने वाले
जल, वायु और बादलों ने मांसभक्षक अग्नि को शांत कर दिया है. (१०)
सूक्त-२२ देवता—विश्वे देव
हस्तिवर्चसं प्रथतां बृहद् यशो अदित्या यत् तन्वः संबभूव.
तत् सर्वे समदुर्मह्यमेतद् विश्वे देवा अदितिः सजोषाः.. (१)
हम में हाथी के समान अपराजेय एवं प्रसिद्ध बल हो. देवमाता अदिति के शरीर से जो
महान एवं प्रसिद्ध तेज उत्पन्न हुआ है, सभी देव, अदिति के साथ मिल कर मुझे वह तेज और
यश प्रदान करें. (१)
मित्रश्च वरुणश्चेन्द्रो रुद्रश्च चेततु.
देवासो विश्वधायसस्ते माज्जन्तु वर्चसा.. (२)
दिन के स्वामी इंद्र, रात्रि के स्वामी वरुण, स्वर्ग के अधिपति इंद्र और सब का संहार
करने वाले रुद्र मुझे अनुग्रह करने योग्य समझें. सारे संसार का पोषण करने वाले मित्र आदि
देव मुझे तेजस्वी बनाएं. (२)
येन हस्ती वर्चसा संबभूव येन राजा मनुष्येष्वप्स्व १ न्तः.
येन देवा देवतामग्र आयन् तेन मामद्य वर्चसाग्ने वर्चस्विनं कृणु.. (३)
जिस तेज से हाथी विशालकाय बनता है, जिस तेज से राजा मनुष्यों में तेजस्वी होता है,
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जिस तेज से जल में प्राणी तेजस्वी बनते हैं अथवा जिस तेज से आकाश में गंधर्व आदि
तेजस्वी बनते हैं तथा सृष्टि के आदि में जिस तेज के कारण इंद्र आदि ने देवत्व प्राप्त किया, हे
अग्नि, उस संपूर्ण तेज से इस समय मुझे तेजस्वी बनाओ. (३)
यत् ते वर्चो जातवेदो बृहद् भवत्याहुतेः.
यावत् सूर्यस्य वर्च आसुरस्य च हस्तिनः.
तावन्मे अश्विना वर्च आ धत्तां पुष्करस्रजा.. (४)
हे जन्म लेने वाले प्राणियों के ज्ञाता तथा आहुतियों द्वारा हवन किए जाते हुए अग्नि
देव! तुम में जितना तेज है, सूर्य में जितना तेज है तथा असुरों के हाथों में जितना तेज है,
उतना ही तेज कमल की माला से सुशोभित अश्विनीकुमार मुझ में धारण करें. (४)
यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत् समश्नुते.
तावत् समैत्विन्द्रियं मयि तद्भ्रस्तिवर्चसम्.. (५)
चारों दिशाएं जितने स्थान को व्याप्त करती हैं तथा रूप को ग्रहण करने वाले नेत्र
जितने नक्षत्रों को देखते हैं, परम ऐश्वर्य वाले इंद्र का असाधारण चिह्न तथा पूर्वोक्त देवों का
तेज हमें प्राप्त हो. (५)
हस्ती मृगाणां सुषदामतिष्ठावान् बभूव हि.
तस्य भगेन वर्चसा ऽ भि षिञ्चामि मामहम्.. (६)
वन में स्वेच्छा से रहने वाले हरिण आदि पशुओं के मध्य जंगली हाथी अपने बल की
अधिकता के कारण राजा होता है. उस हाथी के भाग्य रूपी तेज से मैं अपनेआप को सींचता
हूं. (६)
सूक्त-२३ देवता—योनि
येन वेहद् बभूविथ नाशयामसि तत् त्वत्.
इदं तदन्यत्र त्वदप दूरे नि दध्मसि.. (१)
हे स्त्री! जिस पाप से जनित रोग के कारण तू बांझ हुई है, उस पाप को हम तुझ से दूर
करते हैं. यह पाप रोग तुझे दुबारा न हो जाए, इसलिए हम इसे दूर देश में पहुंचाते हैं. (१)
आ ते योनिं गर्भ एतु पुमान् बाण इवेषुधिम्.
आ वीरो ऽ त्र जायतां पुत्रस्ते दशमास्यः.. (२)
हे स्त्री! बाण जिस प्रकार स्वाभाविक रूप से तरकश में पहुंच जाता है, उसी प्रकार
पुरुष के वीर्य से युक्त गर्भ तेरे जननांग में पहुंचे. वह गर्भ दस मास के पश्चात पुत्र के रूप में
परिवर्तित हो कर तथा सशक्त बन कर जन्म ले. (२)
पुमांसं पुत्रं जनय तं पुमाननु जायताम्.
भवासि पुत्राणां माता जातानां जनयाश्च यान्.. (३)
हे स्त्री! तू पुत्र को जन्म दे. उस पुत्र की पत्नी से पुत्र ही उत्पन्न हो. इस प्रकार अविछिन्न
रूप से उत्पन्न पुत्रों की भी तू माता होगी. उन के जो पुत्र होंगे, उन की भी तू माता होगी. (३)
यानि भद्राणि बीजान्युषभा जनयन्ति च.
तैस्त्वं पुत्रं विन्दस्व सा प्रसूर्धेनुका भव.. (४)
हे नारी! बैल जिस प्रकार अपने अमोघ वीर्य से गायों में बछड़े उत्पन्न करता है, उसी
प्रकार तू अमोघ वीर्य से उत्पन्न पुत्रों को प्राप्त कर. तू प्रसूता हो कर पुत्रों के साथ वृद्धि को
प्राप्त हो. (४)
कृणोमि ते प्राजापत्यमा योनिं गर्भ एतु ते.
विन्दस्व त्वं पुत्रं नारि यस्तुभ्यं शमसच्छमु तस्मै त्वं भव.. (५)
हे स्त्री! ब्रह्मा ने वृषभ संबंधी जो व्यवस्था की है, उस के अनुसार मैं तेरे लिए
संतानोत्पत्ति संबंधी कर्म करता हूं. गर्भ तेरी योनि में जाए. उस के पश्चात तू पुत्र प्राप्त करे,
वह पुत्र तेरे लिए सुख प्रदान करे तथा तू भी उस के लिए सुख का कारण बने. (५)
यासां द्यौष्पिता पृथिवी माता समुद्रो मूलं वीरुधां बभूव.
तास्त्वा पुत्रविद्याय दैवी: प्रावन्त्वोषधय:.. (६)
जिन वृक्षों का पिता आकाश और माता पृथ्वी है, जलराशि उन की वृद्धि का मूल कारण
है. वृक्षों के रूप में वे दिव्य जड़ीबूटियां पुत्र लाभ के लिए तेरी रक्षा करें. (६)
सूक्त-२४ देवता—वनस्पति
पयस्वतीरोषधय: पयस्वन्मामकं वच:.
अथो पयस्वतीनामा भरे ऽ हं सहस्रश:.. (१)
मेरे जौ, गेहूं आदि अन्न सारयुक्त हों तथा मेरा वचन भी सारयुक्त हो. मैं उन सार वाली
फसलों से उत्पन्न धान्य को अनेक प्रकार से प्राप्त करूं. (१)
वेदाहं पयस्वन्तं चकार धान्यं बहु.
सम्भृत्वा नाम यो देवस्तं वयं हवामहे यो यो अयज्वनो गृहे.. (२)
मैं उस सार वाले देव को जानता हूं. उस ने जौ, गेहूं आदि की वृद्धि की है. भौरे के
समान संग्रह करने वाले जो देव हैं, उन का मैं स्तुतियों के द्वारा आह्वान करता हूं. यज्ञ करने
वाले के घर में जो जौ, गेहूं आदि धान्य है, देव उसे एकत्र कर के मुझे प्रदान करें. (२)
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इमा याः पञ्च प्रदिशो मानवीः पञ्च कृष्टयः.
वृष्टे शापं नदीरिवेह स्फातिं समावहान्.. (३)
पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और इन की मध्यवर्ती—ये पांच दिशाएं तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य, शूद्र और निषाद—ये पांच जातियां इस यजमान के धनधान्य की उसी प्रकार वृद्धि करें,
जिस प्रकार वर्षा का जल प्रवाह में पड़े हुए जलों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता
है. (३)
उदुत्सं शतधारं सहस्रधारमक्षितम्.
एवास्माकेदं धान्यं सहस्रधारमक्षितम्.. (४)
जल की उत्पत्ति का स्थान सौ अथवा हजार धाराओं वाला होने पर भी कभी क्षीण नहीं
होता है, इसी प्रकार हमारा यह धान्य अनेक प्रकार से हजार धाराओं वाला हो कर क्षय रहित
बने. (४)
शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर.
कृतस्य कार्यस्य चेह स्फातिं समावह.. (५)
हे सौ हाथों वाले देव! तुम अपनी भुजाओं से धन एकत्र करो तथा हजार हाथों से ला
कर हमें धन दो. इस के पश्चात अपने द्वारा दिए हुए धन से मुझे समृद्ध बनाओ. (५)
तिस्रो मात्रा गन्धर्वाणां चतस्रो गृहपत्नयाः.
तासां या स्फातिमत्तमा तया त्वाभि मृशामसि.. (६)
विश्वावसु आदि गंधर्वों की संपन्नता के कारण हैं—उन की तीन कलाएं. उन की चार
अप्सरा रूपी पत्नियां हैं. हे धान्य! पत्नियों में जो अतिशय समृद्ध है, उस से हम तेरा स्पर्श
कराते हैं. (६)
उपोहश्च समूहश्च क्षत्तारौ ते प्रजापते.
ताविहा वहतां स्फातिं बहुं भूमानमक्षितम्.. (७)
हे प्रजापति! उपोह नाम का देव और धन की वृद्धि करने वाले देवों का समूह—ये दोनों
तुम्हारे सारथी हैं. अनेक प्रकार के तथा क्षय रहित धन धान्य को एवं समृद्धि को ये हमारे
समीप लाएं. (७)
सूक्त-२५ देवता—कामेषु
उत्तुदस्तवोत् तुदतु मा धृथाः शयने स्वे.
इषुः कामस्य या भीमा तया विध्यामि त्वा हृदि.. (१)
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हे नारी! उत्तुद नाम के देव अत्यधिक व्यथित करने वाले हैं. वे तुझे कामार्ता करें. मदन
विकारों से व्यथित हो कर तू अपने पलंग पर सोना पसंद मत कर. कामदेव का जो भयानक
बाण है, उस से मैं तेरे हृदय को ताड़ित करता हूं. (१)
आधीपर्णां कामशल्यामिषुं सङ्कल्पकुल्मलाम्.
तां सुसन्नतां कृत्वा कामो विध्यतु त्वा हृदि.. (२)
मन का कामोन्माद जिस का पर्ण अर्थात् पीछे वाला भाग है और रमण करने की
अभिलाषा जिस का फल अर्थात् आगे वाला भाग है तथा भोग विषयक संकल्प जिस के
दोनों भागों को जोड़ने वाला द्रव्य है, इस प्रकार के बाण को अपने धनुष पर रख कर कामदेव
तेरे हृदय का वेधन करें. (२)
या प्लीहानं शोषयति कामस्येषुः सुसन्नता.
प्राचीनपक्षा व्योषा तया विध्यामि त्वा हृदि.. (३)
कामदेव के द्वारा भलीभांति खींचा गया बाण प्राणों के आश्रय प्लीहा को जलाता है. हे
नारी! मैं सीधे पंखों वाले तथा अनेक प्रकार से दहन करने वाले उस बाण से तेरे हृदय का
वेधन करता हूं. (३)
शुचा विद्धा व्योषया शुष्कास्याभि सर्प मा.
मृदुनिर्मन्युः केवली प्रियवादिन्यनुव्रता.. (४)
दाह करने वाले तथा शोकात्मक बाण से घायल होने के कारण तेरा कंठ सूख जाए और
उस कंठ के कारण अपना अभिप्राय प्रकट करने में असमर्थ हो कर तू मेरे समीप आ. तू
मृदुभाषिणी, एकमात्र मुझ से रक्षा पाने वाली तथा मेरे अनुकूल बोलने वाली बन और मेरे
अनुकूल आचरण कर. (४)
आजामि त्वाजन्या परि मातुरथो पितुः.
यथा मम क्रतावसो मम चित्तमुपायसि.. (५)
हे नारी! मैं कोड़े से मार कर तुझे अपने अभिमुख करता हूं. मैं वहां से तुझे अपने समीप
बुलाता हूं, जिस से तू मेरे संकल्प को पूरा करे और मेरी बुद्धि के अनुसार चले. (५)
व्यस्यै मित्रावरुणौ हृदश्चित्तान्यस्यतम्.
अथैनामक्रतुं कृत्वा ममैव कृणुतं वशे.. (६)
हे मित्र और वरुण! इस स्त्री के हृदय को ज्ञानशून्य कर दो. इस के पश्चात इसे कर्तव्य
और अकर्तव्य के ज्ञान से शून्य कर के मेरे वशीभूत बना दो. (६)
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सूक्त-२६ देवता—अग्नि
ये ३ स्यां स्थ प्राच्यां दिशि हेतयो नाम देवास्तेषां वो अग्निरिषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (१)
हे दान आदि गुण युक्त गंधर्वो! तुम हमारे निवास स्थान से पूर्व दिशा में हमारे विरोधियों
को मारने वाले बनो. तुम्हारे अग्नि तुल्य बाण उन पूर्व दिशा के निवासियों से हमारी रक्षा करने
में समर्थ हों. वे हमें सुखी करें. तुम्हारे बाण सर्प, बिच्छू आदि शत्रुओं को हम से दूर रखें. तुम
हमें अपना कहो. हम तुम्हें नमस्कार करते और आहुति देते हैं. (१)
ये ३ स्यां स्थ दक्षिणायां दिश्यविष्ववो नाम देवास्तेषां वः काम इषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (२)
हे दान आदि गुणों से युक्त गंधर्वो! तुम हमारे निवास स्थान से दक्षिण दिशा में हमारे
विरोधियों से हमारे रक्षक बनो. हमारी अभिलाषा ही तुम्हारा बाण है, वह हमारी रक्षा करे.
तुम हमें अपना कहो. हम तुम्हें नमस्कार करें और आहुति देते रहें. (२)
ये ३ स्यां स्थ प्रतीच्यां दिशि वैराजा नाम देवास्तेषां व आप इषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (३)
हे देवो! तुम पश्चिम दिशा में हमें अन्न देने वाले बनो. वर्षा के जल तुम्हारे बाण हैं. वे
हमारी रक्षा करें. तुम हमें अपना बनाओ. तुम्हें हम नमस्कार करते हैं और आहुति देते हैं. (३)
ये ३ स्यां स्थोदीच्यां दिशि प्रविध्यन्तो नाम देवास्तेषां वो वात इषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (४)
हे दान आदि गुणों से युक्त गंधर्वो! तुम उत्तर दिशा में हमारी हिंसा करने वालों को मारने
वाले बनो. वायु ही तुम्हारा बाण है, वह हमारी रक्षा करे. तुम हमें अपना कहो. हम तुम्हें
नमस्कार करते हैं और आहुति देते हैं. (४)
ये ३ स्यां स्थ ध्रुवायां दिशि निलिम्पा नाम देवास्तेषां व ओषधीरिषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (५)
हे दान आदि गुणों से युक्त गंधर्वो! तुम ध्रुव दिशा में अर्थात् पृथ्वी पर हमारी रक्षा करने
वाले बनो. जौ, गेहूं, पेड़, पौधे आदि तुम्हारे बाण हैं. वे हमारी रक्षा करें. तुम हमें अपना कहो.
हम तुम्हें नमस्कार करते हैं और आहुति देते हैं. (५)
ये ३ स्यां स्थोध्र्वायां दिश्यवस्वन्तो नाम देवास्तेषां वो बृहस्पतिरिषवः.
ते नो मृडत ते नो ऽ धि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा.. (६)
हे दान आदि गुणों से युक्त गंधर्वो! इस ऊपर की दिशा में तुम हमारे रक्षक बनो.
बृहस्पति तुम्हारे बाण हैं. वे हमारी रक्षा करें. हम तुम्हें नमस्कार करते हैं और आहुति देते हैं.
(६)
सूक्त-२७ देवता—प्राची
प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (१)
पूर्व दिशा हम पर कृपा करे. अग्नि इस दिशा के अधिपति हैं. काले रंग के सांप उस में
रक्षा करने के लिए स्थित हैं. अदिति के पुत्र धाता, अर्यमा आदि इस दिशा के आयुध हैं. इस
के अधिपति अग्नि, रक्षक काले सांप, धाता अर्यमा आदि आयुधों को मेरा नमस्कार प्रसन्न
करने वाला हो. जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाता है अथवा हम जिस से द्वेष रखते हैं. हे अग्नि
आदि देवो! उसे हम तुम्हारे भोजन के लिए तुम्हारी दाढ़ के नीचे रखते हैं. (१)
दक्षिणा दिगिन्द्रो ऽ धिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (२)
दक्षिण दिशा हम पर कृपा करे. इंद्र इस के अधिपति हैं. टेढ़ेमेढ़े चलने वाले सर्प इस
दिशा के रक्षक हैं. पितर इस दिशा के दुष्टों का निग्रह करने वाले आयुध हैं. इस के अधिपति
इंद्र को, रक्षक टेढ़ेमेढ़े चलने वाले सर्प को और आयुध रूप पितरों को मेरा नमस्कार प्रसन्न
करने वाला हो. जो शत्रु मुझे बाधा पहुंचाता है अथवा मैं जिन से द्वेष रखता हूं, हे इंद्र आदि
देवो! मैं उसे तुम्हारे भक्षण के लिए तुम्हारी दाढ़ में रखता हूं. (२)
प्रतीची दिग् वरुणो ऽ धिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (३)
पश्चिम दिशा हम पर कृपा करे. वरुण इस के अधिपति हैं. कुत्सित शब्द करने वाला
पृदाकू नाम का सर्प इस का रक्षक है और जौ, गेहूं आदि इस दिशा के दुष्टों को वश में करने
वाले बाण हैं. इस के अधिपति वरुण को, रक्षक कुत्सित शब्द करने वाले पृदाकू नाम वाले
सर्प को और जौ तथा गेहूं आदि बाणों को हमारा नमस्कार प्रसन्न करने वाले हो. जो शत्रु हमें
बाधा पहुंचाता है अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं, हे वरुण आदि देवो! हम उसे तुम्हारे
भक्षण के लिए तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (३)
उदीची दिक् सोमोऽधिपतिः स्वजो रक्षिताशनिरिषवः.
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तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (४)
उत्तर दिशा हम पर अनुग्रह करे. सोम इस दिशा के अधिपति अर्थात् स्वामी हैं. स्वयं
उत्पन्न होने वाला सर्प इस का रक्षक है और वज्र इस के दुष्टों को वश में करने वाला बाण है.
इस के अधिपति सोम को, स्वयं उत्पन्न होने वाले रक्षक सर्प को और वज्र रूप बाण को
हमारा नमस्कार प्रसन्न करने वाला हो. जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाते हैं अथवा हम जिन से द्वेष
करते हैं. हे सोम आदि देवो! उन्हें हम तुम्हारे भक्षण के लिए तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (४)
ध्रुवा दिग् विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (५)
नीचे की ओर वाली अर्थात् स्थिर दिशा हम पर अनुग्रह करे. विष्णु इस के अधिपति हैं,
काली गरदन वाला सांप इस का रक्षक है और वृक्ष इस के दुष्ट नाशकारी बाण हैं. इस के
अधिपति विष्णु को, रक्षक काली गरदन वाले सर्प को और आयुध वृक्षों को हमारा नमस्कार
प्रसन्न करने वाला हो. हे विष्णु आदि देवो! जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाते हैं अथवा हम जिन से
द्वेष रखते हैं, उन्हें हम तुम्हारे भक्षण के हेतु तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (५)
ऊर्ध्वा दिग् बृहस्पतिरधिपतिः श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषवः.
तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु.
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (६)
ऊपर वर्तमान दिशा हम पर कृपा करे. बृहस्पति इस के स्वामी हैं, श्वेतवर्ण का सर्प इस
का रक्षक है और वर्षा का जल इस का दुष्ट निवारक आयुध है. हम इस के स्वामी बृहस्पति
को रक्षक श्वेत वर्ण के सर्प को तथा दुष्ट निवारक आयुध वर्षा के जल को नमस्कार करते हैं.
हे बृहस्पति आदि देवो! जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाते हैं अथवा हम जिन से द्वेष रखते हैं, उन्हें
हम तुम्हारे भक्षण के हेतु तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (६)
सूक्त-२८ देवता—अश्विनीकुमार
एकैकयैषा सृष्ट्या सं बभूव यत्र गा असृजन्त भूतकृतो विश्वरूपाः.
यत्र विजायते यमिन्यपर्तुः सा पशून् क्षिणाति रिफती रुशती.. (१)
विधाता के द्वारा बनाई गई यह सृष्टि क्रमशः एकएक कर के उत्पन्न हुई. यहां पृथिवी
आदि तत्त्वों के निर्माता ऋषियों ने अनेक रंगों वाली गायों, मानुषियों और घोड़ियों को उत्पन्न
किया. उत्पत्ति वाली इस सृष्टि में यदि कोई गाय आदि निकृष्ट रज और वीर्य से उत्पन्न जुड़वां
संतान को जन्म देती है, वह यजमान के गाय आदि पशुओं का भक्षण करती हुई और चोर,
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बाघ आदि के द्वारा हिंसा करती हुई विनाश करती है. (१)
एषा पशून्त्सं क्षिणाति क्रव्याद् भूत्वा व्यद्वरी.
उतैनां ब्रह्मणे दद्यात् तथा स्योना शिवा स्यात्.. (२)
दो बच्चों को एक साथ जन्म देने वाली यह गाय मांस खाने वाली एवं दुःख देने वाली के
समान यजमान के अन्य पशुओं का विनाश करती है. यह टोनेटोटके के समान संताप देने
वाली है. इसे ब्राह्मण को दान कर देना चाहिए. ऐसा करने से यह अपनी संतान के द्वारा
यजमान के लिए कल्याणकारिणी बन जाती है. (२)
शिवा भव पुरुषेभ्यो गोभ्यो अश्वेभ्यः शिवा.
शिवास्मै सर्वस्मै क्षेत्राय शिवा न इहैधि.. (३)
हे जुड़वां बच्चों को जन्म देने वाली गाय! तू मनुष्यों, गायों और घोड़ों के लिए
कल्याणकारिणी बन. तू इस देश में हमें सब प्रकार से सुखदायी हो. (३)
इह पुष्टिरिह रस इह सहस्रसातमा भव.
पशून् यमिनि पोषय.. (४)
मेरे यजमान के इस घर में गाय आदि धन पुष्ट हों तथा दूध, दही आदि रस समृद्ध हों. हे
जुड़वां बच्चों को जन्म देने वाली गाय! तू इस यजमान के पशुओं का पोषण कर और इसे
हजारों प्रकार के धन प्रदान कर. (४)
यत्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोगं तन्व १ः स्वायाः.
तं लोकं यमिन्यभिसंबभूव सा नो मा हिंसीत् पुरुषान् पशूंश्च.. (५)
जिस लोक में शोभन हृदय वाले तथा उत्तम कर्म करने वाले पुरुष प्रसन्न होते हैं तथा
ज्वर आदि रोगों का त्याग कर के उन के शरीर पुष्ट होते हैं, वहाँ यदि जुड़वां बच्चों को जन्म
देने वाली गाय सामने आ जाए तो वह हमारे मनुष्यों और पशुओं की हिंसा न करे. (५)
यत्रा सुहार्दां सुकृतामग्निहोत्रहुतां यत्र लोकः.
तं लोकं यमिन्यभिसंबभूव सा नो मा हिंसीत् पुरुषान् पशूंश्च.. (६)
जिस लोक में शोभन हृदय, शोभन ज्ञान और शोभन कर्म वाले अपने शरीर से ज्वर
आदि रोगों का त्याग कर के प्रसन्न होते हैं, वहां जुड़वां बच्चों को जन्म देने वाली गाय आ गई
है. वह हमारे पुरुषों और पशुओं की हिंसा न करे. (६)
सूक्त-२९ देवता—अवि, काम, भूमि
यद् राजानो विभजन्ति इष्टापूर्तस्य षोडशं यमस्यामी सभासदः.
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अविस्तस्मात् प्र मुञ्चति दत्तः शितिपात् स्वधा.. (१)
दक्षिण दिशा के आकाश में दिखाई देने वाले यमराज के सभासद दुष्टों को दंड दें और
धर्मात्माओं का पालन करने में युक्त हों. श्रुतियों में बताए गए यज्ञ आदि और स्मृतियों में
बताए गए वापी, कूप, सरोवर आदि कर्मों के जो सोलह पाप होते हैं, उन्हें यमराज के
सभासद पुण्य से पृथक् करते हैं. उस पाप से यज्ञ में बलि के रूप में दी गई यह सफेद पैरों
वाली भेड़ हमें मुक्त करे. यह भेड़ यमराज के सभासदों के लिए अग्नि हो. (१)
सर्वान् कामान् पूरयत्याभवन् प्रभवन् भवन्.
आकूतिप्रो ऽ विर्दत्तः शितिपात्नोप दस्यति.. (२)
चारों दिशाओं को व्याप्त करने वाला, फल देने में समर्थ एवं वृद्धि करने वाला यह यज्ञ
हमारी सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करता है. संकल्पों को पूर्ण करने वाली यह सफेद पैरों
वाली भेड़ इस यज्ञ में दी जा रही है. यह क्षीण न हो कर हमारी इच्छा के अनुसार बढ़ेगा ही.
(२)
यो ददाति शितिपादमविं लोकेन संमितम्.
स नाकमभ्यारोहति यत्र शुल्को न क्रियते अबलेन बलीयसे.. (३)
जो यजमान सफेद पैरों वाली एवं लोक विश्वास के अनुसार फल देने वाली भेड़ का दान
करता है, वह स्वर्ग को प्राप्त करता है. स्वर्गलोक में निर्बल व्यक्ति सबल का शासन मान कर
शुल्क नहीं देता. (३)
पञ्चापूपं शितिपादमविं लोकेन संमितम्.
प्रदातोप जीवति पितॄणां लोकेऽक्षितम्.. (४)
जिस भेड़ के चारों पैरों और नाभि पर पांच पूए रखे जाते हैं, उसे पंचापूप कहते हैं.
पंचापूप अर्थात् पांच पूओं वाली और सफेद पैरों वाली भेड़ का दाता पृथ्वी आदि लोकों के
पांच समान पितरों के लोक में समाप्त न होने वाला फल भोगता है. (४)
पञ्चापूपं शितिपादमविं लोकेन संमितम्.
प्रदातोप जीवति सूर्यामासयोरक्षितम्.. (५)
पंचापूप अर्थात् पांच पूओं वाली और सफेद पैरों वाली भेड़ को लोक विश्वास के
अनुसार दान करने वाला सूर्य और चंद्रमा के लोकों में समाप्त न होने वाला फल भोगता है.
(५)
इरेव नोप दस्यति समुद्र इव पयो महत्.
देवौ सवासिनाविव शितिपात्नोप दस्यति.. (६)
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यज्ञ में दी गई सफेद पैरों वाली भेड़ सागर के जल के समान कभी क्षीण नहीं होती और
इस का दूध बढ़ता ही जाता है. अश्विनीकुमारों के समान यह भेड़ कभी क्षीण नहीं होती. (६)
क इदं कस्मा अदात् कामः कामायादात्.
कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामः समुद्रमा विवेश.
कामेन त्वा प्रति गृह्णामि कामैतत् ते.. (७)
यह दक्षिणा रूपी धन प्रजापति ने प्रजापति को ही दिया था. दक्षिणा देने वाला
पारलौकिक फल का अभिलाषी है और लेने वाला लौकिक फल का इच्छुक है. इस प्रकार
दक्षिणा का दाता और लेने वाला दोनों ही इच्छा वाले हैं. इच्छा का रूप सागर के समान
असीमित है. इच्छा का अंत नहीं है. हे दक्षिणा द्रव्य! मैं इसी प्रकार की इच्छा से तुझे ग्रहण
करता हूं. हे अभिलाषा! स्वीकार किया हुआ यह धन तेरे लिए हो. (७)
भूमिष्ट्वा प्रति गृह्णात्वन्तरिक्षमिदं महत्.
माहं प्राणेन मात्मना मा प्रजया प्रतिगृह्य वि राधिषि.. (८)
हे दक्षिणा द्रव्य! तुझे यह धरती और विशाल आकाश ग्रहण करे. इसीलिए तुझे ग्रहण
कर के मैं प्राण से, आत्मा से और पुत्रपौत्र आदि संतान से हीन न बनूं. (८)
सूक्त-३० देवता—सौमनस्य
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः.
अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या.. (१)
हे विवाद करने वाले पुरुषो! मैं तुम्हारे लिए सौमनस्य कर्म करता हूं जो विद्वेष रहित एवं
परस्पर प्रेम कराने वाला है. जिस प्रकार गाय अपने बछड़े से प्रेम करती है. उसी प्रकार तुम
भी परस्पर प्रेम करो. (१)
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः.
जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शान्तिवाम्.. (२)
पुत्र पिता के अनुकूल कर्म करने वाला हो. माता पुत्र आदि के प्रति सौमनस्य वाली बने.
पत्नी पति से मधुर एवं सुखकर वचन कहे. (२)
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा.
सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया.. (३)
भाई अपने सगे भाई से उत्तराधिकार को ले कर तथा बहन अपनी सगी बहन से द्वेष न
करे. यह सब समान गति वाले एवं समान कर्मों वाले हो कर कल्याणकारी वचन कहें. (३)
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येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथः.
तत् कृण्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं पुरुषेभ्यः.. (४)
जिस मंत्र के बल से देवगण, भिन्नभिन्न विचारों वाले नहीं बनते और परस्पर द्वेष नहीं
करते, उसी मंत्र का प्रयोग मैं तुम्हारे घर में एकमत स्थापित करने के लिए करता हूं. (४)
ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ट संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः.
अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोमि.. (५)
हे मनुष्यो! तुम छोटेबड़े की भावना से एक दूसरे का अनुसरण करते हुए समान चित्त
वाले, समान सिद्धि वाले तथा समान कार्य करने वाले बनो. इस प्रकार आचरण करते हुए तुम
एक दूसरे से बिछुड़ो मत तथा एक दूसरे से प्रिय वचन बोलते हुए आओ. मैं भी तुम सब से
मिलकर तुम्हें कार्यों में प्रवृत्त होने वाला तथा समान विचारों वाला बनाता हूं. (५)
समानी प्रपा सह वो ऽ न्नभागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि.
सम्यञ्चो ऽ ग्निं सपर्यतारा नाभिमिवाभितः.. (६)
हे समानता के इच्छुक जनो! तुम परस्पर प्रेम के कारण एक स्थान पर रह कर समान
जल और अन्न का उपयोग करो. इस के लिए मैं तुम सब को प्रेम के एक बंधन में बांधता हूं.
जिस प्रकार पहिए के अनेक अरे एक नाभि को घेरे रहते हैं, उसी प्रकार तुम सब एक फल
की कामना करते हुए अग्नि की उपासना करो. (६)
सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोम्येकश्नुष्टीन्संवननेन सर्वान्.
देवा इवामृतं रक्षमाणाः सायंप्रातः सौमनसो वो अस्तु.. (७)
मैं तुम सब को एक कार्य करने में एक साथ संलग्न कर के समान विचारों वाला बनाता
हूं तथा समान अन्न का उपयोग करने वाला और सौमनस्य कर्म के द्वारा तुम्हें वश में करता हूं.
स्वर्गलोक में अमृत रक्षा करने वाले इंद्र आदि देवों का मन जिस प्रकार समान बना रहता है,
उसी प्रकार मैं तुम्हें सभी समयों में समान मन वाला बनाता हूं. (७)
सूक्त-३१ देवता—अग्नि आदि
वि देवा जरसावृतन् वि त्वमग्ने अरात्या.
व्य१हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम इस बालक को आयु की हानि करने वाली वृद्धावस्था से दूर
रखो. हे अग्नि! तुम इसे दान न देने के स्वभाव से और शत्रुओं से दूर रखो. मैं इसे रोग आदि
दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से संयुक्त
करता हूं. (१)
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व्यार्त्या पवमानो वि शक्रः पापकृत्यया.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (२)
वायु इस बालक को रोगजनित पीड़ा से अलग रखे तथा इंद्र पाप के कार्यों से बचाएं. मैं
इसे रोग आदि दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन
से युक्त करता हूं. (२)
वि ग्राम्याः पशव आरण्यैर्व्यापस्तृष्णयास्रन्.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (३)
जिस प्रकार गाय, भैंस आदि ग्रामीण पशु वन के पशुओं से तथा जल प्यासे व्यक्तियों से
दूर रहता है, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःख उत्पन्न करने वाले पापों से तथा
यक्ष्मा रोग से दूर कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (३)
वी ३ मे द्यावापृथिवी इतो वि पन्थानो दिशंदिशम्.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (४)
जिस प्रकार धरती और आकाश एक दूसरे से अलग रहते हैं तथा एक गांव से प्रत्येक
दिशाओं में जाने वाले मार्ग स्वाभाविक रूप से पृथक् होते हैं, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को
रोग आदि दुःखों के उत्पादक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक कर के चिर जीवन से युक्त
करता हूं. (४)
त्वष्टा दुहित्रे वहतुं युनक्तीतीदं विश्वं भुवनं वि याति.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (५)
त्वष्टा ने अपनी पुत्री के विवाह में जो दहेज दिया था, उसे स्थापित करने के निमित्त
धरती और आकाश जिस प्रकार पृथक् हुए थे, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि
दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा क्षय रोग से पृथक् कर के दीर्घ जीवन से संयुक्त करता
हूं. (५)
अग्निः प्राणान्त्सं दधाति चन्द्रः प्राणेन संहितः.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (६)
जिस प्रकार जठराग्नि चक्षु आदि इंद्रियों को अन्न से बना हुआ रस पहुंचा कर
अपनाअपना कार्य करने में समर्थ बनाती है तथा चंद्रमा प्राण वायु से युक्त हो कर अमृत रस
से सभी आत्माओं का पोषण करता है, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों के
उत्पादक पापों से तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् करके दीर्घ जीवन प्रदान करता हूं. (६)
प्राणेन विश्वतोवीर्यं देवाः सूर्यं समैरयन्.
व्य१हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (७)
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देवों ने सारे विश्व के प्रेरक सूर्य को प्राण के रूप में उत्पन्न किया. मैं ऐसे सूर्य को इस
ब्रह्मचारी की आयु वृद्धि के निमित्त इस में स्थापित करता हूं. मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि
दुःखों के उत्पादक पापों से, तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं.
(७)
आयुष्मतामायुष्कृतां प्राणेन जीव मा मृथाः.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (८)
हे ब्रह्मचारी! तू दीर्घ आयु वाले पुरुषों की आयु से दीर्घ आयु प्रदान करने वाले देवों के
प्राण से चिरकाल तक जीवन धारण कर तथा मृत्यु को प्राप्त मत हो. मैं तुझे रोग आदि दुःखों
के जनक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (८)
प्राणेन प्राणतां प्राणेहैव भव मा मृथाः.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (९)
हे ब्रह्मचारी! श्वास लेने वाले प्राणियों की प्राण वायु से तू सांस ले. तू इसी लोक में
निवास कर अर्थात् जीवित रह, मर मत. मैं तुझे रोग के उत्पादक पापों तथा यक्ष्मा रोग से
पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (९)
उदायुषा समायुषोषधीनां रसेन.
व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (१०)
हम चिर काल के जीवन से मृत्यु को प्राप्त करते हैं, इस लोक में निवास करते हैं तथा
जौ, गेहूं आदि के रस से वृद्धि को प्राप्त करते हैं. मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों के
जनक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से संयुक्त करता हूं. (१०)
आ पर्जन्यस्य वृष्ट्योदस्थामामृता वयम्.
व्य१हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (११)
हम वृष्टि करने वाले पर्जन्य देव के द्वारा बरसाए हुए जल से अमरता प्राप्त कर के उठ
बैठते हैं. हे ब्रह्मचारी! मैं तुझे रोग आदि दुःखों से जन्य पापों से पृथक् कर के चिर जीवन से
संयुक्त करता हूं. (११)
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सूक्त-१ देवता—बृहस्पति
चौथा कांड
सूक्त-१ देवता—बृहस्पति
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः.
स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (१)
सत्, चित, आनंद और सारे विश्व का कारण ब्रह्म सब से पहले सूर्य रूप में प्रकट हुआ
जो पूर्व दिशा में उत्पन्न होता है तथा अपने तेज से सारे जगत् को व्याप्त करता है. यह प्रकाश
और वर्षा का कारण सूर्यात्मक तेज सभी दिशाओं से आरंभ हो कर अपने शोभन प्रकाश को
फैलाता है. सत् और असत् के उत्पत्ति स्थान के ज्ञान का तथा धरती, आकाश आदि का ज्ञान
प्रकट करने वाला वही सूर्यात्मक तेज है. (१)
इयं पित्र्या राष्ट्र्येत्वग्रे प्रथमाय जनुषे भुवनेष्ठाः.
तस्मा एतं सुरुचं ह्वारमह्यं घर्मं श्रीणन्तु प्रथमाय धास्यवे.. (२)
संपूर्ण जगत् को उत्पन्न करने वाले पिता प्रजापति ब्रह्मा हैं. उन से प्राप्त और नाद रूप
में सभी प्राणियों में व्याप्त वाणी सारे संसार के व्यवहारों की स्वामिनी है. ये प्रथम शब्द से
वाच्य सूर्यात्मक तेज अर्थात् ब्रह्म को स्तुति रूप में प्राप्त हों. (२)
प्र यो जज्ञे विद्वानस्य बन्धुर्विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति.
ब्रह्म ब्रह्मण उज्जभार मध्यान्नीचैरुच्चैः स्वधा अभि प्र तस्थौ.. (३)
इस प्रपंच के कारण, हितकारी एवं निरावरण ज्ञान से सारे जगत् को जानते हुए जो देव
सर्वप्रथम उत्पन्न हुए, वे इंद्र आदि सभी देवों के जन्मों का वर्णन करते हैं. प्रथम उत्पन्न देव ने
सब के कारण रूप ब्रह्म के मध्य भाग से, नीचे वाले भाग से और ऊपर वाले भाग से वेदों का
उद्धार किया. इस के पश्चात देवों को हवि के रूप में अन्न मिला. (३)
स हि दिवः स पृथिव्या ऋतस्था मही क्षेमं रोदसी अस्कभायत्.
महान् मही अस्कभायद् वि जातो द्यां सद्म पार्थिवं च रजः.. (४)
सूर्य के रूप में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए देव आकाश में कारण रूप में तथा पृथ्वी में सत्य
रूप में स्थित हैं एवं उन्होंने धरती व आकाश को अविनाशी रूप में स्थापित किया. धरती
और आकाश को व्याप्त कर के वर्तमान उस प्रथम देव ने धरती और आकाश को स्थापित
किया है. वह इन दोनों के मध्य में सूर्य के रूप में उत्पन्न हुआ है तथा आकाश और पृथ्वी को
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