अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे नारी! उत्तुद नाम के देव अत्यधिक व्यथित करने वाले हैं. वे तुझे कामार्ता करें. मदन
विकारों से व्यथित हो कर तू अपने पलंग पर सोना पसंद मत कर. कामदेव का जो भयानक
बाण है, उस से मैं तेरे हृदय को ताड़ित करता हूं. (१)
आधीपर्णां कामशल्यामिषुं सङ्कल्पकुल्मलाम्.
तां सुसन्नतां कृत्वा कामो विध्यतु त्वा हृदि.. (२)
मन का कामोन्माद जिस का पर्ण अर्थात् पीछे वाला भाग है और रमण करने की
अभिलाषा जिस का फल अर्थात् आगे वाला भाग है तथा भोग विषयक संकल्प जिस के
दोनों भागों को जोड़ने वाला द्रव्य है, इस प्रकार के बाण को अपने धनुष पर रख कर कामदेव
तेरे हृदय का वेधन करें. (२)
या प्लीहानं शोषयति कामस्येषुः सुसन्नता.
प्राचीनपक्षा व्योषा तया विध्यामि त्वा हृदि.. (३)
कामदेव के द्वारा भलीभांति खींचा गया बाण प्राणों के आश्रय प्लीहा को जलाता है. हे
नारी! मैं सीधे पंखों वाले तथा अनेक प्रकार से दहन करने वाले उस बाण से तेरे हृदय का
वेधन करता हूं. (३)
शुचा विद्धा व्योषया शुष्कास्याभि सर्प मा.
मृदुनिर्मन्युः केवली प्रियवादिन्यनुव्रता.. (४)
दाह करने वाले तथा शोकात्मक बाण से घायल होने के कारण तेरा कंठ सूख जाए और
उस कंठ के कारण अपना अभिप्राय प्रकट करने में असमर्थ हो कर तू मेरे समीप आ. तू
मृदुभाषिणी, एकमात्र मुझ से रक्षा पाने वाली तथा मेरे अनुकूल बोलने वाली बन और मेरे
अनुकूल आचरण कर. (४)
आजामि त्वाजन्या परि मातुरथो पितुः.
यथा मम क्रतावसो मम चित्तमुपायसि.. (५)
हे नारी! मैं कोड़े से मार कर तुझे अपने अभिमुख करता हूं. मैं वहां से तुझे अपने समीप
बुलाता हूं, जिस से तू मेरे संकल्प को पूरा करे और मेरी बुद्धि के अनुसार चले. (५)
व्यस्यै मित्रावरुणौ हृदश्चित्तान्यस्यतम्.
अथैनामक्रतुं कृत्वा ममैव कृणुतं वशे.. (६)
हे मित्र और वरुण! इस स्त्री के हृदय को ज्ञानशून्य कर दो. इस के पश्चात इसे कर्तव्य
और अकर्तव्य के ज्ञान से शून्य कर के मेरे वशीभूत बना दो. (६)
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