अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहिरण्यपाणिं सवितारमिन्द्रं बृहस्पतिं वरुणं मित्रमग्निम्.
विश्वा॒न् देवानङ्गिरसो हवामह इमं क्रव्यादं शमयन्त्वग्निम्.. (८)
स्तोताओं को देने के लिए जिन के हाथ में सुवर्ण रहता है, ऐसे सविता, बृहस्पति, वरुण,
इंद्र तथा अग्नि का और विश्वे देवों का मैं अंगिरा ऋषि आह्वान करता हूं. वे इस मांस खाने
वाली अग्नि को शांत करें. (८)
शान्तो अग्निः क्रव्याच्छान्तः पुरुषरेषणः.
अथो यो विश्वदाव्य १ स्तॄं क्रव्यादमशीशमम्.. (९)
मांस भक्षक अग्नि सविता आदि देवों की कृपा से शांत हों. पुरुषों की हिंसा करने वाली
अग्नि भी सुखकारी हों. जो सब को जलाने वाली और मांस भक्षक अग्नि है, उस को मैं ने
शांत कर दिया है. (९)
ये पर्वताः सोमपृष्ठा आप उत्तानशीवरीः.
वातः पर्जन्य आदग्निस्ते क्रव्यादमशीशमन्.. (१०)
सोमलता जिन के ऊपर वर्तमान है, ऐसे मुंजवान आदि पर्वत के ऊपर शयन करने वाले
जल, वायु और बादलों ने मांसभक्षक अग्नि को शांत कर दिया है. (१०)
सूक्त-२२ देवता—विश्वे देव
हस्तिवर्चसं प्रथतां बृहद् यशो अदित्या यत् तन्वः संबभूव.
तत् सर्वे समदुर्मह्यमेतद् विश्वे देवा अदितिः सजोषाः.. (१)
हम में हाथी के समान अपराजेय एवं प्रसिद्ध बल हो. देवमाता अदिति के शरीर से जो
महान एवं प्रसिद्ध तेज उत्पन्न हुआ है, सभी देव, अदिति के साथ मिल कर मुझे वह तेज और
यश प्रदान करें. (१)
मित्रश्च वरुणश्चेन्द्रो रुद्रश्च चेततु.
देवासो विश्वधायसस्ते माज्जन्तु वर्चसा.. (२)
दिन के स्वामी इंद्र, रात्रि के स्वामी वरुण, स्वर्ग के अधिपति इंद्र और सब का संहार
करने वाले रुद्र मुझे अनुग्रह करने योग्य समझें. सारे संसार का पोषण करने वाले मित्र आदि
देव मुझे तेजस्वी बनाएं. (२)
येन हस्ती वर्चसा संबभूव येन राजा मनुष्येष्वप्स्व १ न्तः.
येन देवा देवतामग्र आयन् तेन मामद्य वर्चसाग्ने वर्चस्विनं कृणु.. (३)
जिस तेज से हाथी विशालकाय बनता है, जिस तेज से राजा मनुष्यों में तेजस्वी होता है,
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